वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 194, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 194
| १८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४३ |
|---|
| शंकरस्य च गुह्यानि विष्णोः स्थानानि यानि च।<br>कथयस्व महाभाग सरस्वत्याः सविस्तरम्॥ १२ | सबको मुझसे कहिये। महाभाग! सरस्वतीके निकट शंकर तथा विष्णुके जो-जो गुप्त स्थान हैं उनका भी आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें। |
| ब्रूहि देवाधिदेवस्य माहात्म्यं देव तत्त्वतः।<br>विरिञ्चस्य प्रसादेन विदितं सर्वमेव च॥ १३ | देव! देवाधिदेवके माहात्म्यको आप भलीभाँति बतावें; क्योंकि ब्रह्माकी कृपासे आपको सब कुछ विदित है॥ ६—१३॥ |
| लोमहर्षण उवाच | लोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया)— |
| मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा ब्रह्मात्मा स महामुनिः।<br>अतिभक्त्या तु तीर्थस्य प्रवणीकृतमानसः॥ १४ | मार्कण्डेयके वचनको सुनकर ब्रह्मस्वरूप महामुनिका मन उस तीर्थके प्रति अत्यन्त भक्ति-प्रवण होनेसे गद्गद हो गया। |
| पर्यङ्कं शिथिलीकृत्वा नमस्कृत्वा महेश्वरम्।<br>कथयामास तत्सर्वं यच्छ्रुतं ब्रह्मणः पुरा॥ १५ | उन्होंने आसनसे उठकर भगवान् शंकरको प्रणाम किया तथा प्राचीन कालमें ब्रह्मासे इसके विषयमें जो कुछ सुना था उन सबका वर्णन किया॥ १४-१५॥ |
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— |
| नमस्कृत्य महादेवमीशानं वरदं शिवम्।<br>उत्पत्तिं च प्रवक्ष्यामि तीर्थानां ब्रह्मभाषिताम्॥ १६ | मैं कल्याणकर्ता, वरदानी महादेव ईशानको नमस्कार कर ब्रह्मासे कहे हुए तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन करूँगा। |
| पूर्वमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>बृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजसम्भवम्॥ १७ | प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया और सर्वत्र केवल जल-ही-जल हो गया एवं उसमें समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया, तब प्रजाओंके बीजस्वरूप एक 'अण्ड' उत्पन्न हुआ। |
| तस्मिन्नण्डे स्थितो ब्रह्मा शयनायोपचक्रमे।<br>सहस्रयुगपर्यन्तं सुप्त्वा स प्रत्यबुध्यत॥ १८ | ब्रह्मा उस अण्डमें स्थित थे। उन्होंने उसमें अपने सोनेका उपक्रम किया। फिर तो वे हजारों युगोंतक सोते रहे। उसके बाद जगे। |
| सुप्तोत्थितस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमपश्यत।<br>सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च॥ १९ | ब्रह्मा जब सोकर उठे, तब उन्होंने संसारको शून्य देखा। (जब उन्होंने संसारमें कुछ भी नहीं देखा) तब रजोगुणसे आविष्ट हो गये और सृष्टिके विषयमें विचार करने लगे॥ १६—१९॥ |
| रजः सृष्टिगुणं प्रोक्तं सत्त्वं स्थितिगुणं विदुः।<br>उपसंहारकाले च तमोगुणः प्रवर्तते॥ २० | रजोगुणको सृष्टिकारक तथा सत्त्वगुणको स्थितिकारक माना गया है। उपसंहार करनेके समयमें तमोगुणकी प्रवृत्ति होती है। |
| गुणातीतः स भगवान् व्यापकः पुरुषः स्मृतः।<br>तेनेदं सकलं व्याप्तं यत्किंचिज्जीवसंज्ञितम्॥ २१ | परंतु भगवान् वास्तवमें व्यापक एवं गुणातीत हैं। वे पुरुष नामसे कहे जाते हैं। जीव नामसे निर्दिष्ट सारे पदार्थ उन्हींसे ओतप्रोत हैं। |
| स ब्रह्मा स च गोविन्द ईश्वरः स सनातनः।<br>यस्तं वेद महात्मानं स सर्वं वेद मोक्षवित्॥ २२ | वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही विष्णु हैं और वे ही सनातन महेश्वर हैं। मोक्षके ज्ञानी जिस प्राणीने उन महान् आत्माको समझ लिया, उसने सब कुछ जान लिया। |
| किं तेषां सकलैस्तीर्थैराश्रमैर्वा प्रयोजनम्।<br>येषामनन्तकं चित्तमात्मन्येव व्यवस्थितम्॥ २३ | जिस मनुष्यका अनन्त (बहुमुखी) चित्त उन परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित है, उनके लिये सारे तीर्थ एवं आश्रमोंसे क्या प्रयोजन?॥ २०—२३॥ |
| आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था<br>सत्योदका शीलसमाधियुक्ता। | यह आत्मारूपी नदी शील और समाधिसे युक्त है। इसमें संयमरूपी पवित्र तीर्थ है, जो सत्यरूपी जलसे |