वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८३
तिरालीसवाँ अध्याय
स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहित्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और ब्रह्माके हवालेसे लोमहर्षणका उत्तर
| ऋषय ऊचुः | (स्थाणुतीर्थमें जाने तथा स्थाणुवटके दर्शनसे मुक्ति-प्राप्ति होनेकी बात सुननेके बाद) ऋषियोंने पूछा— महामुने! आप स्थाणुतीर्थ एवं स्थाणुवटके माहात्म्य तथा सांनिहित्य सरोवरकी उत्पत्ति और इन्द्रद्वारा उसके धूलसे भरे जानेके कारणका वर्णन करें। (इसी प्रकार) लिङ्गोंके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा स्पर्शसे होनेवाले फल और सरोवरके माहात्म्यका भी पूर्णतः वर्णन करें॥ १-२॥ |
|---|---|
| स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं वटस्य च महामुने।<br>सांनिहत्यसरोत्पत्तिं पूरणं पांशुना ततः॥ १<br>लिङ्गानां दर्शनात् पुण्यं स्पर्शनेन च किं फलम्।<br>तथैव सरमाहात्म्यं ब्रूहि सर्वमशेषतः॥ २ | |
| लोमहर्षण उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयः सर्वे पुराणं वामनं महत्।<br>यच्छ्रुत्वा मुक्तिमाप्नोति प्रसादाद् वामनस्य तु॥ ३<br>सनत्कुमारमासीनं स्थाणोर्वटसमीपतः।<br>ऋषिभिर्बालखिल्यैराद्यैर्ब्रह्मपुत्रैर्महात्मभिः ॥ ४<br>मार्कण्डेयो मुनिस्तत्र विनयेनाभिगम्य च।<br>पप्रच्छ सरमाहात्म्यं प्रमाणं च स्थितिं तथा॥ ५ | लोमहर्षणजी बोले— मुनियो! आपलोग महान् वामनपुराणको श्रवण करें, जिसका श्रवण कर मनुष्य वामनभगवान्की कृपासे मुक्ति पा लेता है। (एक समय) ब्रह्माके पुत्र सनत्कुमार महात्मा बालखिल्य आदि ऋषियोंके साथ स्थाणुवटके पास बैठे हुए थे। महर्षि मार्कण्डेयने उनके निकट जाकर नम्रतापूर्वक सरोवरके माहात्म्य, उसके विस्तार और स्थितिके विषयमें पूछा—॥ ३-५॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>ब्रह्मपुत्र महाभाग सर्वशास्त्रविशारद।<br>ब्रूहि मे सरमाहात्म्यं सर्वपापक्षयावहम्॥ ६<br>कानि तीर्थानि दृश्यानि गुह्यानि द्विजसत्तम।<br>लिङ्गानि ह्यतिपुण्यानि स्थाणोर्यानि समीपतः॥ ७<br>येषां दर्शनमात्रेण मुक्तिं प्राप्नोति मानवः।<br>वटस्य दर्शनं पुण्यमुत्पत्तिं कथयस्व मे॥ ८<br>प्रदक्षिणायां यत्पुण्यं तीर्थस्नानेन यत्फलम्।<br>गुह्येषु चैव दृष्टेषु यत्पुण्यमभिजायते॥ ९<br>देवदेवो यथा स्थाणुः सरोमध्ये व्यवस्थितः।<br>किमर्थं पांशुना शक्रस्तीर्थं पूरितवान् पुनः॥ १०<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं चक्रतीर्थस्य यत्फलम्।<br>सूर्यतीर्थस्य माहात्म्यं सोमतीर्थस्य ब्रूहि मे॥ ११ | मार्कण्डेयजीने कहा (पूछा)— सर्वशास्त्रविशारद महाभाग ब्रह्मपुत्र (सनत्कुमार)! आप मुझसे सभी पापोंके नष्ट करनेवाले सरोवरके माहात्म्यको कहिये। द्विजश्रेष्ठ! स्थाणुतीर्थके पास कौन-कौन-से तीर्थ दृश्य हैं और कौन-कौन-से अदृश्य और कौन-से लिङ्ग अत्यन्त पवित्र हैं, जिनका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। मुने! आप स्थाणुवटके दर्शनसे होनेवाले पुण्य तथा उसकी उत्पत्तिके विषयमें भी कहिये—बताइये। इनकी प्रदक्षिणा करनेसे होनेवाले पुण्य, तीर्थमें स्नान करनेसे मिलनेवाले फल एवं गुप्त तीर्थों तथा प्रकट तीर्थोंके दर्शनसे मिलनेवाले पुण्यका भी वर्णन करें। प्रभो! सरोवरके मध्यमें देवाधिदेव स्थाणु (शिव) किस प्रकार स्थित हुए और किस कारणसे इन्द्रने इस तीर्थको पुनः धूलिसे भर दिया? आप स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, चक्रतीर्थका फल एवं सूर्यतीर्थ तथा सोमतीर्थका माहात्म्य—इन |