भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३९ लोमहर्षण उवाच पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना। वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः॥ ५ तत्रैकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः। क्षुरेण शितधारेण तत् पपात महावने॥ ६ रहोदरस्य तल्लग्नं जङ्घायां वै यदृच्छया। वने विचरतस्तत्र अस्थि भित्त्वा विवेश ह॥ ७ स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह। अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायधनानि च॥ ८ स पूतिना विस्रवता वेदनात्तो महामुनिः। जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां यानि कानि च॥ ९ ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम्। तेऽब्रुवन् ऋषयो विप्रं प्रयाह्यौशनसं प्रति॥ १० तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः। ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा॥ ११ तच्छिरश्शरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले द्विजाः। ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा वीतकल्मषः॥ १२ आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम्। ते श्रुत्वा ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्। कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः॥ १३ तत्रापि सुमहत्तीर्थं विश्वामित्रस्य विश्रुतम्। ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रो महामुनिः॥ १४ तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम्। ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात्॥ १५ ततः पृथूदकं गच्छेन्नियतो नियताशनः। तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मर्षी रुषङ्गुर्नाम नामतः॥ १६ जातिस्मरो रुषङ्गुस्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः। अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत्। इह श्रेयो न पश्यामि नयध्वं मां पृथूदकम्॥ १७ लोमहर्षणजी बोले- द्विजश्रेष्ठो ! प्राचीन कालमें दण्डकारण्यमें रहते हुए रघुवंशी महात्मा रामचन्द्रने बहुत-से राक्षसोंको मारा था। वहाँ एक दुष्टात्मा राक्षसका सिर तीक्ष्णधारवाले क्षुर नामक बाणसे कटकर उस महावनमें गिरा। (फिर वह) संयोगवश वनमें विचरण करते हुए रहोदर मुनिकी जंघामें उनकी हड्डीको तोड़कर उससे चिपट गया। महाप्राज्ञ वे ब्राह्मणदेव (जंघेकी टूटी हड्डीमें) उस मस्तकके लग जानेके कारण तीर्थों और देवालयोंमें नहीं जा पाते थे॥ ५-८॥ वे महामुनि दुर्गन्धपूर्ण पीब आदि बहनेके कारण तथा वेदनासे अत्यन्त दुःखी रहते थे। पृथ्वीके जिन-जिन तीर्थोंमें वे गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने पवित्रात्मा ऋषियोंसे (अपना दुःख) कहा। ऋषियोंने उन विप्रसे कहा- ब्राह्मणदेव ! आप औशनस (तीर्थ)-में जाइये। (लोमहर्षणने कहा-) द्विजो ! उनका यह वचन सुनकर रहोदर मुनि वहाँसे औशनसतीर्थमें गये। वहाँ उन्होंने तीर्थ-जलका स्पर्श किया। उनके द्वारा (जलका) स्पर्श होते ही वह मस्तक उनसे (जाँघ)-को छोड़कर जलमें गिर गया। उसके बाद वे मुनि पापसे रहित निर्मल रजोगुणसे रहित अतएव पवित्रात्मा होकर प्रसन्नतापूर्वक (अपने) आश्रममें गये और उन्होंने (ऋषियोंसे) सारी आपबीती कह सुनायी। फिर तो उन आये हुए सभी ऋषियोंने औशनसतीर्थके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर उसका नाम 'कपालमोचन' रख दिया॥ ९-१३॥ वहीं (कपालमोचन तीर्थमें ही) महामुनि विश्वामित्रका बहुत बड़ा तीर्थ है, जहाँ विश्वामित्रने ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया था। उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको निश्चय रूपसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मके परम पदको प्राप्त करता है। कपालमोचनके बाद पृथूदक नामके तीर्थमें जाय और नियमपूर्वक नियत मात्रामें आहार करे। वहाँ रुषङ्गु नामके ब्रह्मर्षिने सिद्धि पायी थी। सदा गङ्गाद्वारमें स्थित रहते हुए पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण रखनेवाले रुषङ्गुने (अपना) अन्तकाल आया देखकर (अपने) पुत्रोंसे कहा कि यहाँ (मैं) अपना कल्याण नहीं देख रहा हूँ। मुझे पृथूदक