वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ४१ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका वर्णन १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च देवदेवं महेश्वरम्।<br>गाणपत्यमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते॥ १३<br>कुरुतीर्थं च विख्यातं कुरुणा यत्र वै तपः।<br>तप्तं सुघोरं क्षेत्रस्य कर्षणार्थं द्विजोत्तमाः॥ १४<br>तस्य घोरेण तपसा तुष्ट इन्द्रोऽब्रवीद् वचः।<br>राजर्षे परितुष्टोऽस्मि तपसाऽनेन सुव्रत॥ १५<br>यज्ञं ये च कुरुक्षेत्रे करिष्यन्ति शतक्रतोः।<br>ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान्॥ १६<br>अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं प्रभुः।<br>आगम्यागम्य चैवेनं भूयो भूयो वहस्य च॥ १७<br>शतक्रतुरनिर्विण्णः पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह।<br>यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष देहमात्मनः।<br>ततः शक्रोऽब्रवीत् प्रीत्या ब्रूहि यत्ते चिकीर्षितम्॥ १८ | उस (पञ्चवट) स्थानपर स्नान करके देवाधिदेव महादेवकी पूजा करनेवाला मनुष्य गणपतिपद और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता हुआ प्रसन्न रहता है। श्रेष्ठ द्विजो! 'कुरुतीर्थ' विख्यात तीर्थ है, जिसमें कुरुने कीर्तिकी प्राप्तिके लिये धर्मकी खेती करनेके लिये तपस्या की थी। उनकी घोर तपस्यासे प्रसन्न होकर इन्द्रने कहा—सुन्दर व्रतोंके करनेवाले राजर्षि! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं संतुष्ट हूँ। (सुनो) इस कुरुक्षेत्रमें जो लोग इन्द्रका यज्ञ करेंगे, वे लोग पापरहित हो जायँगे और पवित्र लोकोंको प्राप्त होंगे। इतना कहकर इन्द्रदेव मुस्कराकर स्वर्ग चले गये। बिना खिन्न हुए इन्द्र बारंबार आये और उपहासपूर्वक उनसे (उनकी योजनाके सम्बन्धमें कुछ) पूछ-पूछकर चले गये। कुरुने जब उग्र तपस्याद्वारा अपनी देहका कर्षण किया तो इन्द्रने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—'कुरु! तुम्हें जो कुछ करनेकी इच्छा हो उसे कहो'॥ १३-१८॥ |
| कुरुरुवाच<br>ये श्रद्दधानास्तीर्थेऽस्मिन् मानवा निवसन्ति ह।<br>ते प्राप्नुवन्तु सदनं ब्राह्मणाः परमात्मनः॥ १९<br>अन्यत्र कृतपापा ये पञ्चपातकदूषिताः।<br>अस्मिंस्तीर्थे नराः स्नात्वा मुक्ता यान्तु परां गतिम्॥ २०<br>कुरुक्षेत्रे पुण्यतमं कुरुतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>तं दृष्ट्वा पापमुक्तस्तु परं पदमवाप्नुयात्॥ २१<br>कुरुतीर्थे नरः स्नातो मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>कुरुणा समनुज्ञातः प्राप्नोति परमं पदम्॥ २२ | कुरुने कहा— इन्द्रदेव! जो श्रद्धालु मानव इस तीर्थमें निवास करते हैं, वे परमात्मरूप परब्रह्मके लोकको प्राप्त करते हैं। इस स्थानसे अन्यत्र पाप करनेवालों एवं पञ्चपातकोंसे दूषित मनुष्य भी इस तीर्थमें स्नान करनेसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त करता है। (लोमहर्षणने कहा—) श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रमें कुरुतीर्थ सर्वाधिक पवित्र है। उसका दर्शन कर पापात्मा मनुष्य (भी) मोक्ष प्राप्त कर लेता है तथा कुरुतीर्थमें स्नानकर पापोंसे छूट जाता है एवं कुरुकी आज्ञासे परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है॥ १९-२२॥ |
| स्वर्गद्वारं ततो गच्छेच्छिवद्वारे व्यवस्थितम्।<br>तत्र स्नात्वा शिवद्वारे प्राप्नोति परमं पदम्॥ २३<br>ततो गच्छेदनरकं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>यत्र पूर्वे स्थितो ब्रह्मा दक्षिणे तु महेश्वरः॥ २४<br>रुद्रपत्नी पश्चिमतः पद्मनाभोत्तरे स्थितः।<br>मध्ये अनरकं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्॥ २५ | फिर (कुरुतीर्थमें स्नान करनेके बाद) शिवद्वारमें स्थित स्वर्गद्वारको जाय (और स्नान करे); क्योंकि वहाँ (शिवद्वारमें) स्नान करनेसे मनुष्य परमपदको प्राप्त करता है। शिवद्वार जानेके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात अनरक नामके तीर्थमें जाय। उस अनरकके पूर्वमें ब्रह्मा, दक्षिणमें महेश्वर, पश्चिममें रुद्रपत्नी एवं उत्तरमें पद्मनाभ और इन सबके मध्यमें अनरक नामका तीर्थ स्थित है; वह तीनों लोकोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २३-२५॥ |