वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ४२] काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन [१८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नैमिषेयाश्च ऋषयः कुरुक्षेत्रे समागताः।<br>सरस्वत्यास्तु स्नानार्थं प्रवेशं ते न लेभिरे॥ ३<br><br>ततस्ते कल्पयामासुस्तीर्थं यज्ञोपवीतिकम्।<br>शेषास्तु मुनयस्तत्र न प्रवेशं हि लेभिरे॥ ४<br><br>रन्तुकस्याश्रमात्तावद् यावत्तीर्थं सचक्रकम्।<br>ब्राह्मणैः परिपूर्णं तु दृष्ट्वा देवी सरस्वती॥ ५<br><br>हितार्थं सर्वविप्राणां कृत्वा कुञ्जानि सा नदी।<br>प्रयाता पश्चिमं मार्गं सर्वभूतहिते स्थिता॥ ६ | (एक बारकी बात है—) नैमिषारण्यके निवासी ऋषि सरस्वती नदीमें स्नान करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये। परंतु वे सरस्वतीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश न पा सके। तब उन्होंने यज्ञोपवीतिक नामके एक तीर्थकी कल्पना कर ली। (पर फिर भी) शेष मुनिलोग उसमें भी प्रवेश न पा सके। सरस्वतीने देखा कि रन्तुक आश्रमसे सचक्रकतक जितने भी तीर्थस्थल हैं, वे सब-के-सब ब्राह्मणोंसे भर गये हैं। इसलिये सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये उस सरस्वती नदीने कुञ्ज बना दिया और सभी प्राणियोंकी भलाईमें तत्पर होकर वह पश्चिम मार्गको (पश्चिमवाहिनी बनकर) चल पड़ी॥ २—६॥ |
| पूर्वप्रवाहे यः स्नाति गङ्गास्नानफलं लभेत्।<br>प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरितां वरा॥ ७<br><br>पश्चिमे तु दिशाभागे यमुना संश्रिता नदी।<br>यदा उत्तरतो याति सिन्धुर्भवति सा नदी॥ ८<br><br>एवं दिशाप्रवाहेण याति पुण्या सरस्वती।<br>तस्यां स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः॥ ९ | जो मनुष्य सरस्वतीके पूर्वी प्रवाहमें स्नान करता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। उसके दक्षिणी प्रवाहमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा एवं पश्चिम दिशाकी ओर यमुना नदी संश्रित है। किंतु जब वह उत्तर दिशाकी ओर बहने लगती है तो वह सिन्धु हो जाती है। इस प्रकार विभिन्न दिशाओंमें वह पवित्र सरस्वती नदी (भिन्न-भिन्न रूपोंमें) प्रवाहित होती है। उस सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाला मनुष्य मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। द्विजश्रेष्ठो! सरस्वती नदीमें स्नान करनेके बाद तीर्थसेवीको तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध महात्मा मदनके 'विहार' नामक तीर्थमें जाना चाहिये॥ ७—१०॥ |
| ततो गच्छेद् द्विजश्रेष्ठा मदनस्य महात्मनः।<br>तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं विहारं नाम नामतः॥ १०<br><br>यत्र देवाः समागम्य शिवदर्शनकाङ्क्षिणः।<br>समागता न चापश्यन् देवं देव्या समन्वितम्॥ ११<br><br>ते स्तुवन्तो महादेवं नन्दिनं गणनायकम्।<br>ततः प्रसन्नो नन्दीशः कथयामास चेष्टितम्॥ १२<br><br>भवस्य उमया सार्धं विहारे क्रीडितं महत्।<br>तच्छ्रुत्वा देवतास्तत्र पत्नीराहूय क्रीडिताः॥ १३<br><br>तेषां क्रीडाविनोदेन तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>योऽस्मिंस्तीर्थे नरः स्नाति विहारे श्रद्धयान्वितः॥ १४<br><br>धनधान्यप्रियैर्युक्तो भवते नात्र संशयः।<br>दुर्गातीर्थं ततो गच्छेद् दुर्गया सेवितं महत्॥ १५ | जहाँपर भगवान् शिवके दर्शनाभिलाषी देवता आये, पर वे उमासहित शिवका दर्शन न कर पाये। वे लोग गणनायक महादेव नन्दीकी स्तुति करने लगे। इससे नन्दीश्वर प्रसन्न हो गये और (उन्होंने) उमाके साथ की जा रही शिवकी महती विहार-क्रीडाका वर्णन किया। यह सुनकर देवताओंने भी अपनी पत्नियोंको बुलाया और उनके साथ (उन लोगोंने भी) क्रीडा की। उनके क्रीडा-विनोदसे शंकर प्रसन्न हो गये और बोले—इस विहार-तीर्थमें जो श्रद्धाके साथ स्नान करेगा, वह निःसंदेह धन-धान्य एवं प्रिय सम्बन्धियोंसे सम्पन्न होगा। उमा-शिवके विहार-स्थलकी यात्राके बाद दुर्गासे प्रतिष्ठित उस महान् दुर्गातीर्थमें जाना चाहिये॥ ११—१५॥ |
| यत्र स्नात्वा पितॄन् पूज्य न दुर्गतिमवाप्नुयात्।<br><br>तत्रापि च सरस्वत्याः कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ १६ | जहाँ स्नानकर पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको दुर्गति की प्राप्ति नहीं होती। उसी स्थानपर तीनों लोकोंमें |