वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ३९ लोमहर्षण उवाच पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना। वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः॥ ५ तत्रैकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः। क्षुरेण शितधारेण तत् पपात महावने॥ ६ रहोदरस्य तल्लग्नं जङ्घायां वै यदृच्छया। वने विचरतस्तत्र अस्थि भित्त्वा विवेश ह॥ ७ स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह। अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायधनानि च॥ ८ स पूतिना विस्रवता वेदनात्तो महामुनिः। जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां यानि कानि च॥ ९ ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम्। तेऽब्रुवन् ऋषयो विप्रं प्रयाह्यौशनसं प्रति॥ १० तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः। ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा॥ ११ तच्छिरश्शरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले द्विजाः। ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा वीतकल्मषः॥ १२ आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम्। ते श्रुत्वा ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्। कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः॥ १३ तत्रापि सुमहत्तीर्थं विश्वामित्रस्य विश्रुतम्। ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रो महामुनिः॥ १४ तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम्। ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात्॥ १५ ततः पृथूदकं गच्छेन्नियतो नियताशनः। तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मर्षी रुषङ्गुर्नाम नामतः॥ १६ जातिस्मरो रुषङ्गुस्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः। अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत्। इह श्रेयो न पश्यामि नयध्वं मां पृथूदकम्॥ १७ लोमहर्षणजी बोले- द्विजश्रेष्ठो ! प्राचीन कालमें दण्डकारण्यमें रहते हुए रघुवंशी महात्मा रामचन्द्रने बहुत-से राक्षसोंको मारा था। वहाँ एक दुष्टात्मा राक्षसका सिर तीक्ष्णधारवाले क्षुर नामक बाणसे कटकर उस महावनमें गिरा। (फिर वह) संयोगवश वनमें विचरण करते हुए रहोदर मुनिकी जंघामें उनकी हड्डीको तोड़कर उससे चिपट गया। महाप्राज्ञ वे ब्राह्मणदेव (जंघेकी टूटी हड्डीमें) उस मस्तकके लग जानेके कारण तीर्थों और देवालयोंमें नहीं जा पाते थे॥ ५-८॥ वे महामुनि दुर्गन्धपूर्ण पीब आदि बहनेके कारण तथा वेदनासे अत्यन्त दुःखी रहते थे। पृथ्वीके जिन-जिन तीर्थोंमें वे गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने पवित्रात्मा ऋषियोंसे (अपना दुःख) कहा। ऋषियोंने उन विप्रसे कहा- ब्राह्मणदेव ! आप औशनस (तीर्थ)-में जाइये। (लोमहर्षणने कहा-) द्विजो ! उनका यह वचन सुनकर रहोदर मुनि वहाँसे औशनसतीर्थमें गये। वहाँ उन्होंने तीर्थ-जलका स्पर्श किया। उनके द्वारा (जलका) स्पर्श होते ही वह मस्तक उनसे (जाँघ)-को छोड़कर जलमें गिर गया। उसके बाद वे मुनि पापसे रहित निर्मल रजोगुणसे रहित अतएव पवित्रात्मा होकर प्रसन्नतापूर्वक (अपने) आश्रममें गये और उन्होंने (ऋषियोंसे) सारी आपबीती कह सुनायी। फिर तो उन आये हुए सभी ऋषियोंने औशनसतीर्थके इस उत्तम माहात्म्यको सुनकर उसका नाम 'कपालमोचन' रख दिया॥ ९-१३॥ वहीं (कपालमोचन तीर्थमें ही) महामुनि विश्वामित्रका बहुत बड़ा तीर्थ है, जहाँ विश्वामित्रने ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया था। उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको निश्चय रूपसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मके परम पदको प्राप्त करता है। कपालमोचनके बाद पृथूदक नामके तीर्थमें जाय और नियमपूर्वक नियत मात्रामें आहार करे। वहाँ रुषङ्गु नामके ब्रह्मर्षिने सिद्धि पायी थी। सदा गङ्गाद्वारमें स्थित रहते हुए पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण रखनेवाले रुषङ्गुने (अपना) अन्तकाल आया देखकर (अपने) पुत्रोंसे कहा कि यहाँ (मैं) अपना कल्याण नहीं देख रहा हूँ। मुझे पृथूदक
सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर
अध्याय ३९] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन १७३ विज्ञाय तस्य तद्भावं रुषङ्गोस्ते तपोधनाः । तं वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ १८ स तैः पुत्रैः समानीतः सरस्वत्यां समाप्लुतः । स्मृत्वा तीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदृषिसत्तमः ॥ १९ सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् । पृथूदके जप्यपरो नूनं चामरतां व्रजेत् ॥ २० तत्रैव ब्रह्मयोन्यस्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता। पृथूदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥ २१ चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत्। तस्याभिधायतः सृष्टिं ब्रह्मणो व्यक्तजन्मनः ॥ २२ मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा । ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्भ्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ॥ २३ चातुर्वर्ण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः। एवं प्रतिष्ठितं तीर्थं ब्रह्मयोनीति संज्ञितम् ॥ २४ तत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनर्योनिं न पश्यति। तत्रैव तीर्थं विख्यातमवकीर्णेति नामतः ॥ २५ यस्मिंस्तीर्थे वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्षणम् । जुहाव वाहनैः सार्धं तत्राबुध्यत् ततो नृपः ॥ २६ ऋषय ऊचुः कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः। धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स किमर्थं प्रसादितः ॥ २७ लोमहर्षण उवाच ऋषयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थं ययुः पुरा। तत्रैव च वको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमयाचत ॥ २८ तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्चानृतं तु यत्। ततः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ॥ २९ पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः । जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेस्ततः ॥ ३० हूयमाने तदा राष्ट्रे प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि । अक्षीयत ततो राष्ट्रं नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१ (तीर्थ)-में ले चलो। रुषङ्गुके उस भावको जानकर वे तपोधन (पुत्र) उन तपके धनीको सरस्वतीके तीर्थमें ले गये ॥ १४ - १८॥ उन पुत्रोंद्वारा लाये गये उन ऋषिश्रेष्ठने सरस्वतीमें स्नान करनेके पश्चात् उस तीर्थके सब गुणोंका स्मरण कर यह कहा था-'सरस्वतीके उत्तरकी ओर स्थित पृथूदक नामके तीर्थमें अपने शरीरका त्याग करनेवाला जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्वको प्राप्त होता है।' वहीं ब्रह्माद्वारा निर्मित 'ब्रह्मयोनितीर्थ' है, जहाँ सरस्वतीके किनारे अवस्थित पृथूदकमें स्थित होकर ब्रह्मा चारों वर्णोंकी सृष्टिके लिये आत्मज्ञानमें लीन हुए थे। सृष्टिके विषयमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके चिन्तन करनेपर उनके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य और दोनों पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए ॥ १९-२३॥ उसके बाद उन्होंने चारों वर्णोंको विभिन्न आश्रमोंमें स्थित हुआ देखा। इस प्रकार ब्रह्मयोनि नामक तीर्थकी प्रतिष्ठा हुई थी। मुक्तिकी कामना करनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नान करनेसे पुनर्जन्म नहीं देखता। वहीं अवकीर्ण नामक एक विख्यात तीर्थ भी है, जहाँपर दाल्भ्य (दल्भ या दल्भि गोत्रमें उत्पन्न) वक नामक ऋषिने क्रोधी धृतराष्ट्रको उसके वाहनोंके साथ हवन कर दिया था, तब कहीं राजाको (अपने किये कर्मका) ज्ञान हुआ था ॥ २४ - २६ ॥ ऋषियोंने पूछा- अवकीर्ण नामक तीर्थ कैसे प्रतिष्ठित हुआ एवं राजा धृतराष्ट्रने उन (वक दाल्भ्य मुनि)-को क्यों प्रसन्न किया था ? ॥ २७ ॥ लोमहर्षणने कहा- प्राचीन कालमें नैमिषारण्य- निवासी जो ऋषि दक्षिणा पानेके लिये (राजा धृतराष्ट्रके यहाँ) गये थे, उनमेंसे दल्भिवंशीय वक ऋषिने धृतराष्ट्रसे (धनकी) याचना की। उन्होंने (धृतराष्ट्रने) भी निन्दापूर्ण ग्राम्य और असत्य बात कही। उसके बाद वे (वक दाल्भ्य) अत्यन्त क्रुद्ध होकर पृथूदकमें स्थित अवकीर्ण नामक तीर्थमें जा करके मांस काट-काटकर धृतराष्ट्रके राष्ट्रके नाम हवन करने लगे। तब यज्ञमें राष्ट्रका हवन प्रारम्भ होनेपर राजाके दुष्कर्मके कारण राष्ट्रका क्षय होने लगा ॥ २८-३१ ॥
| १७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४० |
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| ततः स चिन्तयामास ब्राह्मणस्य विचेष्टितम्।<br>पुरोहितेन संयुक्तो रत्नान्यादाय सर्वशः॥ ३२<br><br>प्रसादनार्थं विप्रस्य ह्यवकीर्णं ययौ तदा।<br>प्रसादितः स राज्ञा च तुष्टः प्रोवाच तं नृपम्॥ ३३<br><br>ब्राह्मणा नावमन्तव्याः पुरुषेण विजानता।<br>अवज्ञातो ब्राह्मणस्तु हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम्॥ ३४<br><br>एवमुक्त्वा स नृपतिं राज्येन यशसा पुनः।<br>उत्थापयामास ततस्तस्य राज्ञे हिते स्थितः॥ ३५ | (राष्ट्रको क्षीण होते देख) उसने विचार किया और वह इसे ब्राह्मणका विकर्म जानकर (उस ब्राह्मणको) प्रसन्न करनेके लिये समस्त रत्नोंको लेकर पुरोहितके साथ अवकीर्णतीर्थमें गया (और उस) राजाने उन्हें प्रसन्न कर लिया। प्रसन्न होकर उन्होंने राजासे कहा — (राजन्!) विद्वान् मनुष्यको ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। अपमानित हुआ ब्राह्मण मनुष्यके कुलके तीन पुरुषों (पीढ़ियों)-का विनाश कर देता है। ऐसा कहकर उन्होंने पुनः राजाको राज्य एवं यशके साथ सम्पन्न कर दिया और वे उस राजाके हितकारी हो गये॥ ३२—३५॥ |
| तस्मिंस्तीर्थे तु यः स्नाति श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br><br>तत्र तीर्थं सुविख्यातं यायातं नाम नामतः।<br>यस्येह यजमानस्य मधु सुस्राव वै नदी॥ ३७<br><br>तस्मिन् स्नातो नरो भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>फलं प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेधस्य मानवः॥ ३८<br><br>मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं पुण्यतमं द्विजाः।<br>तस्मिन् स्नात्वा नरो भक्त्या मधुना तर्पयेत् पितॄन्॥ ३९<br><br>तत्रापि सुमहत्तीर्थं वसिष्ठोद्वाहसंज्ञितम्।<br>तत्र स्नातो भक्तियुक्तो वासिष्ठं लोकमाप्नुयात्॥ ४० | उस (अवकीर्ण) तीर्थमें जो जितेन्द्रिय मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह नित्य मनोऽभिलषित फल प्राप्त करता है। वहाँ 'यायात' (ययातिका तीर्थ) नामसे सुविख्यात तीर्थ है, जहाँ यज्ञ करनेवालेके लिये नदीने मधु बहाया था। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है एवं उसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। द्विजो! वहीं 'मधुस्रव' नामक पवित्र तीर्थ है। उसमें मनुष्यको भक्तिपूर्वक स्नान कर मधुसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये। वहींपर 'वसिष्ठोद्वाह' नामक सुन्दर महान् तीर्थ है, वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला व्यक्ति महर्षि वसिष्ठके लोकको प्राप्त करता है॥ ३६—४०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उन्तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥
चालीसवाँ अध्याय
वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग
| ऋषय ऊचुः<br>वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ कथं वै सम्बभूव ह।<br>किमर्थं सा सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत्॥ १ | ऋषियोंने कहा (पूछा)— महाराज! वह वसिष्ठापवाह कैसे उत्पन्न हुआ? उस श्रेष्ठ सरिताने उन ऋषिको अपने प्रवाहमें क्यों बहा दिया था?॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br>विश्वामित्रस्य राजर्षेर्वसिष्ठस्य महात्मनः।<br>भृशं वैरं बभूवेह तपःस्पर्द्धाकृते महत्॥ २ | लोमहर्षण बोले— (ऋषियो!) राजर्षि विश्वामित्र एवं महात्मा वसिष्ठमें तपस्याके विषयमें परस्पर चुनौती होनेके कारण बड़ी भारी शत्रुता हो गयी। |
| अध्याय ४० ] | वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग | १७५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थे बभूव ह।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे विश्वामित्रस्य धीमतः॥ ३<br>यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम्।<br>स्थापयामास देवेशो लिङ्गाकारां सरस्वतीम्॥ ४<br>वसिष्ठस्तत्र तपसा घोररूपेण संस्थितः।<br>तस्येह तपसा हीनो विश्वामित्रो बभूव ह॥ ५ | वसिष्ठका आश्रम स्थाणुतीर्थमें था और उसके पश्चिम दिशामें बुद्धिमान् विश्वामित्र महर्षिका आश्रम था; जहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवने यज्ञ करनेके बाद सरस्वतीकी पूजा कर मूर्तिके रूपमें सरस्वतीकी स्थापना की थी। वसिष्ठजी वहीं घोर तपस्यामें संलग्न थे। उनकी तपस्यासे विश्वामित्र (प्रभावतः) हीन-से होने लगे॥ २-५॥ |
| सरस्वतीं समाहूय इदं वचनमब्रवीत्।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं स्वेन वेगेन आनय॥ ६<br>इहाहं तं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यथिता सा महानदी॥ ७<br>तथा तां व्यथितां दृष्ट्वा वेपमानां महानदीम्।<br>विश्वामित्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय॥ ८<br>ततो गत्वा सरिच्छ्रेष्ठा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्।<br>कथयामास रुदतो विश्वामित्रस्य तद् वचः॥ ९ | (एक बार) विश्वामित्रने सरस्वतीको बुलाकर यह वचन कहा—सरस्वति! तुम मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको अपने वेगसे बहा लाओ। मैं उन द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठको यहाँ मारूँगा—इसमें संदेहकी बात नहीं है। इस (अवाञ्छनीय बात)-को सुनकर वह महानदी दुःखित हो गयी। (पर) विश्वामित्रने उस प्रकार दुःखित एवं काँपती हुई उस महानदीको देखकर क्रोधमें भरकर कहा कि वसिष्ठको शीघ्र लाओ। उसके बाद उस श्रेष्ठ नदीने मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उनसे रोते हुए विश्वामित्रकी उस बातको कहा॥ ६-९॥ |
| तपःक्रियाविशीर्णां च भृशं शोकसमन्विताम्।<br>उवाच स सरिच्छ्रेष्ठां विश्वामित्राय मां वह॥ १०<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित्।<br>चालयामास तं स्थानात् प्रवाहेणाम्भसस्तदा॥ ११<br>स च कूलापहारेण मित्रावरुणयोः सुतः।<br>उह्यमानश्च तुष्टाव तदा देवीं सरस्वतीम्॥ १२<br>पितामहस्य सरसः प्रवृत्ताऽसि सरस्वति।<br>व्याप्तं त्वया जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः॥ १३ | उन वसिष्ठजीने तपश्चर्यासे दुर्बल एवं अतिशय शोक-समन्वित उस श्रेष्ठ सरिता (सरस्वती)-से कहा—(तुम) विश्वामित्रके पास मुझे बहा ले चलो। उन दयालुके उस वचनको सुनकर उस सरस्वती सरिताने जलके (तेज) प्रवाहद्वारा उन्हें उस स्थानसे बहाना प्रारम्भ किया। किनारेसे ले जाये जानेके कारण बहते हुए मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठ-ऋषि प्रसन्न होकर देवी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे—सरस्वति! आप ब्रह्माके सरोवरसे निकली हैं। आपने अपने उत्तम जलसे समस्त जगत्को व्याप्त कर दिया है॥ १०-१३॥ |
| त्वमेवाकाशगा देवी मेघेषु सृजसे पयः।<br>सर्वास्त्वापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहे॥ १४<br>पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिः कान्तिः क्षमा तथा।<br>स्वधा स्वाहा तथा वाणी तवायत्तमिदं जगत्॥ १५<br>त्वमेव सर्वभूतेषु वाणीरूपेण संस्थिता।<br>एवं सरस्वती तेन स्तुता भगवती सदा॥ १६<br>सुखेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति।<br>न्यवेदयत्तदा खिन्ना विश्वामित्राय तं मुनिम्॥ १७ | 'आप ही आकाशगामिनी देवी हैं और मेघोंमें जलको उत्पन्न करती हैं। आप ही सभी जलोंके रूपमें वर्तमान हैं। आपकी ही शक्तिसे हमलोग अध्ययन करते हैं। आप ही पुष्टि, धृति, कीर्ति, सिद्धि, कान्ति, क्षमा, स्वधा, स्वाहा तथा सरस्वती हैं। यह पूरा विश्व आपके ही अधीन है। आप ही समस्त प्राणियोंमें वाणीरूपसे स्थित हैं।' वसिष्ठजीने भगवती सरस्वतीकी इस प्रकार स्तुति की और सरस्वती नदीने उन विप्रदेवको विश्वामित्रके आश्रममें सुखपूर्वक पहुँचा दिया और खिन्न होकर उन मुनिको विश्वामित्रके लिये निवेदित कर दिया॥ १४-१७॥ |
| १७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४० |
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| तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः।<br>अथान्विषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥ १८<br><br>तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्महत्याभयान्नदी।<br>अपोवाह वसिष्ठं तं मध्ये चैवाम्भसस्तदा।<br>उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥ १९<br><br>ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम्।<br>अब्रवीत् क्रोधरक्ताक्षो विश्वामित्रो महातपाः ॥ २०<br><br>यस्मान्मां सरितां श्रेष्ठे वञ्चयित्वा विनिर्गता।<br>शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंयुता ॥ २१ | उसके बाद सरस्वतीद्वारा बहाकर लाये गये वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र क्रोधसे भर गये और वसिष्ठका अन्त करनेवाला शस्त्र ढूँढ़ने लगे। उन्हें क्रोधसे भरा हुआ देखकर ब्रह्महत्याके भयसे डरती हुई वह सरस्वती नदी गाधिपुत्र विश्वामित्रको वञ्चित कर दोनोंकी बातोंका पालन करती हुई उन वसिष्ठको जलमें (पुनः) बहा ले गयी। उसके बाद ऋषिप्रवर वसिष्ठको अपवाहित होते देखकर महातपस्वी विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर विश्वामित्रने कहा—ओ श्रेष्ठ नदी! यतः तुम मुझे वञ्चितकर चली गयी हो, कल्याणि! अतः श्रेष्ठ राक्षसोंसे संयुक्त होकर तुम शोणितका वहन करो—तुम्हारा जल रक्तसे युक्त हो जाय ॥ १८–२१ ॥ | | ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता।<br>अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ॥ २२<br><br>अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा।<br>सरस्वतीं तदा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ २३<br><br>तस्मिंस्तीर्थवरे पुण्ये शोणितं समुपावहत्।<br>ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसाश्च समागताः ॥ २४<br><br>ततस्ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते।<br>तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः।<br>नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥ २५ | उसके बाद बुद्धिमान् विश्वामित्रसे इस प्रकार शाप प्राप्तकर सरस्वतीने एक वर्षतक रक्तसे मिले हुए जलको बहाया। उसके पश्चात् सरस्वती नदीको रक्तसे मिश्रित जलवाली देखकर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ अत्यन्त दुःखित हो गयीं। (यतः) उस पवित्र श्रेष्ठ तीर्थमें रुधिर ही बहने लगा। अतः वहाँ भूत, पिशाच, राक्षस एकत्र होने लगे। वे सभी रक्तका पान करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे। वे उससे अत्यन्त तृप्त, सुखी एवं निश्चिन्त होकर इस प्रकार नाचने एवं हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गको जीत लिया हो ॥ २२–२५ ॥ | | कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषयः सतपोधनाः।<br>तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां तपोधनाः ॥ २६<br><br>तां दृष्ट्वा राक्षसैर्घोरैः पीयमानां महानदीम्।<br>परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥ २७<br><br>ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः।<br>आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥ २८<br><br>किं कारणं सरिच्छ्रेष्ठे शोणितेन ह्रदो ह्यहम्।<br>एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा वेत्स्यामहे वयम् ॥ २९ | कुछ समय बीतनेपर तपस्याके धनी ऋषिलोग तीर्थयात्रा करते-करते सरस्वतीके तटपर पहुँचे। (वहाँ) भयानक राक्षसोंके द्वारा पीती जाती हुई महानदी सरस्वतीको देखकर वे उसकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करने लगे। और महान् व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाले उन महाभागोंने श्रेष्ठ नदीको (पास) बुलाकर उससे यह वचन फिर कहा—श्रेष्ठ सरिते! हम सब आपसे यह जानना चाहते हैं कि यह जलाशय रक्तसे भरकर ऐसा क्षुब्ध कैसे हुआ है? ॥ २६–२९ ॥ | | ततः सा सर्वमाचष्ट विश्वामित्रविचेष्टितम्।<br><br>ततस्ते मुनयः प्रीताः सरस्वत्यां समानयन्।<br><br>अरुणां पुण्यतोयौघां सर्वदुष्कृतनाशिनीम् ॥ ३० | तब उसने विश्वामित्रके समस्त विकर्मोंका (उनके सामने ही) वर्णन किया। उसके पश्चात् प्रसन्न हुए मुनिजन सरस्वती तथा समस्त पापोंका विनाश करनेवाली अरुणा नदीको ले आये। (जिससे सरस्वती-ह्रदका |
| अध्याय ४० ] | वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग | १७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या राक्षसा दुःखिता भृशम्।<br>ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् दैन्ययुक्ताः पुनः पुनः॥ ३१<br><br>वयं हि क्षुधिताः सर्वे धर्महीनाश्च शाश्वताः।<br>न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः॥ ३२<br><br>युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा।<br>पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः स्मो ब्रह्मराक्षसाः॥ ३३ | शोणित पवित्र जल हो गया) (पर) सरस्वतीके जलको (इस प्रकार शुद्ध हुआ) देखकर राक्षस बहुत दुःखित हो गये। वे दीनतापूर्वक उन सभी मुनियोंसे बार-बार कहने लगे कि हम सभी सदा भूखे एवं धर्मसे रहित रहते हैं। हम अपनी इच्छासे पापकर्म करनेवाले पापी नहीं बने हुए हैं, अपितु आपलोगोंकी अकृपा एवं अशोभन कर्मोंसे ही हमारा पक्ष बढ़ता रहता है; क्योंकि हम सभी ब्रह्मराक्षस हैं॥ ३०—३३॥ |
| एवं वैश्याश्च शूद्राश्च क्षत्रियाश्च विकर्मभिः।<br>ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः॥ ३४<br><br>योषितां चैव पापानां योनिदोषेण वर्द्धते।<br>इयं संततिरस्माकं गतिरेषा सनातनी॥ ३५<br><br>शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे।<br>तेषां ते मुनयः श्रुत्वा कृपाशीलाः पुनश्च ते॥ ३६<br><br>ऊचुः परस्परं सर्वे तप्यमानाश्च ते द्विजाः।<br>क्षुत्कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाशितं भवेत्॥ ३७<br><br>केशावपन्नमाधूतं मारुतश्वासदूषितम्।<br>एभिः संसृष्टमन्नं च भागं वै रक्षसां भवेत्॥ ३८ | इसी प्रकार जो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करते हैं, वे (ऐसे ही) विकर्म करनेके कारण राक्षस हो जाते हैं। पापिनी स्त्रियोंके योनिदोषसे हमारी यह संतति बढ़ती रहती है। यह हमारी प्राचीन गति है। आपलोग सभी लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। (लोमहर्षणजी कहते हैं—) द्विजो! वे कृपालु मुनि उन सदाकी रीति ब्रह्मराक्षसोंके इन वचनोंको सुनकर बहुत दुःखी हुए और परस्पर परामर्शकर उनसे बोले—(ब्रह्मराक्षसो!) छींक तथा कीटके संसर्गसे दूषित, उच्छिष्ट भोजन, केशयुक्त, तिरस्कृत एवं श्वासवायुसे दूषित अन्न तुम राक्षसोंका भाग होगा॥ ३४—३८॥ |
| तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वान् अन्यान्येतानि वर्जयेत्।<br>राक्षसानामसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्तेऽन्नमीदृशम्॥ ३९<br><br>शोधयित्वा तु तत्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मोक्षार्थं रक्षसां तेषां संगमं तत्र कल्पयन्॥ ४०<br><br>अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकविश्रुते।<br>त्रिरात्रोपोषितः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४१<br><br>प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्मे प्रत्युपस्थिते।<br>अरुणासंगमे स्नात्वा मुक्तिमाप्नोति मानवः॥ ४२<br><br>ततस्ते राक्षसाः सर्वे स्नाताः पापविवर्जिताः।<br>दिव्यमाल्याम्बरधराः स्वर्गस्थितिसमन्विताः॥ ४३ | (पुनः लोमहर्षणजी बोले—) ऋषियो! इसको जानकर विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इस प्रकारके अन्नोंको त्याग दे। इस प्रकार अन्न खानेवाला व्यक्ति राक्षसोंका भाग खाता है। उन तपोधन ऋषियोंने उस तीर्थको शुद्धकर उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये वहाँ एक सङ्गमकी रचना की। [उसका फल इस प्रकार है] लोक-प्रसिद्ध अरुणा और सरस्वतीके सङ्गममें तीन दिनोंतक व्रतपूर्वक स्नान करनेवाला (व्यक्ति) सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। (आगे भी) घोर कलियुग आनेपर तथा अधर्मका अधिक प्रसार हो जानेपर मनुष्य अरुणाके सङ्गममें स्नान करके मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। इसको सुननेके बाद उन सभी राक्षसोंने उसमें स्नान किया और वे निष्पाप हो गये तथा दिव्य माला और वस्त्र धारणकर स्वर्गमें विराजने लगे॥ ३९—४३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥
| १७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४१ |
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इकतालीसवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लोमहर्षण उवाच<br>समुद्रास्तत्र चत्वारो दर्विणा आहृताः पुरा।<br>प्रत्येकं तु नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ १<br>यत्किञ्चित् क्रियते तस्मिंस्तपस्तीर्थे द्विजोत्तमाः।<br>परिपूर्णं हि तत्सर्वमपि दुष्कृतकर्मणः॥ २<br>शतसाहस्रिकं तीर्थं तथैव शतिकं द्विजाः।<br>उभयोर्हि नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br>सोमतीर्थं च तत्रापि सरस्वत्यास्तटे स्थितम्।<br>यस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो राजसूयफलं लभेत्॥ ४ | लोमहर्षणने कहा— प्राचीन कालकी बात है महर्षि दर्वि वहाँ चार समुद्रोंको ले आये थे। उनमेंसे प्रत्येक समुद्रमें स्नान करनेसे मनुष्योंको हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। द्विजोत्तमो ! उस तीर्थमें जो तपस्या की जाती है, वह पापीद्वारा की गयी होनेपर भी सिद्ध हो जाती है। द्विजो ! वहाँ शतसाहस्रिक एवं शतिक नामके दो तीर्थ हैं। उन दोनों ही तीर्थोंमें स्नान करनेवाला मनुष्य हजार गौ-दान करनेका फल प्राप्त करता है। वहीं सरस्वतीके तटपर सोमतीर्थ भी स्थित है, जिसमें स्नान करनेसे पुरुष राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ १—४॥ |
| रेणुकाश्रममासाद्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>मातृभक्त्या च यत्पुण्यं तत्फलं प्राप्नुयान्नरः॥ ५<br>ऋणमोचनमासाद्य तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम्।<br>ऋणैर्मुक्तो भवेन्नित्यं देवर्षिपितृसम्भवैः।<br>कुमारस्याभिषेकं च ओजसं नाम विश्रुतम्॥ ६<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो यशसा च समन्वितः।<br>कुमारपुरमाप्नोति कृत्वा श्राद्धं तु मानवः॥ ७<br>चैत्रषष्ठ्यां सिते पक्षे यस्तु श्राद्धं करिष्यति।<br>गयाश्राद्धे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं प्राप्नुयान्नरः॥ ८ | माताकी सेवा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्य-फलको इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेवाला श्रद्धालु मनुष्य रेणुकातीर्थमें जाकर प्राप्त कर लेता है और ब्रह्माद्वारा सेवित ऋणमोचन नामके तीर्थमें जाकर देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे छूट जाता है। कुमार (कार्तिकेय)-का अभिषेकस्थल ओजसनामसे विख्यात है; उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य कीर्ति प्राप्त करता है और वहाँ श्राद्ध करनेसे उसे कार्तिकेयके लोककी प्राप्ति होती है। चैत्रमासकी शुक्ला षष्ठी तिथिमें जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करेगा, वह गयामें श्राद्ध करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्यको प्राप्त करता है॥ ५—८॥ |
| संनिहत्यां यथा श्राद्धं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तथा श्राद्धं तत्र कृतं नात्र कार्या विचारणा॥ ९<br>ओजसे ह्यक्षयं श्राद्धं वायुना कथितं पुरा।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत्॥ १०<br>यस्तु स्नानं श्रद्दधानश्चैत्रषष्ठ्यां करिष्यति।<br>अक्षय्यमुदकं तस्य पितॄणामुपजायते॥ ११<br>तत्र पञ्चवटं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>महादेवः स्थितो यत्र योगमूर्तिधरः स्वयम्॥ १२ | राहुद्वारा सूर्यके ग्रस्त हो जानेपर (सूर्यग्रहण लगनेपर) सन्निहतीतीर्थमें किये गये श्राद्धके समान वहाँका श्राद्ध पुण्यप्रद होता है; इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वसमयमें वायुने कहा था कि ओजसतीर्थमें किये गये श्राद्धका क्षय नहीं होता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके दिन जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा, उसके पितरोंको अक्षय (कभी भी क्षय न होनेवाले) जलकी प्राप्ति होगी। तीनों लोकोंमें विख्यात एक ‘पञ्चवट’ नामका तीर्थ है, जहाँ स्वयं भगवान् महादेव योगसाधना करनेकी मुद्रामें विराजमान हैं॥ ९—१२॥ |
अध्याय ४१ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका वर्णन १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च देवदेवं महेश्वरम्।<br>गाणपत्यमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते॥ १३<br>कुरुतीर्थं च विख्यातं कुरुणा यत्र वै तपः।<br>तप्तं सुघोरं क्षेत्रस्य कर्षणार्थं द्विजोत्तमाः॥ १४<br>तस्य घोरेण तपसा तुष्ट इन्द्रोऽब्रवीद् वचः।<br>राजर्षे परितुष्टोऽस्मि तपसाऽनेन सुव्रत॥ १५<br>यज्ञं ये च कुरुक्षेत्रे करिष्यन्ति शतक्रतोः।<br>ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान्॥ १६<br>अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं प्रभुः।<br>आगम्यागम्य चैवेनं भूयो भूयो वहस्य च॥ १७<br>शतक्रतुरनिर्विण्णः पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह।<br>यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष देहमात्मनः।<br>ततः शक्रोऽब्रवीत् प्रीत्या ब्रूहि यत्ते चिकीर्षितम्॥ १८ | उस (पञ्चवट) स्थानपर स्नान करके देवाधिदेव महादेवकी पूजा करनेवाला मनुष्य गणपतिपद और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता हुआ प्रसन्न रहता है। श्रेष्ठ द्विजो! 'कुरुतीर्थ' विख्यात तीर्थ है, जिसमें कुरुने कीर्तिकी प्राप्तिके लिये धर्मकी खेती करनेके लिये तपस्या की थी। उनकी घोर तपस्यासे प्रसन्न होकर इन्द्रने कहा—सुन्दर व्रतोंके करनेवाले राजर्षि! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं संतुष्ट हूँ। (सुनो) इस कुरुक्षेत्रमें जो लोग इन्द्रका यज्ञ करेंगे, वे लोग पापरहित हो जायँगे और पवित्र लोकोंको प्राप्त होंगे। इतना कहकर इन्द्रदेव मुस्कराकर स्वर्ग चले गये। बिना खिन्न हुए इन्द्र बारंबार आये और उपहासपूर्वक उनसे (उनकी योजनाके सम्बन्धमें कुछ) पूछ-पूछकर चले गये। कुरुने जब उग्र तपस्याद्वारा अपनी देहका कर्षण किया तो इन्द्रने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—'कुरु! तुम्हें जो कुछ करनेकी इच्छा हो उसे कहो'॥ १३-१८॥ |
| कुरुरुवाच<br>ये श्रद्दधानास्तीर्थेऽस्मिन् मानवा निवसन्ति ह।<br>ते प्राप्नुवन्तु सदनं ब्राह्मणाः परमात्मनः॥ १९<br>अन्यत्र कृतपापा ये पञ्चपातकदूषिताः।<br>अस्मिंस्तीर्थे नराः स्नात्वा मुक्ता यान्तु परां गतिम्॥ २०<br>कुरुक्षेत्रे पुण्यतमं कुरुतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>तं दृष्ट्वा पापमुक्तस्तु परं पदमवाप्नुयात्॥ २१<br>कुरुतीर्थे नरः स्नातो मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>कुरुणा समनुज्ञातः प्राप्नोति परमं पदम्॥ २२ | कुरुने कहा— इन्द्रदेव! जो श्रद्धालु मानव इस तीर्थमें निवास करते हैं, वे परमात्मरूप परब्रह्मके लोकको प्राप्त करते हैं। इस स्थानसे अन्यत्र पाप करनेवालों एवं पञ्चपातकोंसे दूषित मनुष्य भी इस तीर्थमें स्नान करनेसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त करता है। (लोमहर्षणने कहा—) श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रमें कुरुतीर्थ सर्वाधिक पवित्र है। उसका दर्शन कर पापात्मा मनुष्य (भी) मोक्ष प्राप्त कर लेता है तथा कुरुतीर्थमें स्नानकर पापोंसे छूट जाता है एवं कुरुकी आज्ञासे परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है॥ १९-२२॥ |
| स्वर्गद्वारं ततो गच्छेच्छिवद्वारे व्यवस्थितम्।<br>तत्र स्नात्वा शिवद्वारे प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३<br>ततो गच्छेदनरकं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>यत्र पूर्वे स्थितो ब्रह्मा दक्षिणे तु महेश्वरः॥ २४<br>रुद्रपत्नी पश्चिमतः पद्मनाभोत्तरे स्थितः।<br>मध्ये अनरकं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्॥ २५ | फिर (कुरुतीर्थमें स्नान करनेके बाद) शिवद्वारमें स्थित स्वर्गद्वारको जाय (और स्नान करे); क्योंकि वहाँ (शिवद्वारमें) स्नान करनेसे मनुष्य परमपदको प्राप्त करता है। शिवद्वार जानेके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात अनरक नामके तीर्थमें जाय। उस अनरकके पूर्वमें ब्रह्मा, दक्षिणमें महेश्वर, पश्चिममें रुद्रपत्नी एवं उत्तरमें पद्मनाभ और इन सबके मध्यमें अनरक नामका तीर्थ स्थित है; वह तीनों लोकोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २३-२५॥ |
४४- ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान
| १८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४२ |
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| यस्मिन् स्नातस्तु मुच्येत पातकैरुपपातकैः।<br>वैशाखे च यदा षष्ठी मङ्गलस्य दिनं भवेत्॥ २६<br><br>तदा स्नानं तत्र कृत्वा मुक्तो भवति पातकैः।<br>यः प्रयच्छेत करकांश्चतुरो भक्ष्यसंयुतान्॥ २७<br><br>कलशं च तथा दद्यादपूपैः परिशोभितम्।<br>देवताः प्रीणयेत् पूर्वं करकैरन्नसंयुतैः॥ २८<br><br>ततस्तु कलशं दद्यात् सर्वपातकनाशनम्।<br>अनेनैव विधानेन यस्तु स्नानं समाचरेत्॥ २९<br><br>स मुक्तः कलुषैः सर्वैः प्रयाति परमं पदम्।<br>अन्यत्रापि यदा षष्ठी मङ्गलेन भविष्यति॥ ३०<br><br>तत्रापि मुक्तिफलदा क्रिया तस्मिन् भविष्यति। | जिस (अनरकतीर्थ)-में स्नान करनेवाला मनुष्य छोटे-बड़े सभी पापोंसे छूट जाता है। जब वैशाखमासकी षष्ठी तिथिको मङ्गल दिन हो तब वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाता है। (उस दिन) खाद्य पदार्थसे संयुक्त चार करक (करवे या कमण्डलु) एवं मालपुओं आदिसे सुशोभित कलशका दान करे। पहले अन्नसे युक्त करवोंसे देवताकी पूजा करे, फिर सम्पूर्ण पापोंके नाश करनेवाले कलशका दान करे। जो मानव इस विधानसे स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा और परमपदको प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त (वैशाखके सिवा) अन्य समयमें भी मङ्गलके दिन षष्ठी तिथि होनेपर उस तीर्थमें की हुई पूर्वोक्त क्रिया मुक्ति देनेवाली होगी॥ २६—३०॥ | | तीर्थे च सर्वतीर्थानां यस्मिन् स्नातो द्विजोत्तमाः॥ ३१<br><br>सर्वदेवैरनुज्ञातः परं पदमवाप्नुयात्।<br>काम्यकं च वनं पुण्यं सर्वपातकनाशनम्॥ ३२<br><br>यस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>यमाश्रित्य वनं पुण्यं सविता प्रकटः स्थितः॥ ३३<br><br>पूषा नाम द्विजश्रेष्ठा दर्शनान्मुक्तिमाप्नुयात्।<br>आदित्यस्य दिने प्राप्ते तस्मिन् स्नातस्तु मानवः।<br>विशुद्धदेहो भवति मनसा चिन्तितं लभेत्॥ ३४ | श्रेष्ठ द्विजो ! वहीं समस्त पापोंका विनाश करनेवाला तीर्थ-शिरोमणि काम्यकवन नामका एक तीर्थ है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सभी देवोंकी अनुमतिसे परमपदको प्राप्त करता है। इस वनमें प्रवेश करनेसे ही मनुष्य अपने समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस पवित्र वनमें पूषा नामके सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष रूपसे स्थित हैं। द्विजश्रेष्ठो ! उन सूर्यभगवान्के दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है। रविवारको उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य विशुद्ध-देह हो जाता है और अपने मनोरथको प्राप्त करता है॥ ३१—३४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
|---|---|
| काम्यकस्य तु पूर्वेण कुञ्जं देवैर्निषेवितम्।<br>तस्य तीर्थस्य सम्भूतिं विस्तरेण ब्रवीहि नः॥ १ | (लोमहर्षणजी !) काम्यकवनके पूर्वमें स्थित कुञ्जका आश्रयण देवताओंने किया था, पर उस काम्यकवन-तीर्थकी उत्पत्ति कैसे हुई, इसे आप हमें विस्तारसे बतलाइये॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणजी बोले— |
| शृण्वन्तु मुनयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>ऋषीणां चरितं श्रुत्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः॥ २ | (उत्तर दिया) — मुनियो ! आप सभी लोग इस तीर्थके श्रेष्ठ माहात्म्यको सुनें। ऋषियोंके चरित्रको सुननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
अध्याय ४२] काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन [१८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नैमिषेयाश्च ऋषयः कुरुक्षेत्रे समागताः।<br>सरस्वत्यास्तु स्नानार्थं प्रवेशं ते न लेभिरे॥ ३<br><br>ततस्ते कल्पयामासुस्तीर्थं यज्ञोपवीतिकम्।<br>शेषास्तु मुनयस्तत्र न प्रवेशं हि लेभिरे॥ ४<br><br>रन्तुकस्याश्रमात्तावद् यावत्तीर्थं सचक्रकम्।<br>ब्राह्मणैः परिपूर्णं तु दृष्ट्वा देवी सरस्वती॥ ५<br><br>हितार्थं सर्वविप्राणां कृत्वा कुञ्जानि सा नदी।<br>प्रयाता पश्चिमं मार्गं सर्वभूतहिते स्थिता॥ ६ | (एक बारकी बात है—) नैमिषारण्यके निवासी ऋषि सरस्वती नदीमें स्नान करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये। परंतु वे सरस्वतीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश न पा सके। तब उन्होंने यज्ञोपवीतिक नामके एक तीर्थकी कल्पना कर ली। (पर फिर भी) शेष मुनिलोग उसमें भी प्रवेश न पा सके। सरस्वतीने देखा कि रन्तुक आश्रमसे सचक्रकतक जितने भी तीर्थस्थल हैं, वे सब-के-सब ब्राह्मणोंसे भर गये हैं। इसलिये सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये उस सरस्वती नदीने कुञ्ज बना दिया और सभी प्राणियोंकी भलाईमें तत्पर होकर वह पश्चिम मार्गको (पश्चिमवाहिनी बनकर) चल पड़ी॥ २—६॥ |
| पूर्वप्रवाहे यः स्नाति गङ्गास्नानफलं लभेत्।<br>प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरितां वरा॥ ७<br><br>पश्चिमे तु दिशाभागे यमुना संश्रिता नदी।<br>यदा उत्तरतो याति सिन्धुर्भवति सा नदी॥ ८<br><br>एवं दिशाप्रवाहेण याति पुण्या सरस्वती।<br>तस्यां स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः॥ ९ | जो मनुष्य सरस्वतीके पूर्वी प्रवाहमें स्नान करता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। उसके दक्षिणी प्रवाहमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा एवं पश्चिम दिशाकी ओर यमुना नदी संश्रित है। किंतु जब वह उत्तर दिशाकी ओर बहने लगती है तो वह सिन्धु हो जाती है। इस प्रकार विभिन्न दिशाओंमें वह पवित्र सरस्वती नदी (भिन्न-भिन्न रूपोंमें) प्रवाहित होती है। उस सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाला मनुष्य मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। द्विजश्रेष्ठो! सरस्वती नदीमें स्नान करनेके बाद तीर्थसेवीको तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध महात्मा मदनके 'विहार' नामक तीर्थमें जाना चाहिये॥ ७—१०॥ |
| ततो गच्छेद् द्विजश्रेष्ठा मदनस्य महात्मनः।<br>तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं विहारं नाम नामतः॥ १०<br><br>यत्र देवाः समागम्य शिवदर्शनकाङ्क्षिणः।<br>समागता न चापश्यन् देवं देव्या समन्वितम्॥ ११<br><br>ते स्तुवन्तो महादेवं नन्दिनं गणनायकम्।<br>ततः प्रसन्नो नन्दीशः कथयामास चेष्टितम्॥ १२<br><br>भवस्य उमया सार्धं विहारे क्रीडितं महत्।<br>तच्छ्रुत्वा देवतास्तत्र पत्नीराहूय क्रीडिताः॥ १३<br><br>तेषां क्रीडाविनोदेन तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>योऽस्मिंस्तीर्थे नरः स्नाति विहारे श्रद्धयान्वितः॥ १४<br><br>धनधान्यप्रियैर्युक्तो भवते नात्र संशयः।<br>दुर्गातीर्थं ततो गच्छेद् दुर्गया सेवितं महत्॥ १५ | जहाँपर भगवान् शिवके दर्शनाभिलाषी देवता आये, पर वे उमासहित शिवका दर्शन न कर पाये। वे लोग गणनायक महादेव नन्दीकी स्तुति करने लगे। इससे नन्दीश्वर प्रसन्न हो गये और (उन्होंने) उमाके साथ की जा रही शिवकी महती विहार-क्रीडाका वर्णन किया। यह सुनकर देवताओंने भी अपनी पत्नियोंको बुलाया और उनके साथ (उन लोगोंने भी) क्रीडा की। उनके क्रीडा-विनोदसे शंकर प्रसन्न हो गये और बोले—इस विहार-तीर्थमें जो श्रद्धाके साथ स्नान करेगा, वह निःसंदेह धन-धान्य एवं प्रिय सम्बन्धियोंसे सम्पन्न होगा। उमा-शिवके विहार-स्थलकी यात्राके बाद दुर्गासे प्रतिष्ठित उस महान् दुर्गातीर्थमें जाना चाहिये॥ ११—१५॥ |
| यत्र स्नात्वा पितॄन् पूज्य न दुर्गतिमवाप्नुयात्।<br><br>तत्रापि च सरस्वत्याः कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ १६ | जहाँ स्नानकर पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको दुर्गति की प्राप्ति नहीं होती। उसी स्थानपर तीनों लोकोंमें |
| १८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४२ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| दर्शनान्मुक्तिमाप्नोति सर्वपातकवर्जितः।<br>यस्तत्र तर्पयेद् देवान् पितृंश्च श्रद्धयान्वितः ॥ १७<br><br>अक्षय्यं लभते सर्वं पितृतीर्थं विशिष्यते।<br>मातृहा पितृहा यश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १८<br><br>स्नात्वा शुद्धिमवाप्नोति यत्र प्राची सरस्वती।<br>देवमार्गप्रविष्टा च देवमार्गेण निःसृता ॥ १९ | प्रसिद्ध सरस्वतीका एक कूप है। उसका दर्शन करनेमात्रसे ही मनुष्य सभी पापोंसे रहित हो जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है। जो वहाँ श्रद्धापूर्वक देवता और पितरोंका तर्पण करता है, वह व्यक्ति समस्त अक्षय्य (कभी भी नष्ट न होनेवाले) पदार्थोंको प्राप्त करता है। पितृतीर्थकी विशेष महत्ता है। उस तीर्थमें माता, पिता और ब्राह्मणका घातक तथा गुरुपत्नीगामी भी स्नान करनेसे (ही) शुद्ध हो जाता है। वहीं पूर्व दिशाकी ओर बहनेवाली सरस्वती देवमार्गमें प्रविष्ट होकर देवमार्गसे ही निकली हुई है॥ १६—१९॥ |
| प्राची सरस्वती पुण्या अपि दुष्कृतकर्मणाम्।<br>त्रिरात्रं ये करिष्यन्ति प्राचीं प्राप्य सरस्वतीम् ॥ २०<br><br>न तेषां दुष्कृतं किंचिद् देहमाश्रित्य तिष्ठति।<br>नरनारायणौ देवौ ब्रह्मा स्थाणुस्तथा रविः ॥ २१<br><br>प्राचीं दिशं निषेवन्ते सदा देवाः सवासवाः।<br>ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राचीमाश्रित्य मानवाः ॥ २२<br><br>तेषां न दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।<br>तस्मात् प्राची सदा सेव्या पञ्चम्यां च विशेषतः ॥ २३<br><br>पञ्चम्यां सेवमानस्तु लक्ष्मीवाञ्जायते नरः।<br>तत्र तीर्थमौशनसं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ॥ २४<br><br>उशना यत्र संसिद्ध आराध्य परमेश्वरम्।<br>ग्रहमध्येषु पूज्यते तस्य तीर्थस्य सेवनात् ॥ २५ | पूर्ववाहिनी सरस्वती दुष्कर्मियोंके लिये भी पुण्य देनेवाली है। जो प्राची सरस्वतीके निकट जाकर त्रिरात्रव्रत करता है, उसके शरीरमें कोई पाप नहीं रह जाता। नर और नारायण—ये दोनों देव, ब्रह्मा, स्थाणु तथा सूर्य एवं इन्द्रसहित सभी देवता प्राची दिशाका सेवन करते हैं। जो मानव प्राची सरस्वतीमें श्राद्ध करेंगे, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। अतः प्राची सरस्वतीका सर्वदा सेवन करना चाहिये—विशेषतः पञ्चमीके दिन। पञ्चमी तिथिको प्राची सरस्वतीका सेवन करनेवाला मनुष्य लक्ष्मीवान् होता है। वहीं तीनों लोकोंमें दुर्लभ औशनस नामका तीर्थ है, जहाँ परमेश्वरकी आराधना कर शुक्राचार्य सिद्ध हो गये थे। उस तीर्थका सेवन करनेसे ग्रहोंके मध्य उनकी पूजा होती है॥ २०—२५॥ |
| एवं शुक्रेण मुनिना सेवितं तीर्थमुत्तमम्।<br>ये सेवन्ते श्रद्दधानास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ २६<br><br>यस्तु श्राद्धं नरो भक्त्या तस्मिंस्तीर्थे करिष्यति।<br>पितरस्तारितास्तेन भविष्यन्ति न संशयः ॥ २७<br><br>चतुर्मुखं ब्रह्मतीर्थं सरो मर्यादया स्थितम्।<br>ये सेवन्ते चतुर्दश्यां सोपवासा वसन्ति च ॥ २८<br><br>अष्टम्यां कृष्णपक्षस्य चैत्रे मासि द्विजोत्तमाः।<br>ते पश्यन्ति परं सूक्ष्मं यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ २९<br><br>स्थाणुतीर्थं ततो गच्छेत् सहस्रलिङ्गशोभितम्।<br>तत्र स्थाणुवटं दृष्ट्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः ॥ ३० | इस प्रकार शुक्रमुनिके द्वारा सेवित उत्तमतीर्थका जो श्रद्धापूर्वक (स्वयं) सेवन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति श्राद्ध करेगा, उसके द्वारा उसके पितर निःसन्देह तर जायँगे। द्विजोत्तमो! जो सरोवरकी मर्यादासे स्थित चतुर्मुख ब्रह्मतीर्थमें चतुर्दशीके दिन उपवासव्रत करते हैं तथा चैत्रमासके कृष्णपक्षकी अष्टमीतक निवास करके तीर्थका सेवन करते हैं, उन्हें परम सूक्ष्म (तत्त्व)-का दर्शन प्राप्त होता है; जिससे वे पुनः संसारमें नहीं आते। ब्रह्मतीर्थके नियम पालन करनेके बाद सहस्रलिङ्गसे शोभित स्थाणुतीर्थमें जाय। वहाँ स्थाणुवटका दर्शन प्राप्त कर मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो जाता है॥ २६—३०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४२॥
४५- सांनिहितसर—स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन
अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८३
तिरालीसवाँ अध्याय
स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर
| ऋषय ऊचुः | (स्थाणुतीर्थमें जाने तथा स्थाणुवटके दर्शनसे मुक्ति-प्राप्ति होनेकी बात सुननेके बाद) ऋषियोंने पूछा— महामुने! आप स्थाणुतीर्थ एवं स्थाणुवटके माहात्म्य तथा सांनिहित्य सरोवरकी उत्पत्ति और इन्द्रद्वारा उसके धूलसे भरे जानेके कारणका वर्णन करें। (इसी प्रकार) लिङ्गोंके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा स्पर्शसे होनेवाले फल और सरोवरके माहात्म्यका भी पूर्णतः वर्णन करें॥ १-२॥ |
|---|---|
| स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं वटस्य च महामुने।<br>सांनिहत्यसरोत्पत्तिं पूरणं पांशुना ततः॥ १<br>लिङ्गानां दर्शनात् पुण्यं स्पर्शनेन च किं फलम्।<br>तथैव सरमाहात्म्यं ब्रूहि सर्वमशेषतः॥ २ | |
| लोमहर्षण उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयः सर्वे पुराणं वामनं महत्।<br>यच्छ्रुत्वा मुक्तिमाप्नोति प्रसादाद् वामनस्य तु॥ ३<br>सनत्कुमारमासीनं स्थाणोर्वटसमीपतः।<br>ऋषिभिर्बालखिल्यैराद्यैर्ब्रह्मपुत्रैर्महात्मभिः ॥ ४<br>मार्कण्डेयो मुनिस्तत्र विनयेनाभिगम्य च।<br>पप्रच्छ सरमाहात्म्यं प्रमाणं च स्थितिं तथा॥ ५ | लोमहर्षणजी बोले— मुनियो! आपलोग महान् वामनपुराणको श्रवण करें, जिसका श्रवण कर मनुष्य वामनभगवान्की कृपासे मुक्ति पा लेता है। (एक समय) ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमार महात्मा बालखिल्य आदि ऋषियोंके साथ स्थाणुवटके पास बैठे हुए थे। महर्षि मार्कण्डेयने उनके निकट जाकर नम्रतापूर्वक सरोवरके माहात्म्य, उसके विस्तार और स्थितिके विषयमें पूछा—॥ ३-५॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>ब्रह्मपुत्र महाभाग सर्वशास्त्रविशारद।<br>ब्रूहि मे सरमाहात्म्यं सर्वपापक्षयावहम्॥ ६<br>कानि तीर्थानि दृश्यानि गुह्यानि द्विजसत्तम।<br>लिङ्गानि ह्यतिपुण्यानि स्थाणोर्यानि समीपतः॥ ७<br>येषां दर्शनमात्रेण मुक्तिं प्राप्नोति मानवः।<br>वटस्य दर्शनं पुण्यमुत्पत्तिं कथयस्व मे॥ ८<br>प्रदक्षिणायां यत्पुण्यं तीर्थस्नानेन यत्फलम्।<br>गुह्येषु चैव दृष्टेषु यत्पुण्यमभिजायते॥ ९<br>देवदेवो यथा स्थाणुः सरोमध्ये व्यवस्थितः।<br>किमर्थं पांशुना शक्रस्तीर्थं पूरितवान् पुनः॥ १०<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं चक्रतीर्थस्य यत्फलम्।<br>सूर्यतीर्थस्य माहात्म्यं सोमतीर्थस्य ब्रूहि मे॥ ११ | मार्कण्डेयजीने कहा (पूछा)— सर्वशास्त्रविशारद महाभाग ब्रह्मपुत्र (सनत्कुमार)! आप मुझसे सभी पापोंके नष्ट करनेवाले सरोवरके माहात्म्यको कहिये। द्विजश्रेष्ठ! स्थाणुतीर्थके पास कौन-कौन-से तीर्थ दृश्य हैं और कौन-कौन-से अदृश्य और कौन-से लिङ्ग अत्यन्त पवित्र हैं, जिनका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। मुने! आप स्थाणुवटके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा उसकी उत्पत्तिके विषयमें भी कहिये—बताइये। इनकी प्रदक्षिणा करनेसे होनेवाले पुण्य, तीर्थमें स्नान करनेसे मिलनेवाले फल एवं गुप्त तीर्थों तथा प्रकट तीर्थोंके दर्शनसे मिलनेवाले पुण्यका भी वर्णन करें। प्रभो! सरोवरके मध्यमें देवाधिदेव स्थाणु (शिव) किस प्रकार स्थित हुए और किस कारणसे इन्द्रने इस तीर्थको पुनः धूलिसे भर दिया? आप स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, चक्रतीर्थका फल एवं सूर्यतीर्थ तथा सोमतीर्थका माहात्म्य—इन |
| १८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४३ |
|---|
| शंकरस्य च गुह्यानि विष्णोः स्थानानि यानि च।<br>कथयस्व महाभाग सरस्वत्याः सविस्तरम्॥ १२ | सबको मुझसे कहिये। महाभाग! सरस्वतीके निकट शंकर तथा विष्णुके जो-जो गुप्त स्थान हैं उनका भी आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें। |
| ब्रूहि देवाधिदेवस्य माहात्म्यं देव तत्त्वतः।<br>विरिञ्चस्य प्रसादेन विदितं सर्वमेव च॥ १३ | देव! देवाधिदेवके माहात्म्यको आप भलीभाँति बतावें; क्योंकि ब्रह्माकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है॥ ६—१३॥ |
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया)— |
| मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा ब्रह्मात्मा स महामुनिः।<br>अतिभक्त्या तु तीर्थस्य प्रवणीकृतमानसः॥ १४ | मार्कण्डेयके वचनको सुनकर ब्रह्मस्वरूप महामुनिका मन उस तीर्थके प्रति अत्यन्त भक्ति-प्रवण होनेसे गद्गद हो गया। |
| पर्यङ्कं शिथिलीकृत्वा नमस्कृत्वा महेश्वरम्।<br>कथयामास तत्सर्वं यच्छ्रुतं ब्रह्मणः पुरा॥ १५ | उन्होंने आसनसे उठकर भगवान् शंकरको प्रणाम किया तथा प्राचीन कालमें ब्रह्मासे इसके विषयमें जो कुछ सुना था उन सबका वर्णन किया॥ १४-१५॥ |
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— |
| नमस्कृत्य महादेवमीशानं वरदं शिवम्।<br>उत्पत्तिं च प्रवक्ष्यामि तीर्थानां ब्रह्मभाषिताम्॥ १६ | मैं कल्याणकर्ता, वरदानी महादेव ईशानको नमस्कार कर ब्रह्मासे कहे हुए तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन करूँगा। |
| पूर्वमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>बृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजसम्भवम्॥ १७ | प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया और सर्वत्र केवल जल-ही-जल हो गया एवं उसमें समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया, तब प्रजाओंके बीजस्वरूप एक 'अण्ड' उत्पन्न हुआ। |
| तस्मिन्नण्डे स्थितो ब्रह्मा शयनायोपचक्रमे।<br>सहस्रयुगपर्यन्तं सुप्त्वा स प्रत्यबुध्यत॥ १८ | ब्रह्मा उस अण्डमें स्थित थे। उन्होंने उसमें अपने सोनेका उपक्रम किया। फिर तो वे हजारों युगोंतक सोते रहे। उसके बाद जगे। |
| सुप्तोत्थितस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमपश्यत।<br>सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च॥ १९ | ब्रह्मा जब सोकर उठे, तब उन्होंने संसारको शून्य देखा। (जब उन्होंने संसारमें कुछ भी नहीं देखा) तब रजोगुणसे आविष्ट हो गये और सृष्टिके विषयमें विचार करने लगे॥ १६—१९॥ |
| रजः सृष्टिगुणं प्रोक्तं सत्त्वं स्थितिगुणं विदुः।<br>उपसंहारकाले च तमोगुणः प्रवर्तते॥ २० | रजोगुणको सृष्टिकारक तथा सत्त्वगुणको स्थितिकारक माना गया है। उपसंहार करनेके समयमें तमोगुणकी प्रवृत्ति होती है। |
| गुणातीतः स भगवान् व्यापकः पुरुषः स्मृतः।<br>तेनेदं सकलं व्याप्तं यत्किंचिज्जीवसंज्ञितम्॥ २१ | परंतु भगवान् वास्तवमें व्यापक एवं गुणातीत हैं। वे पुरुष नामसे कहे जाते हैं। जीव नामसे निर्दिष्ट सारे पदार्थ उन्हींसे ओतप्रोत हैं। |
| स ब्रह्मा स च गोविन्द ईश्वरः स सनातनः।<br>यस्तं वेद महात्मानं स सर्वं वेद मोक्षवित्॥ २२ | वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही विष्णु हैं और वे ही सनातन महेश्वर हैं। मोक्षके ज्ञानी जिस प्राणीने उन महान् आत्माको समझ लिया, उसने सब कुछ जान लिया। |
| किं तेषां सकलैस्तीर्थैराश्रमैर्वा प्रयोजनम्।<br>येषामनन्तकं चित्तमात्मन्येव व्यवस्थितम्॥ २३ | जिस मनुष्यका अनन्त (बहुमुखी) चित्त उन परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित है, उनके लिये सारे तीर्थ एवं आश्रमोंसे क्या प्रयोजन?॥ २०—२३॥ |
| आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था<br>सत्योदका शीलसमाधियुक्ता। | यह आत्मारूपी नदी शील और समाधिसे युक्त है। इसमें संयमरूपी पवित्र तीर्थ है, जो सत्यरूपी जलसे |
अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८५ तस्यां स्नातः पुण्यकर्मा पुनाति न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ॥ २४ एतत्प्रधानं पुरुषस्य कर्म यदात्मसम्बोधसुखे प्रविष्टम्। ज्ञेयं तदेव प्रवदन्ति सन्त- स्तत्प्राप्य देही विजहाति कामान् ॥ २५ नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च। शीले स्थितिर्दण्डविधानवर्जन- मक्रोधनश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ २६ एतद् ब्रह्म समासेन मयोक्तं ते द्विजोत्तम। यज्ज्ञात्वा ब्रह्म परमं प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥ २७ इदानीं शृणु चोत्पत्तिं ब्रह्मणः परमात्मनः। इमं चोदाहरन्त्येव श्लोकं नारायणं प्रति ॥ २८ आपो नारा वै तनव इत्येवं नाम शुश्रुमः। तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः ॥ २९ विबुद्धः सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतं जगत्। अण्डं बिभेद भगवांस्तस्मादोमित्यजायत ॥ ३० ततो भूरभवत् तस्माद् भुव इत्यपरः स्मृतः। स्वः शब्दश्च तृतीयोऽभूद् भूर्भुवः स्वेति संज्ञितः ॥ ३१ तस्मात्तेजः समभवत् तत्सवितुर्वरेण्यं यत्। उदकं शोषयामास यत्तेजोऽण्डविनिःसृतम् ॥ ३२ तेजसा शोषितं शेषं कललत्वमुपागतम्। कललाद् बुद्बुदं ज्ञेयं ततः काठिन्यतां गतम् ॥ ३३ काठिन्याद् धरणी ज्ञेया भूतानां धारिणी हि सा। यस्मिन् स्थाने स्थितं ह्याण्डं तस्मिन् संनिहितं सरः ॥ ३४ यदाद्यं निःसृतं तेजस्तस्मादादित्य उच्यते। अण्डमध्ये समुत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३५ उल्बं तस्याभवन्मेरुर्जरायुः पर्वताः स्मृताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तथा नद्यः सहस्रशः ॥ ३६ परिपूर्ण है। जो पुण्यात्मा इस (नदी)-में स्नान करता है, वह पवित्र हो जाता है, (पिये जानेवाले सामान्य) जलसे अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती। इसलिये पुरुषका मुख्य कर्तव्य है कि वह आत्मज्ञानरूपी सुखमें प्रविष्ट रहे। महात्मा लोग उसीको 'ज्ञेय' कहते हैं। शरीर धारण करनेवाला देही जब उसे पा लेता है, तब सभी इच्छाओंको छोड़ देता है। ब्राह्मणके लिये एकता, समता, सत्यता, मर्यादामें स्थिति, दण्ड-विधानका त्याग, क्रोध न करना एवं (सांसारिक) क्रियाओंसे विराग ही धन है, इनके समान उनके लिये कोई अन्य धन नहीं है। द्विजोत्तम! मैंने थोड़ी मात्रामें तुमसे यह जो ज्ञानके विषयमें कहा है, इसे जानकर तुम निःसंदेह परम ब्रह्मको प्राप्त करोगे। अब तुम परमात्मा ब्रह्मकी उत्पत्तिके विषयमें सुनो। उस नारायणके विषयमें लोग इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं- ॥ २४-२८ ॥ 'आप्' (जल) ही को 'नार', (एवं परमात्मा)- को 'तनु' - ऐसा हमने सुन रखा है। वे (परमात्मा) उसमें शयन करते हैं, जिससे वे (शब्दव्युत्पत्तिसे) 'नारायण' शब्दसे स्मरण किये गये हैं। जलमें सोनेके बाद जाग जानेपर उन्होंने जगत्को अपनेमें प्रविष्ट जानकर अण्डको तोड़ दिया, उससे 'ॐ' शब्दकी उत्पत्ति हुई। इसके बाद उससे (पहली बार) भूः, दूसरी बार भुवः एवं तीसरी बार स्वःकी उत्पत्ति (ध्वनि) हुई। इन तीनोंका नाम क्रमशः मिलकर 'भूर्भुवःस्वः' हुआ। उस सविता देवताका जो वरेण्य तेज है, वह उसीसे उत्पन्न हुआ। अण्डसे जो तेज निकला, उसने जलको सुखा दिया ॥ २९-३२ ॥ तेजसे जलके सोखे जानेपर शेष जल कललकी आकृतिमें बदल गया। कललसे बुद्बुद हुआ और उसके बाद वह कठोर हो गया। कठोर हो जानेके कारण वह बुद्बुद भूतोंको धारण करनेवाली धरणी बन गया। जिस स्थानपर अण्ड स्थित था, वहीं संनिहित नामका सरोवर है। तेजके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण उसे 'आदित्य' नामसे कहा जाता है। फिर सारे संसारके पितामह ब्रह्मा अण्डके मध्यमें उत्पन्न हुए। उस अण्डका उल्ब (गर्भका आवरण) मेरु पर्वत है एवं अन्य पर्वत उसके जरायु (झिल्ली) माने जाते हैं। समुद्र एवं सहस्रों नदियाँ
४६- स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य
| १८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नाभिस्थाने यदुदकं ब्रह्मणो निर्मलं महत्।<br>महत्सरस्तेन पूर्णं विमलेन वराम्भसा॥ ३७ | गर्भके जल हैं। ब्रह्माके नाभि-स्थानमें जो विशाल निर्मल जल राशि है, उस स्वच्छ श्रेष्ठ जलसे महान् सरोवर भरा-पूरा है॥ ३३—३७॥ |
| तस्मिन् मध्ये स्थाणुरूपी वटवृक्षो महामनाः।<br>तस्माद् विनिर्गता वर्णा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः॥ ३८<br><br>शूद्राश्च तस्मादुत्पन्नाः शुश्रूषार्थं द्विजन्मनाम्।<br>ततश्चिन्तयतः सृष्टिं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।<br>मनसा मानसा जाताः सनकाद्या महर्षयः॥ ३९<br><br>पुनश्चिन्तयतस्तस्य प्रजाकामस्य धीमतः।<br>उत्पन्ना ऋषयः सप्त ते प्रजापतयोऽभवन्॥ ४०<br><br>पुनश्चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च।<br>बालखिल्याः समुत्पन्नास्तपःस्वाध्यायतत्पराः॥ ४१ | उस सरोवरके मध्यमें स्थाणुके आकारका महान् विशाल एक वटवृक्ष है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण उससे निकले और द्विजोंकी शुश्रूषा करनेके लिये उसीसे शूद्रोंकी भी उत्पत्ति हुई। (इस प्रकार चारों वर्णोंकी सृष्टि सरोवरके मध्यमें स्थाणुरूपसे स्थित वटवृक्षसे हुई।) उसके बाद सृष्टिकी चिन्ता करते हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके मनसे सनकादि महर्षियोंकी उत्पत्ति हुई। फिर प्रजाकी इच्छासे चिन्तन कर रहे मतिमान् ब्रह्मासे सात ऋषि उत्पन्न हुए। वे प्रजापति हुए। रजोगुणसे मोहित होकर ब्रह्माने जब पुनः चिन्तन किया, तब तप एवं स्वाध्यायमें परायण बालखिल्य ऋषियोंकी उत्पत्ति हुई॥ ३८—४१॥ |
| ते सदा स्नाननिरता देवार्चनपरायणाः।<br>उपवासैर्व्रतैस्तीव्रैः शोषयन्ति कलेवरम्॥ ४२<br><br>वानप्रस्थेन विधिना अग्निहोत्रसमन्विताः।<br>तपसा परमेणेह शोषयन्ति कलेवरम्॥ ४३<br><br>दिव्यं वर्षसहस्रं ते कृशा धमनिसंतताः।<br>आराधयन्ति देवेशं न च तुष्यति शंकरः॥ ४४<br><br>ततः कालेन महता उमया सह शंकरः।<br>आकाशमार्गेण तदा दृष्ट्वा देवी सुदुःखिता॥ ४५<br><br>प्रसाद्य देवदेवेशं शंकरं प्राह सुव्रता।<br>क्लिश्यन्ते ते मुनिगणा देवदारुवनाश्रयाः॥ ४६<br><br>तेषां क्लेशक्षयं देव विधेहि कुरु मे दयाम्।<br>किं वेदधर्मनिष्ठानामनन्तं देव दुष्कृतम्॥ ४७<br><br>नाद्यापि येन शुद्ध्यन्ति शुष्कस्राव्यस्थिशोषिताः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः पिनाकी पतितान्धकः।<br>प्रोवाच प्रहसन् मूर्ध्नि चारुचन्द्रांशुशोभितः॥ ४८ | वे सर्वदा स्नान (शुद्धि) करनेमें निरत तथा देवताओंकी पूजा करनेमें विशेषरूपसे लगे रहते तथा उपवासों एवं तीव्र व्रतोंसे अपने शरीरको सुखाये जा रहे थे। अग्निहोत्रसे युक्त होकर वानप्रस्थकी विधिसे वे उत्कृष्ट तपस्या करते और अपने शरीर सुखाते जाते थे। वे लोग अत्यन्त दुर्बल एवं कंकाल-काय होकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक देवेशकी उपासना करते रहे; परंतु भगवान् शंकर प्रसन्न न हुए। उसके बहुत दिनोंके बाद उमाके साथ भगवान् शंकर आकाश-मार्गसे भ्रमण कर रहे थे। धार्मिक कार्योंको करनेवाली उमा (बालखिल्योंकी) इस प्रकारकी दशा (कंकालमात्र) देखकर दुःखी हो गयीं और दुःखी होकर देवदेवेश शंकरको प्रसन्नकर कहने लगीं—देव! देवदारु-वनमें रहनेवाले वे मुनिगण क्लेश उठा रहे हैं। देव! मेरे ऊपर दया करें। आप उनके क्लेशका विनाश करें। देव! वैदिक धर्ममें निष्ठा रखनेवाले इन (तपस्वियों)-के कौन ऐसा अनन्त दुष्कृत है, जिससे ये कङ्गालमात्र होनेपर भी अबतक शुद्ध नहीं हुए? अन्धकको मार गिरानेवाले, चन्द्रमाकी मनोहर किरणोंसे सुशोभित सिरवाले पिनाकधारी शंकरजी उमाकी बातको सुनकर हँसते हुए बोले—॥ ४२—४८॥ |
| श्रीमहादेव उवाच<br><br>न वेत्सि देवि तत्त्वेन धर्मस्य गहना गतिः।<br>नैते धर्मं विजानन्ति न च कामविवर्जिताः॥ ४९ | श्रीमहादेवजी बोले— देवि! धर्मकी गति गहन होती है। तुम उसे तत्त्वतः नहीं जानती। ये लोग न तो धर्मज्ञ हैं |
| अध्याय ४३ ] | स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर | १८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न च क्रोधेन निर्मुक्ताः केवलं मूढबुद्धयः।<br>एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् देवी मा मैवं शंसितव्रतान् ॥ ५०<br><br>देव दर्शयात्मानं परं कौतूहलं हि मे।<br>स इत्युक्त उवाचेदं देवीं देवः स्मिताननः ॥ ५१<br><br>तिष्ठ त्वमत्र यास्यामि यत्रैते मुनिपुंगवाः।<br>साधयन्ति तपो घोरं दर्शयिष्यामि चेष्टितम् ॥ ५२ | और न कामशून्य। ये क्रोधसे मुक्त भी नहीं हैं और विचार-रहित हैं। यह सुनकर उमादेवीने कहा—नहीं, व्रत धारण करनेवाले इन लोगोंको ऐसा मत कहिये; (प्रत्युत) देव! आप अपनेको प्रकट करें। निश्चय ही मुझे बड़ा कौतूहल है। उमाके ऐसा कहनेपर शंकरने मुस्कुराकर देवीसे इस प्रकार कहा—अच्छा, तुम यहाँ रुको। ये मुनिश्रेष्ठ जहाँ घोर तपस्याकी साधना कर रहे हैं, वहाँ जाकर मैं इनकी चेष्टा कैसी है, उसे दिखलाता हूँ॥ ४९—५२॥ |
| इत्युक्ता तु ततो देवी शंकरेण महात्मना।<br>गच्छस्वेत्याह मुदिता भर्तारं भुवनेश्वरम् ॥ ५३<br><br>यत्र ते मुनयः सर्वे काष्ठलोष्ठसमाः स्थिताः।<br>अधीयाना महाभागाः कृताग्निसदनक्रियाः ॥ ५४<br><br>तान् विलोक्य ततो देवो नग्नः सर्वाङ्गसुन्दरः।<br>वनमालाकृतापीडो युवा भिक्षाकपालभृत् ॥ ५५<br><br>आश्रमे पर्यटन् भिक्षां मुनीनां दर्शनं प्रति।<br>देहि भिक्षां ततश्चोक्त्वा ह्याश्रमादाश्रमं ययौ ॥ ५६ | जब महात्मा शंकरने देवी उमासे इस प्रकार कहा तब उमादेवी प्रसन्न हो गयीं और भुवनोंके पालन करनेवाले भुवनेश्वर शिवसे बोलीं—अच्छा, जिस स्थानपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेके समान निश्चेष्ट, अग्निहोत्री एवं अध्ययनमें लगे हुए मुनिगण रहते हैं, उस स्थानपर आप जायँ। (फिर उमाद्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर शंकरजी मुनिमण्डलीकी ओर जानेके लिये प्रस्तुत हो गये) फिर शंकरने उस मुनिमण्डलीको देखकर वनमाला धारण कर लिया। तब वे सर्वाङ्गसुन्दर (पर) नग्न-सुडौल देह धारण कर युवाके रूपमें हो गये और भिक्षा-पात्र हाथमें लेकर मुनियोंके सामने भिक्षाके लिये भ्रमण करते हुए 'भिक्षा दो' यह कहते हुए एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाने लगे ॥ ५३—५६ ॥ |
| तं विलोक्याश्रमगतं योषितो ब्रह्मवादिनाम्।<br>सकौतुकस्वभावेन तस्य रूपेण मोहिताः ॥ ५७<br><br>प्रोचुः परस्परं नार्य एहि पश्याम भिक्षुकम्।<br>परस्परमिति चोक्त्वा गृह्य मूलफलं बहु ॥ ५८<br><br>गृहाण भिक्षामूचुस्तास्तं देवं मुनियोषितः।<br>स तु भिक्षाकपालं तं प्रसार्य बहु सादरम् ॥ ५९<br><br>देहि देहि शिवं वोऽस्तु भवतीभ्यस्तपोवने।<br>हसमानस्तु देवेशस्तत्र देव्या निरीक्षितः।<br>तस्मै दत्त्वैव तां भिक्षां पप्रच्छुस्तं स्मरातुराः ॥ ६० | एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें घूम रहे उन नग्न युवाको देखकर ब्रह्मवादियोंकी स्त्रियाँ उत्सुकताके साथ स्वभाववश उनके रूपसे मोहित हो गयीं और परस्परमें कहने लगीं—आओ, भिक्षुकको देखा जाय। आपसमें इस प्रकार कहकर बहुत-सा मूल-फल लेकर मुनि-पत्नियोंने उन देवसे कहा—आप भिक्षा ग्रहण करें। उन्होंने भी अत्यन्त आदरसे उस भिक्षापात्रको फैलाकर (सामने दिखाकर) कहा-तपोवनवासिनियो! (भिक्षा) दो, दो! आप सबका कल्याण हो। पार्वतीजी वहाँ हँसते हुए शंकरको देख रही थीं। कामातुर मुनिपत्नियोंने उस नग्न युवाको भिक्षा देकर उनसे पूछा— ॥ ५७–६०॥ |
| नार्य ऊचुः<br><br>कोऽसौ नाम व्रतविधिस्त्वया तापस सेव्यते।<br>यत्र नग्नेन लिङ्गेन वनमालाविभूषितः।<br>भवान् वै तापसो हृद्यो हृद्याः स्मो यदि मन्यसे ॥ ६१ | **मुनिपत्नियोंने पूछा—**तापस! आप किस व्रतके विधानका पालन कर रहे हैं, जिसमें वनमालासे विभूषित हृदयहारी तपस्वीका सुन्दर स्वरूप धारण कर नग्न-मूर्ति बनना पड़ा है? आप हमारे हृदयके आनन्दप्रद तापस हैं, यदि आप मानें तो हम भी आपकी |
१८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३ इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिताननः । इदमीदृग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥ ६२ शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते । अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्वा गमिष्यथ ॥ ६३ एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम् । रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुकं महत् ॥ ६४ इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः । काचित् कण्ठे सकन्दर्पा बाहुभ्यामपरास्तथा ॥ ६५ जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः । अपरास्तु कटीरन्धे अपराः पादयोरपि ॥ ६६ क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोषिताम् । हन्यतामिति संभाष्य काष्ठपाषाणपाणयः ॥ ६७ पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमुद्धृत्य भीषणम् । पतिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ६८ देव्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः । पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नष्टे चराचरे ॥ ६९ क्षोभो बभूव सुमहानृषीणां भावितात्मनाम् । एवं देवे तदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥ ७० उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः । न वयं विद्मः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ॥ ७१ विरिञ्चिं शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् । एवमुक्ताः सर्व एव ऋषयो लज्जिता भृशम् ॥ ७२ ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निषेवितम् । प्रणिपत्याथ देवेशं लज्जयाऽधोमुखाः स्थिताः ॥ ७३ अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुषीकृताः ॥ ७४ न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मूढबुद्धयः । श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः क्रूरचेष्टिताः ॥ ७५ मनोऽनुकूल प्रिया हो सकती हैं। उन्होंने तपस्विनियोंके इस प्रकार कहनेपर हँसते हुए कहा - यह व्रत ऐसा है कि इसका कुछ भी रहस्य प्रकट नहीं किया जा सकता। सौभाग्यशालिनियो ! जहाँ बहुत-से सुननेवाले हों वहाँ इस व्रतकी व्याख्या नहीं की जा सकती। इसलिये यह जानकर आप सभी चली जायँ। उनके ऐसा कहनेपर उन्होंने मुनिसे कहा - मुने ! हम सब (यह जाननेके लिये) एकान्तमें चलेंगी; (क्योंकि) हमें महान् कौतूहल हो रहा है ॥ ६१-६४ ॥ यह कहकर उन सभीने उनको अपने कोमल हाथोंसे पकड़ लिया। कुछ कामसे आतुर होकर कण्ठसे लिपट गयीं और कुछने उन्हें भुजाओंमें बाँध लिया; कुछ स्त्रियोंने उन्हें घुटनोंसे पकड़ लिया; कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ उनके केश छूने लगीं; और कुछ उनकी कमरसे लिपट गयीं एवं कुछने उनके पैरोंको पकड़ लिया। मुनियोंने आश्रममें अपनी स्त्रियोंकी अधीरता देख 'मारो-मारो' - इस प्रकार कहते हुए हाथोंमें डंडा और पत्थर लेकर शिवके लिङ्गको ही उखाड़कर फेंक दिया। लिङ्गके गिरा दिये जानेपर भगवान् शंकर अन्तर्हित हो गये ॥ ६५-६८ ॥ वे भगवान् रुद्र उमादेवीके साथ कैलास पर्वतपर चले गये। देवदेव शंकरके लिङ्गके गिरनेपर प्रायः समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया। इससे आत्मनिष्ठ महर्षियोंको व्याकुलता हुई। इसी प्रकार देवके (भी) व्याकुल हो जानेपर एक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ मुनिने कहा - हम उन महात्मा तापसके सद्भाव (सदाशय) - को नहीं जानते। हम ब्रह्माकी शरणमें चलें। वे ही उनकी चेष्टा (रहस्य) समझ सकेंगे। ऐसा कहनेपर सभी ऋषि अत्यन्त लज्जित हो गये ॥ ६९-७२ ॥ फिर, वे लोग देवताओंसे उपासित ब्रह्माके लोकमें गये। वहाँ देवेश (ब्रह्मा) - को प्रणाम कर लज्जासे मुख नीचा कर खड़े हो गये। उसके बाद ब्रह्माने उन्हें दुःखी देखकर यह वचन कहा - अहो, क्रोध करनेसे तुम सबका मन कलुषित हो गया है, इसलिये मूढ़ हो गये हो। मूढ बुद्धिवालो ! तुम सब धर्मकी कोई वास्तविक क्रिया नहीं जानते। अप्रिय कर्म करनेवाले तापसो ! धर्मके सारभूत रहस्यको सुनो, जिसे
अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८९ विदित्वा यद् बुधः क्षिप्रं धर्मस्य फलमाप्नुयात्। योऽसावात्मनि देहेऽस्मिन् विभुर्नित्यो व्यवस्थितः ॥ ७६ सोऽनादिः स महास्थाणुः पृथक्त्वे परिसूचितः। मणिर्यथोपधानेन धत्ते वर्णोज्ज्वलोऽपि वै ॥ ७७ तन्मयो भवते तद्वदात्माऽपि मनसा कृतः। मनसो भेदमाश्रित्य कर्मभिश्चोपचीयते ॥ ७८ ततः कर्मवशाद् भुङ्क्ते संभोगान् स्वर्गनारकान्। तन्मनः शोधयेद् धीमाञ्ज्ञानयोगाद्युपक्रमैः ॥ ७९ तस्मिञ्छुद्धे ह्यन्तरात्मा स्वयमेव निराकुलः। न शरीरस्य संक्लेशैरपि निर्दहनात्मकैः ॥ ८० शुद्धिमाप्नोति पुरुषः संशुद्धं यस्य नो मनः। क्रिया हि नियमार्थाय पातकेभ्यः प्रकीर्तिताः ॥ ८१ यस्मादत्याविलं देहं न शीघ्रं शुद्ध्यते किल। तेन लोकेषु मार्गोऽयं सत्पथस्य प्रवर्तितः ॥ ८२ वर्णाश्रमविभागोऽयं लोकाध्यक्षेण केनचित्। निर्मितो मोहमाहात्म्यं चिह्नं चोत्तमभागिनाम् ॥ ८३ भवन्तः क्रोधकामाभ्यामभिभूताश्रमे स्थिताः। ज्ञानिनामाश्रमो वेश्म अनाश्रममयोगिनाम् ॥ ८४ क्व च न्यस्तसमस्तेच्छा क्व च नारीमयो भ्रमः। क्व क्रोधमीदृशं घोरं येनात्मानं न जानथ ॥ ८५ यत्क्रोधनो यजति यच्च ददाति नित्यं यद् वा तपस्तपति यच्च जुहोति तस्य। प्राप्नोति नैव किमपीह फलं हि लोके मोघं फलं भवति तस्य हि क्रोधनस्य ॥ ८६ जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शीघ्र ही कर्मका फल प्राप्त करता है। हम सबके इस शरीरमें रहनेवाला जो नित्य विभु (परमेश्वर) है, वह आदि-अन्त-रहित एवं महा स्थाणु है। (विचार करनेपर) वह (देही) इस शरीरसे अलग प्रतीत होता है। जिस प्रकार उज्ज्वल वर्णकी मणि भी आश्रयके प्रभावसे उसी रूपकी भासती है, उसी प्रकार आत्मा भी मनसे संयुक्त होकर मनके भेदका आश्रय कर कर्मोंसे ढक जाता है। उसके बाद कर्मवश वह स्वर्गीय तथा नारकीय भोगोंको भोगता रहता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि ज्ञान तथा योग आदि उपायोंद्वारा मनका शोधन करे ॥ ७३-७९ ॥ मनके शुद्ध होनेपर अन्तरात्मा अपने-आप निर्मल हो जाता है। जिसका मन शुद्ध नहीं है, ऐसा पुरुष शरीरको सुखानेवाले क्लेशोंके द्वारा शुद्ध नहीं होता। पापोंसे बचनेके लिये ही (धर्म्य) क्रियाओंका विधान हुआ है, अतः अत्यन्त पापपूर्ण शरीर (स्वतः) शीघ्र शुद्ध नहीं होता। इसीलिये लोकमें सत्पथ-शास्त्रविहित क्रियाओंका यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है। किसी दिव्यद्रष्टा लोक-स्वामीने उत्तम भाग्यवालोंके निमित्त मोह-माहात्म्यके प्रतीकस्वरूप इस वर्णाश्रम-विभागका निर्माण किया है ॥ ८०-८३ ॥ आपलोग आश्रममें रहते हुए भी क्रोध तथा कामके वशीभूत हैं। ज्ञानियोंके लिये घर ही आश्रम है और अयोगियों (अज्ञानियों)-के लिये आश्रम भी अनाश्रम है। कहाँ समस्त कामनाओंका त्याग और कहाँ नारीमय यह भ्रम-जाल। (कहाँ तप और) कहाँ तो इस प्रकारका क्रोध, जिससे तुमलोग अपने आत्मा (शिव)-को नहीं पहचान पाते। क्रोधी पुरुष लोकमें जो सदा यज्ञ करता है, जो दान देता है अथवा जो तप या हवन करता है, उसका कोई फल उसे नहीं मिलता। उस क्रोधीके सभी फल व्यर्थ होते हैं ॥ ८४-८६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४३ ॥
४७- स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक, वेनके उद्धारके लिये पृथुका प्रयत्न और वेनकी शिव-स्तुति
| १९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४४ |
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चौवालीसवाँ अध्याय
ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— उन सभी ऋषियोंने ब्रह्माकी इस वाणीको सुनकर संसारके कल्याणार्थ पुनः उपाय पूछा॥ १॥ |
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| ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते।<br>पुनरेव च पप्रच्छुर्जगतः श्रेयकारणम्॥ १ | |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— (उत्तर दिया) (आओ), हम सभी लोग हाथमें शूल धारण करनेवाले, त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। तुम सब लोग उन्हीं देवदेवके प्रसादसे पहले-जैसे हो जाओगे। ब्रह्माके ऐसा कहनेपर वे लोग उनके साथ श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर चले गये और वहाँ उन लोगोंने उमा (पार्वती)-के साथ बैठे हुए शंकरका दर्शन किया। उसके बाद संसारके पितामह ब्रह्माने देवोंके इष्टदेव, तीनों लोकोंके स्वामी वरदानी भगवान् शंकरकी स्तुति करनी आरम्भ की—॥ २—४॥ |
| गच्छामः शरणं देवं शूलपाणिं त्रिलोचनम्।<br>प्रसादाद् देवदेवस्य भविष्यथ यथा पुरा॥ २ | |
| इत्युक्ता ब्रह्मणा सार्धं कैलासं गिरिमुत्तमम्।<br>ददृशुस्ते समासीनमुमया सहितं हरम्॥ ३ | |
| ततः स्तोतुं समारब्धो ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>देवाधिदेवं वरदं त्रैलोक्यस्य प्रभुं शिवम्॥ ४ | |
| ब्रह्मोवाच | पिनाक धारण करनेवाले वरदानी अनन्त महादेव! स्थाणुस्वरूप परमात्मदेव! आपको मेरा नमस्कार है। भुवनोंके स्वामी भुवनेश्वर तारक भगवान्! आपको सदा नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप ज्ञान देनेवाले अद्वितीय देव हैं। आप कमलगर्भ एवं पद्मेश हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। (प्रचण्ड) घोर-स्वरूप एवं शान्तिमूर्ति! आपको नमस्कार है। विश्वके शासकदेव! आपको नमस्कार है। सुरनायक! आपको नमस्कार है। शूलपाणि शंकर! आपको नमस्कार है। (संसारके रचनेवाले) विश्वभावन! आपको मेरा नमस्कार है॥ ५—८॥ |
| अनन्ताय नमस्तुभ्यं वरदाय पिनाकिने।<br>महादेवाय देवाय स्थाणवे परमात्मने॥ ५ | |
| नमोऽस्तु भुवनेशाय तुभ्यं तारक सर्वदा।<br>ज्ञानानां दायको देवस्त्वमेकः पुरुषोत्तमः॥ ६ | |
| नमस्ते पद्मगर्भाय पद्मेशाय नमो नमः।<br>घोरशान्तिस्वरूपाय चण्डक्रोध नमोऽस्तु ते॥ ७ | |
| नमस्ते देव विश्वेश नमस्ते सुरनायक।<br>शूलपाणे नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥ ८ | |
| एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा ऋषिभिस्तदा।<br>उवाच मा भैर्व्रजत लिङ्गं वो भविता पुनः॥ ९ | ऋषियों और ब्रह्माने जब इस प्रकार शंकरकी स्तुति की तब महादेव शङ्करने कहा—भय मत करो; जाओ (तुमलोगोंके कल्याणार्थ) लिङ्ग फिर भी (उत्पन्न) हो जायगा। मेरे वचनका शीघ्र पालन करो। लिङ्गकी प्रतिष्ठा कर देनेपर निस्सन्देह मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी। जो व्यक्ति भक्तिके साथ मेरे लिङ्गकी पूजा करेंगे उनके लिये कोई भी पदार्थ कभी दुर्लभ न होगा। |
| क्रियतां मद्वचः शीघ्रं येन मे प्रीतिरुत्तमा।<br>भविष्यति प्रतिष्ठायां लिङ्गस्यात्र न संशयः॥ १० | |
| ये लिङ्गं पूजयिष्यन्ति मामकं भक्तिमाश्रिताः।<br>न तेषां दुर्लभं किंचिद् भविष्यति कदाचन॥ ११ |
| अध्याय ४४ ] | ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन | १९१ |
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| सर्वेषामेव पापानां कृतानामपि जानता।<br>शुद्ध्यते लिङ्गपूजायां नात्र कार्या विचारणा॥ १२ | जानकर किये गये समस्त पापोंकी भी शुद्धि लिङ्गकी पूजा करनेसे हो जाती है; इसमें किसी प्रकारका अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ९—१२॥ | | युष्माभिः पतितं लिङ्गं सारयित्वा महत्सरः।<br>सांनिहत्यं तु विख्यातं तस्मिञ्शीघ्रं प्रतिष्ठितम्॥ १३<br><br>यथाभिलषितं कामं ततः प्राप्स्यथ ब्राह्मणाः।<br>स्थाणुर्नाम्ना हि लोकेषु पूजनीयो दिवौकसाम्॥ १४<br><br>स्थाण्वीश्वरे स्थितो यस्मात्स्थाण्वीश्वरस्ततः स्मृतः।<br>ये स्मरन्ति सदा स्थाणुं ते मुक्ताः सर्वकिल्बिषैः॥ १५<br><br>भविष्यन्ति शुद्धदेहा दर्शनान्मोक्षगामिनः।<br>इत्येवमुक्ता देवेन ऋषयो ब्रह्मणा सह॥ १६<br><br>तस्माद् दारुवनाल्लिङ्गं नेतुं समुपचक्रमुः।<br>न तं चालयितुं शक्तास्ते देवा ऋषिभिः सह॥ १७ | तुमलोगोंने लिङ्गको गिरा दिया है, इसलिये शीघ्र ही उसे उठाकर प्रसिद्ध महान् सांनिहित्य-सरोवरमें स्थापित करो। ब्राह्मणो! ऐसा करनेसे तुमलोग अपने इच्छानुकूल मनोरथोंको प्राप्त करोगे। सारे संसारमें उस लिङ्गकी प्रसिद्धि स्थाणु नामसे होगी। देवताओंद्वारा (भी) वह पूज्य होगा। वह लिङ्ग स्थाण्वीश्वरमें स्थित रहनेके कारण स्थाण्वीश्वर नामसे स्मरण किया जायगा। जो स्थाण्वीश्वरको सदा स्मरण करेंगे, उनके सारे पाप कट जायँगे और वे पवित्र-देह होकर मोक्षकी प्राप्ति करेंगे। जब शंकरने ऐसा कहा तब ब्रह्माके सहित ऋषिलोग लिङ्गको उस दारुवनसे ले जानेका उद्योग करने लगे। किंतु ऋषियोंसहित वे सभी देवगण उसे हिलाने-डुलानेमें समर्थ न हो सके॥ १३—१७॥ | | श्रमेण महता युक्ता ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तेषां श्रमाभितप्तानामिदं ब्रह्माऽब्रवीद् वचः॥ १८<br><br>किं वा श्रमेण महता न यूयं वहनक्षमाः।<br>स्वेच्छया पतितं लिङ्गं देवदेवेन शूलिना॥ १९<br><br>तस्मात् तमेव शरणं यास्यामः सहिताः सुराः।<br>प्रसन्नश्च महादेवः स्वयमेव नयिष्यति॥ २०<br><br>इत्येवमुक्ता ऋषयो देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>कैलासं गिरिमासेदू रुद्रदर्शनकाङ्क्षिणः॥ २१ | (फिर) वे बहुत परिश्रम करके ब्रह्माकी शरणमें गये। ब्रह्माने परिश्रमसे श्रान्त-क्लान्त (संतप्त) हुए उन लोगोंसे यह वचन कहा—देवताओ! अत्यन्त कठोर परिश्रम करनेसे क्या लाभ? तुमलोग इसे उठानेमें समर्थ नहीं हो। देवाधिदेव भगवान् शंकरने अपनी इच्छासे इस लिङ्गको गिराया है। अतः हे देवो! हम सभी एक साथ उन्हीं भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। महादेव सन्तुष्ट होकर अपने-आप ही (लिङ्गको) ले जायँगे। इस प्रकार ब्रह्माके कहनेपर सभी ऋषि और देवता ब्रह्माके साथ शंकरजीके दर्शनकी अभिलाषासे कैलासपर्वतपर पहुँचे॥ १८—२१॥ | | न च पश्यन्ति तं देवं ततश्चिन्तासमन्विताः।<br>ब्रह्माणमूचुर्मुनयः क्व स देवो महेश्वरः॥ २२<br><br>ततो ब्रह्मा चिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा देवं महेश्वरम्।<br>हस्तिरूपेण तिष्ठन्तं मुनिभिर्मानसैः स्तुतम्॥ २३<br><br>अथ ते ऋषयः सर्वे देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>गता महत्सरः पुण्यं यत्र देवः स्वयं स्थितः॥ २४<br><br>न च पश्यन्ति तं देवमन्विष्यन्तस्ततस्ततः।<br>ततश्चिन्तान्विता देवा ब्रह्मणा सहिताः स्थिताः॥ २५ | वहाँ उन लोगोंने शंकरजीको नहीं देखा। तब वे चिन्तित हो गये। फिर उन्होंने ब्रह्माजीसे पूछा (कि ब्रह्मन्) वे महेश्वरदेव कहाँ हैं? उसके बाद ब्रह्माने चिरकालतक ध्यान लगाया और देखा कि मुनियोंके अन्तः-करणसे स्तुत महेश्वर देव हाथीके आकारमें स्थित हैं। उसके पश्चात् वे ऋषि और ब्रह्माके सहित सभी देवता उस पावन महान् सरोवरपर गये जहाँ भगवान् शंकर स्वयं उपस्थित थे। वे लोग वहाँ इधर-उधर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ने लगे, फिर भी शंकरजीका दर्शन न पा सके। ब्रह्माके साथ दर्शन न पानेके कारण सभी देवता चिन्तित |