वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| १७० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो मुनेस्तदा क्षोभाद्रेतः स्कन्नं यदम्भसि।<br>तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः॥ ४<br><br>सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह।<br>तत्रर्षयः सप्त जाता विदुर्यान् मरुतां गणान्॥ ५<br><br>वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः।<br>वायुज्वालो वायुरेतो वायुचक्रश्च वीर्यवान्॥ ६<br><br>एते ह्यपत्यास्तस्यर्षेर्धारयन्ति चराचरम्।<br>पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति मे श्रुतम्॥ ७<br><br>क्षतः किल करे विप्रास्तस्य शाकरसोऽस्रवत्।<br>स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान्॥ ८ | स्नान करने लगीं। उसके बाद मुनिके मनमें विकृति हो गयी; फलतः उनका शुक्र जलमें स्खलित हो गया। उस रेतको उन महातपस्वीने उठाकर घड़ेमें रख लिया। वह कलशस्थ (रेत) सात भागोंमें विभक्त हो गया। उससे सात ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्हें मरुद्गण कहा जाता है। (उनके नाम हैं—) वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता एवं वीर्यवान् वायुचक्र। उन (मङ्कणक) ऋषिके ये सात पुत्र चराचरको धारण करते हैं। ब्राह्मणो! मैंने यह सुना है कि प्राचीन कालमें सिद्ध मङ्कणकके हाथमें कुशके अग्रभागसे छिद जानेके कारण घाव हो गया था; उससे शाकरस निकलने लगा। वे (अपने हाथसे निकलते हुए उस) शाकरसको देखकर प्रसन्न हो गये और नाचने लगे॥ २—८॥ |
| ततः सर्वं प्रनृत्तं च स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>प्रनृत्तं च जगद् दृष्ट्वा तेजसा तस्य मोहितम्॥ ९<br><br>ब्रह्मादिभिः सुरैस्तत्र ऋषिभिश्च तपोधनैः।<br>विज्ञाप्तो वै महादेवो मुनेरर्थे द्विजोत्तमाः॥ १०<br><br>नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि।<br>ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि॥ ११<br><br>सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत।<br>हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदं मुनिसत्तम।<br>तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम॥ १२ | इससे (उनके नृत्य करनेसे उनके साथ) सम्पूर्ण अचर-चर जगत् भी नाचने लगा। उनके तेजसे मोहित जगत्को नाचते देखकर ब्रह्मा आदि देव एवं तपस्वी ऋषियोंने मुनिके (हितके) लिये महादेवसे कहा—देव! आप ऐसा (कार्य) करें, जिससे ये नृत्य न करें (उन्हें नृत्यसे विरत करनेका उपाय करें)। उसके बाद हर्षसे अधिक मग्न उन मुनिको देखकर एवं देवोंके हितकी इच्छासे महादेवने कहा—मुनिसत्तम! ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप तो तपस्वी एवं धर्मपथमें स्थित रहनेवाले हैं। फिर आपके इस हर्षका क्या कारण है?॥ ९—१२॥ |
| ऋषिरुवाच<br>किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम्।<br>यं दृष्ट्वाऽहं प्रनृत्तो वै हर्षेण महताऽन्वितः॥ १३<br><br>तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम्।<br>अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्यताम्॥ १४<br><br>एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं देवदेवो महाद्युतिः।<br>अङ्गुल्यग्रेण विप्रेन्द्राः स्वाङ्गुष्ठं ताडयद् भवः॥ १५<br><br>ततो भस्म क्षतात् तस्मान्निर्गतं हिमसंनिभम्।<br>तद् दृष्ट्वा व्रीडितो विप्रः पादयोः पतितोऽब्रवीत्॥ १६ | ऋषिने कहा— ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथसे शाकका रस चू रहा है; जिसे देखकर मैं अत्यन्त आनन्दमग्न होकर नृत्य कर रहा हूँ। महादेवजीने हँसकर आसक्तिसे मोहित हुए उन मुनिसे कहा—विप्रवर! मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है। (किंतु) आप इधर देखें। विप्रेन्द्रो! श्रेष्ठ मुनिसे ऐसा कहकर देदीप्यमान भगवान् देवाधिदेव महादेवने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अपने अंगूठेको ठीक किया। उसके बाद उस चोटसे हिमतुल्य (स्वच्छ) भस्म निकलने लगा। उसे देखनेके बाद ब्राह्मण लज्जित होकर (महादेवके) चरणोंमें गिर पड़े और बोले—॥ १३—१६॥ |
| नान्यं देवादहं मन्ये शूलपाणेर्महात्मनः।<br>चराचरस्य जगतो वरस्त्वमसि शूलधृक्॥ १७ | मैं महात्मा शूलपाणि महादेवके अतिरिक्त किसीको नहीं मानता। शूलपाणे! मेरी दृष्टिमें आप ही चराचर |