वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४२ |
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| यस्मिन् स्नातस्तु मुच्येत पातकैरुपपातकैः।<br>वैशाखे च यदा षष्ठी मङ्गलस्य दिनं भवेत्॥ २६<br><br>तदा स्नानं तत्र कृत्वा मुक्तो भवति पातकैः।<br>यः प्रयच्छेत करकांश्चतुरो भक्ष्यसंयुतान्॥ २७<br><br>कलशं च तथा दद्यादपूपैः परिशोभितम्।<br>देवताः प्रीणयेत् पूर्वं करकैरन्नसंयुतैः॥ २८<br><br>ततस्तु कलशं दद्यात् सर्वपातकनाशनम्।<br>अनेनैव विधानेन यस्तु स्नानं समाचरेत्॥ २९<br><br>स मुक्तः कलुषैः सर्वैः प्रयाति परमं पदम्।<br>अन्यत्रापि यदा षष्ठी मङ्गलेन भविष्यति॥ ३०<br><br>तत्रापि मुक्तिफलदा क्रिया तस्मिन् भविष्यति। | जिस (अनरकतीर्थ)-में स्नान करनेवाला मनुष्य छोटे-बड़े सभी पापोंसे छूट जाता है। जब वैशाखमासकी षष्ठी तिथिको मङ्गल दिन हो तब वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाता है। (उस दिन) खाद्य पदार्थसे संयुक्त चार करक (करवे या कमण्डलु) एवं मालपुओं आदिसे सुशोभित कलशका दान करे। पहले अन्नसे युक्त करवोंसे देवताकी पूजा करे, फिर सम्पूर्ण पापोंके नाश करनेवाले कलशका दान करे। जो मानव इस विधानसे स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा और परमपदको प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त (वैशाखके सिवा) अन्य समयमें भी मङ्गलके दिन षष्ठी तिथि होनेपर उस तीर्थमें की हुई पूर्वोक्त क्रिया मुक्ति देनेवाली होगी॥ २६—३०॥ | | तीर्थे च सर्वतीर्थानां यस्मिन् स्नातो द्विजोत्तमाः॥ ३१<br><br>सर्वदेवैरनुज्ञातः परं पदमवाप्नुयात्।<br>काम्यकं च वनं पुण्यं सर्वपातकनाशनम्॥ ३२<br><br>यस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>यमाश्रित्य वनं पुण्यं सविता प्रकटः स्थितः॥ ३३<br><br>पूषा नाम द्विजश्रेष्ठा दर्शनान्मुक्तिमाप्नुयात्।<br>आदित्यस्य दिने प्राप्ते तस्मिन् स्नातस्तु मानवः।<br>विशुद्धदेहो भवति मनसा चिन्तितं लभेत्॥ ३४ | श्रेष्ठ द्विजो ! वहीं समस्त पापोंका विनाश करनेवाला तीर्थ-शिरोमणि काम्यकवन नामका एक तीर्थ है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सभी देवोंकी अनुमतिसे परमपदको प्राप्त करता है। इस वनमें प्रवेश करनेसे ही मनुष्य अपने समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस पवित्र वनमें पूषा नामके सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष रूपसे स्थित हैं। द्विजश्रेष्ठो ! उन सूर्यभगवान्के दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है। रविवारको उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य विशुद्ध-देह हो जाता है और अपने मनोरथको प्राप्त करता है॥ ३१—३४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
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| काम्यकस्य तु पूर्वेण कुञ्जं देवैर्निषेवितम्।<br>तस्य तीर्थस्य सम्भूतिं विस्तरेण ब्रवीहि नः॥ १ | (लोमहर्षणजी !) काम्यकवनके पूर्वमें स्थित कुञ्जका आश्रयण देवताओंने किया था, पर उस काम्यकवन-तीर्थकी उत्पत्ति कैसे हुई, इसे आप हमें विस्तारसे बतलाइये॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणजी बोले— |
| शृण्वन्तु मुनयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>ऋषीणां चरितं श्रुत्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः॥ २ | (उत्तर दिया) — मुनियो ! आप सभी लोग इस तीर्थके श्रेष्ठ माहात्म्यको सुनें। ऋषियोंके चरित्रको सुननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है। |