वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४३ ] स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और सांनिहत्य सरोवरके सम्बन्धमें प्रश्न और लोमहर्षणका उत्तर १८५ तस्यां स्नातः पुण्यकर्मा पुनाति न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ॥ २४ एतत्प्रधानं पुरुषस्य कर्म यदात्मसम्बोधसुखे प्रविष्टम्। ज्ञेयं तदेव प्रवदन्ति सन्त- स्तत्प्राप्य देही विजहाति कामान् ॥ २५ नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च। शीले स्थितिर्दण्डविधानवर्जन- मक्रोधनश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ २६ एतद् ब्रह्म समासेन मयोक्तं ते द्विजोत्तम। यज्ज्ञात्वा ब्रह्म परमं प्राप्स्यसि त्वं न संशयः ॥ २७ इदानीं शृणु चोत्पत्तिं ब्रह्मणः परमात्मनः। इमं चोदाहरन्त्येव श्लोकं नारायणं प्रति ॥ २८ आपो नारा वै तनव इत्येवं नाम शुश्रुमः। तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः ॥ २९ विबुद्धः सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतं जगत्। अण्डं बिभेद भगवांस्तस्मादोमित्यजायत ॥ ३० ततो भूरभवत् तस्माद् भुव इत्यपरः स्मृतः। स्वः शब्दश्च तृतीयोऽभूद् भूर्भुवः स्वेति संज्ञितः ॥ ३१ तस्मात्तेजः समभवत् तत्सवितुर्वरेण्यं यत्। उदकं शोषयामास यत्तेजोऽण्डविनिःसृतम् ॥ ३२ तेजसा शोषितं शेषं कललत्वमुपागतम्। कललाद् बुद्बुदं ज्ञेयं ततः काठिन्यतां गतम् ॥ ३३ काठिन्याद् धरणी ज्ञेया भूतानां धारिणी हि सा। यस्मिन् स्थाने स्थितं ह्याण्डं तस्मिन् संनिहितं सरः ॥ ३४ यदाद्यं निःसृतं तेजस्तस्मादादित्य उच्यते। अण्डमध्ये समुत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३५ उल्बं तस्याभवन्मेरुर्जरायुः पर्वताः स्मृताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तथा नद्यः सहस्रशः ॥ ३६ परिपूर्ण है। जो पुण्यात्मा इस (नदी)-में स्नान करता है, वह पवित्र हो जाता है, (पिये जानेवाले सामान्य) जलसे अन्तरात्माकी शुद्धि नहीं होती। इसलिये पुरुषका मुख्य कर्तव्य है कि वह आत्मज्ञानरूपी सुखमें प्रविष्ट रहे। महात्मा लोग उसीको 'ज्ञेय' कहते हैं। शरीर धारण करनेवाला देही जब उसे पा लेता है, तब सभी इच्छाओंको छोड़ देता है। ब्राह्मणके लिये एकता, समता, सत्यता, मर्यादामें स्थिति, दण्ड-विधानका त्याग, क्रोध न करना एवं (सांसारिक) क्रियाओंसे विराग ही धन है, इनके समान उनके लिये कोई अन्य धन नहीं है। द्विजोत्तम! मैंने थोड़ी मात्रामें तुमसे यह जो ज्ञानके विषयमें कहा है, इसे जानकर तुम निःसंदेह परम ब्रह्मको प्राप्त करोगे। अब तुम परमात्मा ब्रह्मकी उत्पत्तिके विषयमें सुनो। उस नारायणके विषयमें लोग इस श्लोकका उदाहरण दिया करते हैं- ॥ २४-२८ ॥ 'आप्' (जल) ही को 'नार', (एवं परमात्मा)- को 'तनु' - ऐसा हमने सुन रखा है। वे (परमात्मा) उसमें शयन करते हैं, जिससे वे (शब्दव्युत्पत्तिसे) 'नारायण' शब्दसे स्मरण किये गये हैं। जलमें सोनेके बाद जाग जानेपर उन्होंने जगत्को अपनेमें प्रविष्ट जानकर अण्डको तोड़ दिया, उससे 'ॐ' शब्दकी उत्पत्ति हुई। इसके बाद उससे (पहली बार) भूः, दूसरी बार भुवः एवं तीसरी बार स्वःकी उत्पत्ति (ध्वनि) हुई। इन तीनोंका नाम क्रमशः मिलकर 'भूर्भुवःस्वः' हुआ। उस सविता देवताका जो वरेण्य तेज है, वह उसीसे उत्पन्न हुआ। अण्डसे जो तेज निकला, उसने जलको सुखा दिया ॥ २९-३२ ॥ तेजसे जलके सोखे जानेपर शेष जल कललकी आकृतिमें बदल गया। कललसे बुद्बुद हुआ और उसके बाद वह कठोर हो गया। कठोर हो जानेके कारण वह बुद्बुद भूतोंको धारण करनेवाली धरणी बन गया। जिस स्थानपर अण्ड स्थित था, वहीं संनिहित नामका सरोवर है। तेजके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण उसे 'आदित्य' नामसे कहा जाता है। फिर सारे संसारके पितामह ब्रह्मा अण्डके मध्यमें उत्पन्न हुए। उस अण्डका उल्ब (गर्भका आवरण) मेरु पर्वत है एवं अन्य पर्वत उसके जरायु (झिल्ली) माने जाते हैं। समुद्र एवं सहस्रों नदियाँ