भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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१७८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४१

इकतालीसवाँ अध्याय

कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लोमहर्षण उवाच<br>समुद्रास्तत्र चत्वारो दर्विणा आहृताः पुरा।<br>प्रत्येकं तु नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ १<br>यत्किञ्चित् क्रियते तस्मिंस्तपस्तीर्थे द्विजोत्तमाः।<br>परिपूर्णं हि तत्सर्वमपि दुष्कृतकर्मणः॥ २<br>शतसाहस्रिकं तीर्थं तथैव शतिकं द्विजाः।<br>उभयोर्हि नरः स्नातो गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br>सोमतीर्थं च तत्रापि सरस्वत्यास्तटे स्थितम्।<br>यस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो राजसूयफलं लभेत्॥ ४लोमहर्षणने कहा— प्राचीन कालकी बात है महर्षि दर्वि वहाँ चार समुद्रोंको ले आये थे। उनमेंसे प्रत्येक समुद्रमें स्नान करनेसे मनुष्योंको हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। द्विजोत्तमो ! उस तीर्थमें जो तपस्या की जाती है, वह पापीद्वारा की गयी होनेपर भी सिद्ध हो जाती है। द्विजो ! वहाँ शतसाहस्रिक एवं शतिक नामके दो तीर्थ हैं। उन दोनों ही तीर्थोंमें स्नान करनेवाला मनुष्य हजार गौ-दान करनेका फल प्राप्त करता है। वहीं सरस्वतीके तटपर सोमतीर्थ भी स्थित है, जिसमें स्नान करनेसे पुरुष राजसूययज्ञका फल प्राप्त करता है॥ १—४॥
रेणुकाश्रममासाद्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>मातृभक्त्या च यत्पुण्यं तत्फलं प्राप्नुयान्नरः॥ ५<br>ऋणमोचनमासाद्य तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम्।<br>ऋणैर्मुक्तो भवेन्नित्यं देवर्षिपितृसम्भवैः।<br>कुमारस्याभिषेकं च ओजसं नाम विश्रुतम्॥ ६<br>तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो यशसा च समन्वितः।<br>कुमारपुरमाप्नोति कृत्वा श्राद्धं तु मानवः॥ ७<br>चैत्रषष्ठ्यां सिते पक्षे यस्तु श्राद्धं करिष्यति।<br>गयाश्राद्धे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं प्राप्नुयान्नरः॥ ८माताकी सेवा करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्य-फलको इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेवाला श्रद्धालु मनुष्य रेणुकातीर्थमें जाकर प्राप्त कर लेता है और ब्रह्माद्वारा सेवित ऋणमोचन नामके तीर्थमें जाकर देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋणसे छूट जाता है। कुमार (कार्तिकेय)-का अभिषेकस्थल ओजसनामसे विख्यात है; उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य कीर्ति प्राप्त करता है और वहाँ श्राद्ध करनेसे उसे कार्तिकेयके लोककी प्राप्ति होती है। चैत्रमासकी शुक्ला षष्ठी तिथिमें जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करेगा, वह गयामें श्राद्ध करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उस पुण्यको प्राप्त करता है॥ ५—८॥
संनिहत्यां यथा श्राद्धं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तथा श्राद्धं तत्र कृतं नात्र कार्या विचारणा॥ ९<br>ओजसे ह्यक्षयं श्राद्धं वायुना कथितं पुरा।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत्॥ १०<br>यस्तु स्नानं श्रद्दधानश्चैत्रषष्ठ्यां करिष्यति।<br>अक्षय्यमुदकं तस्य पितॄणामुपजायते॥ ११<br>तत्र पञ्चवटं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>महादेवः स्थितो यत्र योगमूर्तिधरः स्वयम्॥ १२राहुद्वारा सूर्यके ग्रस्त हो जानेपर (सूर्यग्रहण लगनेपर) सन्निहतीतीर्थमें किये गये श्राद्धके समान वहाँका श्राद्ध पुण्यप्रद होता है; इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वसमयमें वायुने कहा था कि ओजसतीर्थमें किये गये श्राद्धका क्षय नहीं होता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके दिन जो उसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा, उसके पितरोंको अक्षय (कभी भी क्षय न होनेवाले) जलकी प्राप्ति होगी। तीनों लोकोंमें विख्यात एक ‘पञ्चवट’ नामका तीर्थ है, जहाँ स्वयं भगवान् महादेव योगसाधना करनेकी मुद्रामें विराजमान हैं॥ ९—१२॥