वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४० |
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| तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः।<br>अथान्विषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥ १८<br><br>तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्महत्याभयान्नदी।<br>अपोवाह वसिष्ठं तं मध्ये चैवाम्भसस्तदा।<br>उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥ १९<br><br>ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम्।<br>अब्रवीत् क्रोधरक्ताक्षो विश्वामित्रो महातपाः ॥ २०<br><br>यस्मान्मां सरितां श्रेष्ठे वञ्चयित्वा विनिर्गता।<br>शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंयुता ॥ २१ | उसके बाद सरस्वतीद्वारा बहाकर लाये गये वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र क्रोधसे भर गये और वसिष्ठका अन्त करनेवाला शस्त्र ढूँढ़ने लगे। उन्हें क्रोधसे भरा हुआ देखकर ब्रह्महत्याके भयसे डरती हुई वह सरस्वती नदी गाधिपुत्र विश्वामित्रको वञ्चित कर दोनोंकी बातोंका पालन करती हुई उन वसिष्ठको जलमें (पुनः) बहा ले गयी। उसके बाद ऋषिप्रवर वसिष्ठको अपवाहित होते देखकर महातपस्वी विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर विश्वामित्रने कहा—ओ श्रेष्ठ नदी! यतः तुम मुझे वञ्चितकर चली गयी हो, कल्याणि! अतः श्रेष्ठ राक्षसोंसे संयुक्त होकर तुम शोणितका वहन करो—तुम्हारा जल रक्तसे युक्त हो जाय ॥ १८–२१ ॥ | | ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता।<br>अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ॥ २२<br><br>अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा।<br>सरस्वतीं तदा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ २३<br><br>तस्मिंस्तीर्थवरे पुण्ये शोणितं समुपावहत्।<br>ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसाश्च समागताः ॥ २४<br><br>ततस्ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते।<br>तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः।<br>नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥ २५ | उसके बाद बुद्धिमान् विश्वामित्रसे इस प्रकार शाप प्राप्तकर सरस्वतीने एक वर्षतक रक्तसे मिले हुए जलको बहाया। उसके पश्चात् सरस्वती नदीको रक्तसे मिश्रित जलवाली देखकर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ अत्यन्त दुःखित हो गयीं। (यतः) उस पवित्र श्रेष्ठ तीर्थमें रुधिर ही बहने लगा। अतः वहाँ भूत, पिशाच, राक्षस एकत्र होने लगे। वे सभी रक्तका पान करते हुए वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगे। वे उससे अत्यन्त तृप्त, सुखी एवं निश्चिन्त होकर इस प्रकार नाचने एवं हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गको जीत लिया हो ॥ २२–२५ ॥ | | कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषयः सतपोधनाः।<br>तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां तपोधनाः ॥ २६<br><br>तां दृष्ट्वा राक्षसैर्घोरैः पीयमानां महानदीम्।<br>परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥ २७<br><br>ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः।<br>आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥ २८<br><br>किं कारणं सरिच्छ्रेष्ठे शोणितेन ह्रदो ह्यहम्।<br>एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा वेत्स्यामहे वयम् ॥ २९ | कुछ समय बीतनेपर तपस्याके धनी ऋषिलोग तीर्थयात्रा करते-करते सरस्वतीके तटपर पहुँचे। (वहाँ) भयानक राक्षसोंके द्वारा पीती जाती हुई महानदी सरस्वतीको देखकर वे उसकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करने लगे। और महान् व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाले उन महाभागोंने श्रेष्ठ नदीको (पास) बुलाकर उससे यह वचन फिर कहा—श्रेष्ठ सरिते! हम सब आपसे यह जानना चाहते हैं कि यह जलाशय रक्तसे भरकर ऐसा क्षुब्ध कैसे हुआ है? ॥ २६–२९ ॥ | | ततः सा सर्वमाचष्ट विश्वामित्रविचेष्टितम्।<br><br>ततस्ते मुनयः प्रीताः सरस्वत्यां समानयन्।<br><br>अरुणां पुण्यतोयौघां सर्वदुष्कृतनाशिनीम् ॥ ३० | तब उसने विश्वामित्रके समस्त विकर्मोंका (उनके सामने ही) वर्णन किया। उसके पश्चात् प्रसन्न हुए मुनिजन सरस्वती तथा समस्त पापोंका विनाश करनेवाली अरुणा नदीको ले आये। (जिससे सरस्वती-ह्रदका |