भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| अध्याय ४० ] | वसिष्ठापवाह नामक तीर्थका उत्पत्ति-प्रसङ्ग | १७५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थे बभूव ह।<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे विश्वामित्रस्य धीमतः॥ ३<br>यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम्।<br>स्थापयामास देवेशो लिङ्गाकारां सरस्वतीम्॥ ४<br>वसिष्ठस्तत्र तपसा घोररूपेण संस्थितः।<br>तस्येह तपसा हीनो विश्वामित्रो बभूव ह॥ ५वसिष्ठका आश्रम स्थाणुतीर्थमें था और उसके पश्चिम दिशामें बुद्धिमान् विश्वामित्र महर्षिका आश्रम था; जहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवने यज्ञ करनेके बाद सरस्वतीकी पूजा कर मूर्तिके रूपमें सरस्वतीकी स्थापना की थी। वसिष्ठजी वहीं घोर तपस्यामें संलग्न थे। उनकी तपस्यासे विश्वामित्र (प्रभावतः) हीन-से होने लगे॥ २-५॥
सरस्वतीं समाहूय इदं वचनमब्रवीत्।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं स्वेन वेगेन आनय॥ ६<br>इहाहं तं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः।<br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यथिता सा महानदी॥ ७<br>तथा तां व्यथितां दृष्ट्वा वेपमानां महानदीम्।<br>विश्वामित्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय॥ ८<br>ततो गत्वा सरिच्छ्रेष्ठा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्।<br>कथयामास रुदतो विश्वामित्रस्य तद् वचः॥ ९(एक बार) विश्वामित्रने सरस्वतीको बुलाकर यह वचन कहा—सरस्वति! तुम मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको अपने वेगसे बहा लाओ। मैं उन द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठको यहाँ मारूँगा—इसमें संदेहकी बात नहीं है। इस (अवाञ्छनीय बात)-को सुनकर वह महानदी दुःखित हो गयी। (पर) विश्वामित्रने उस प्रकार दुःखित एवं काँपती हुई उस महानदीको देखकर क्रोधमें भरकर कहा कि वसिष्ठको शीघ्र लाओ। उसके बाद उस श्रेष्ठ नदीने मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उनसे रोते हुए विश्वामित्रकी उस बातको कहा॥ ६-९॥
तपःक्रियाविशीर्णां च भृशं शोकसमन्विताम्।<br>उवाच स सरिच्छ्रेष्ठां विश्वामित्राय मां वह॥ १०<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित्।<br>चालयामास तं स्थानात् प्रवाहेणाम्भसस्तदा॥ ११<br>स च कूलापहारेण मित्रावरुणयोः सुतः।<br>उह्यमानश्च तुष्टाव तदा देवीं सरस्वतीम्॥ १२<br>पितामहस्य सरसः प्रवृत्ताऽसि सरस्वति।<br>व्याप्तं त्वया जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः॥ १३उन वसिष्ठजीने तपश्चर्यासे दुर्बल एवं अतिशय शोक-समन्वित उस श्रेष्ठ सरिता (सरस्वती)-से कहा—(तुम) विश्वामित्रके पास मुझे बहा ले चलो। उन दयालुके उस वचनको सुनकर उस सरस्वती सरिताने जलके (तेज) प्रवाहद्वारा उन्हें उस स्थानसे बहाना प्रारम्भ किया। किनारेसे ले जाये जानेके कारण बहते हुए मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठ-ऋषि प्रसन्न होकर देवी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे—सरस्वति! आप ब्रह्माके सरोवरसे निकली हैं। आपने अपने उत्तम जलसे समस्त जगत्को व्याप्त कर दिया है॥ १०-१३॥
त्वमेवाकाशगा देवी मेघेषु सृजसे पयः।<br>सर्वास्त्वापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहे॥ १४<br>पुष्टिर्धृतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिः कान्तिः क्षमा तथा।<br>स्वधा स्वाहा तथा वाणी तवायत्तमिदं जगत्॥ १५<br>त्वमेव सर्वभूतेषु वाणीरूपेण संस्थिता।<br>एवं सरस्वती तेन स्तुता भगवती सदा॥ १६<br>सुखेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति।<br>न्यवेदयत्तदा खिन्ना विश्वामित्राय तं मुनिम्॥ १७'आप ही आकाशगामिनी देवी हैं और मेघोंमें जलको उत्पन्न करती हैं। आप ही सभी जलोंके रूपमें वर्तमान हैं। आपकी ही शक्तिसे हमलोग अध्ययन करते हैं। आप ही पुष्टि, धृति, कीर्ति, सिद्धि, कान्ति, क्षमा, स्वधा, स्वाहा तथा सरस्वती हैं। यह पूरा विश्व आपके ही अधीन है। आप ही समस्त प्राणियोंमें वाणीरूपसे स्थित हैं।' वसिष्ठजीने भगवती सरस्वतीकी इस प्रकार स्तुति की और सरस्वती नदीने उन विप्रदेवको विश्वामित्रके आश्रममें सुखपूर्वक पहुँचा दिया और खिन्न होकर उन मुनिको विश्वामित्रके लिये निवेदित कर दिया॥ १४-१७॥