वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ४४ ] | ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन | १९१ |
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| सर्वेषामेव पापानां कृतानामपि जानता।<br>शुद्ध्यते लिङ्गपूजायां नात्र कार्या विचारणा॥ १२ | जानकर किये गये समस्त पापोंकी भी शुद्धि लिङ्गकी पूजा करनेसे हो जाती है; इसमें किसी प्रकारका अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ९—१२॥ | | युष्माभिः पतितं लिङ्गं सारयित्वा महत्सरः।<br>सांनिहत्यं तु विख्यातं तस्मिञ्शीघ्रं प्रतिष्ठितम्॥ १३<br><br>यथाभिलषितं कामं ततः प्राप्स्यथ ब्राह्मणाः।<br>स्थाणुर्नाम्ना हि लोकेषु पूजनीयो दिवौकसाम्॥ १४<br><br>स्थाण्वीश्वरे स्थितो यस्मात्स्थाण्वीश्वरस्ततः स्मृतः।<br>ये स्मरन्ति सदा स्थाणुं ते मुक्ताः सर्वकिल्बिषैः॥ १५<br><br>भविष्यन्ति शुद्धदेहा दर्शनान्मोक्षगामिनः।<br>इत्येवमुक्ता देवेन ऋषयो ब्रह्मणा सह॥ १६<br><br>तस्माद् दारुवनाल्लिङ्गं नेतुं समुपचक्रमुः।<br>न तं चालयितुं शक्तास्ते देवा ऋषिभिः सह॥ १७ | तुमलोगोंने लिङ्गको गिरा दिया है, इसलिये शीघ्र ही उसे उठाकर प्रसिद्ध महान् सांनिहित्य-सरोवरमें स्थापित करो। ब्राह्मणो! ऐसा करनेसे तुमलोग अपने इच्छानुकूल मनोरथोंको प्राप्त करोगे। सारे संसारमें उस लिङ्गकी प्रसिद्धि स्थाणु नामसे होगी। देवताओंद्वारा (भी) वह पूज्य होगा। वह लिङ्ग स्थाण्वीश्वरमें स्थित रहनेके कारण स्थाण्वीश्वर नामसे स्मरण किया जायगा। जो स्थाण्वीश्वरको सदा स्मरण करेंगे, उनके सारे पाप कट जायँगे और वे पवित्र-देह होकर मोक्षकी प्राप्ति करेंगे। जब शंकरने ऐसा कहा तब ब्रह्माके सहित ऋषिलोग लिङ्गको उस दारुवनसे ले जानेका उद्योग करने लगे। किंतु ऋषियोंसहित वे सभी देवगण उसे हिलाने-डुलानेमें समर्थ न हो सके॥ १३—१७॥ | | श्रमेण महता युक्ता ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तेषां श्रमाभितप्तानामिदं ब्रह्माऽब्रवीद् वचः॥ १८<br><br>किं वा श्रमेण महता न यूयं वहनक्षमाः।<br>स्वेच्छया पतितं लिङ्गं देवदेवेन शूलिना॥ १९<br><br>तस्मात् तमेव शरणं यास्यामः सहिताः सुराः।<br>प्रसन्नश्च महादेवः स्वयमेव नयिष्यति॥ २०<br><br>इत्येवमुक्ता ऋषयो देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>कैलासं गिरिमासेदू रुद्रदर्शनकाङ्क्षिणः॥ २१ | (फिर) वे बहुत परिश्रम करके ब्रह्माकी शरणमें गये। ब्रह्माने परिश्रमसे श्रान्त-क्लान्त (संतप्त) हुए उन लोगोंसे यह वचन कहा—देवताओ! अत्यन्त कठोर परिश्रम करनेसे क्या लाभ? तुमलोग इसे उठानेमें समर्थ नहीं हो। देवाधिदेव भगवान् शंकरने अपनी इच्छासे इस लिङ्गको गिराया है। अतः हे देवो! हम सभी एक साथ उन्हीं भगवान् शंकरकी शरणमें चलें। महादेव सन्तुष्ट होकर अपने-आप ही (लिङ्गको) ले जायँगे। इस प्रकार ब्रह्माके कहनेपर सभी ऋषि और देवता ब्रह्माके साथ शंकरजीके दर्शनकी अभिलाषासे कैलासपर्वतपर पहुँचे॥ १८—२१॥ | | न च पश्यन्ति तं देवं ततश्चिन्तासमन्विताः।<br>ब्रह्माणमूचुर्मुनयः क्व स देवो महेश्वरः॥ २२<br><br>ततो ब्रह्मा चिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा देवं महेश्वरम्।<br>हस्तिरूपेण तिष्ठन्तं मुनिभिर्मानसैः स्तुतम्॥ २३<br><br>अथ ते ऋषयः सर्वे देवाश्च ब्रह्मणा सह।<br>गता महत्सरः पुण्यं यत्र देवः स्वयं स्थितः॥ २४<br><br>न च पश्यन्ति तं देवमन्विष्यन्तस्ततस्ततः।<br>ततश्चिन्तान्विता देवा ब्रह्मणा सहिताः स्थिताः॥ २५ | वहाँ उन लोगोंने शंकरजीको नहीं देखा। तब वे चिन्तित हो गये। फिर उन्होंने ब्रह्माजीसे पूछा (कि ब्रह्मन्) वे महेश्वरदेव कहाँ हैं? उसके बाद ब्रह्माने चिरकालतक ध्यान लगाया और देखा कि मुनियोंके अन्तः-करणसे स्तुत महेश्वर देव हाथीके आकारमें स्थित हैं। उसके पश्चात् वे ऋषि और ब्रह्माके सहित सभी देवता उस पावन महान् सरोवरपर गये जहाँ भगवान् शंकर स्वयं उपस्थित थे। वे लोग वहाँ इधर-उधर चारों ओर उन्हें ढूँढ़ने लगे, फिर भी शंकरजीका दर्शन न पा सके। ब्रह्माके साथ दर्शन न पानेके कारण सभी देवता चिन्तित |