वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ३९ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन | १७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वदाश्रयाश्च दृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ।<br>पूर्वस्त्वमसि देवानां कर्त्ता कारयिता महत्॥ १८<br><br>त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्ते ह्यकुतोभयाः।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमृषिः स प्रणतोऽब्रवीत्॥ १९<br><br>भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तपो मे न क्षयं व्रजेत्।<br>ततो देवः प्रसन्नात्मा तमृषिं वाक्यमब्रवीत्॥ २० | समस्त संसारमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अनघ! ब्रह्मा आदि देवता आपके ही आश्रित देखे जाते हैं। आप ही देवताओंमें प्रथम हैं और आप (सब कुछ) करने एवं करानेवाले तथा महत्वस्वरूप हैं। आपकी कृपासे सभी देवगण निर्भय होकर मोदमग्न होते रहते हैं। ऋषिने इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करनेके बाद उन्हें प्रणामकर कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मेरे तपका क्षय न हो। तब महादेवजीने प्रसन्न होकर उन ऋषिसे यह वचन कहा—॥ १७–२०॥ |
| ईश्वर उवाच<br>तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा।<br>आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धमहं सदा॥ २१<br>सप्तसारस्वते स्नात्वा यो मामर्चिष्यते नरः।<br>न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च॥ २२<br>सारस्वतं च तं लोकं गमिष्यति न संशयः।<br>शिवस्य च प्रसादेन प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३ | (सदाशिव) ईश्वरने कहा— विप्र! मेरी कृपासे तुम्हारी तपस्या सहस्रों प्रकारसे बढ़े। मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें सदा निवास करूँगा। जो मनुष्य इस सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेगा, उसे इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। वह निःसंदेह उस सारस्वतलोकको जायगा एवं (मुझ) शिवके अनुग्रहसे परम पदको प्राप्त करेगा॥ २१–२३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥
उनतालीसवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लोमहर्षण उवाच<br>ततस्त्वौशनसं तीर्थं गच्छेत्तु श्रद्धयान्वितः।<br>उशना यत्र संसिद्धो ग्रहत्वं च समाप्तवान्॥ १<br><br>तस्मिन् स्नात्वा विमुक्तस्तु पातकैर्जन्मसंभवैः।<br>ततो याति परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः॥ २<br><br>रहोदरो नाम मुनिर्यत्र मुक्तो बभूव ह।<br>महता शिरसा ग्रस्तस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनात्॥ ३ | लोमहर्षणने कहा— (ऋषियो!) सप्तसारस्वतके बाद श्रद्धासे युक्त होकर 'औशनस'तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ शुक्र सिद्धि प्राप्तकर ग्रहत्वको प्राप्त हो गये। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य अनेक जन्मोंमें किये हुए पातकोंसे छूटकर परब्रह्मको प्राप्त करता है, जहाँसे पुनः (जन्म-मरणके चक्करमें) लौटना नहीं पड़ता। (वह तीर्थ ऐसा है) जहाँ तीर्थ-दर्शनकी महिमासे भारी सिरसे जकड़े हुए रहोदर नामके एक मुनि उससे मुक्त हो गये थे॥ १–३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कथं रहोदरो ग्रस्तः कथं मोक्षमवाप्तवान्।<br>तीर्थस्य तस्य माहात्म्यमिच्छामः श्रोतुमादरात्॥ ४ | ऋषियोंने कहा (पूछा)— रहोदर मुनि सिरसे ग्रस्त कैसे हो गये थे? और वे उससे मुक्त कैसे हुए? हमलोग उस तीर्थके माहात्म्यको आदरके साथ सुनना चाहते हैं (जिसकी महिमासे ऐसा हुआ।)॥ ४॥ |