भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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१८६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नाभिस्थाने यदुदकं ब्रह्मणो निर्मलं महत्।<br>महत्सरस्तेन पूर्णं विमलेन वराम्भसा॥ ३७गर्भके जल हैं। ब्रह्माके नाभि-स्थानमें जो विशाल निर्मल जल राशि है, उस स्वच्छ श्रेष्ठ जलसे महान् सरोवर भरा-पूरा है॥ ३३—३७॥
तस्मिन् मध्ये स्थाणुरूपी वटवृक्षो महामनाः।<br>तस्माद् विनिर्गता वर्णा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः॥ ३८<br><br>शूद्राश्च तस्मादुत्पन्नाः शुश्रूषार्थं द्विजन्मनाम्।<br>ततश्चिन्तयतः सृष्टिं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।<br>मनसा मानसा जाताः सनकाद्या महर्षयः॥ ३९<br><br>पुनश्चिन्तयतस्तस्य प्रजाकामस्य धीमतः।<br>उत्पन्ना ऋषयः सप्त ते प्रजापतयोऽभवन्॥ ४०<br><br>पुनश्चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च।<br>बालखिल्याः समुत्पन्नास्तपःस्वाध्यायतत्पराः॥ ४१उस सरोवरके मध्यमें स्थाणुके आकारका महान् विशाल एक वटवृक्ष है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण उससे निकले और द्विजोंकी शुश्रूषा करनेके लिये उसीसे शूद्रोंकी भी उत्पत्ति हुई। (इस प्रकार चारों वर्णोंकी सृष्टि सरोवरके मध्यमें स्थाणुरूपसे स्थित वटवृक्षसे हुई।) उसके बाद सृष्टिकी चिन्ता करते हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके मनसे सनकादि महर्षियोंकी उत्पत्ति हुई। फिर प्रजाकी इच्छासे चिन्तन कर रहे मतिमान् ब्रह्मासे सात ऋषि उत्पन्न हुए। वे प्रजापति हुए। रजोगुणसे मोहित होकर ब्रह्माने जब पुनः चिन्तन किया, तब तप एवं स्वाध्यायमें परायण बालखिल्य ऋषियोंकी उत्पत्ति हुई॥ ३८—४१॥
ते सदा स्नाननिरता देवार्चनपरायणाः।<br>उपवासैर्व्रतैस्तीव्रैः शोषयन्ति कलेवरम्॥ ४२<br><br>वानप्रस्थेन विधिना अग्निहोत्रसमन्विताः।<br>तपसा परमेणेह शोषयन्ति कलेवरम्॥ ४३<br><br>दिव्यं वर्षसहस्रं ते कृशा धमनिसंतताः।<br>आराधयन्ति देवेशं न च तुष्यति शंकरः॥ ४४<br><br>ततः कालेन महता उमया सह शंकरः।<br>आकाशमार्गेण तदा दृष्ट्वा देवी सुदुःखिता॥ ४५<br><br>प्रसाद्य देवदेवेशं शंकरं प्राह सुव्रता।<br>क्लिश्यन्ते ते मुनिगणा देवदारुवनाश्रयाः॥ ४६<br><br>तेषां क्लेशक्षयं देव विधेहि कुरु मे दयाम्।<br>किं वेदधर्मनिष्ठानामनन्तं देव दुष्कृतम्॥ ४७<br><br>नाद्यापि येन शुद्ध्यन्ति शुष्कस्राव्यस्थिशोषिताः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः पिनाकी पतितान्धकः।<br>प्रोवाच प्रहसन् मूर्ध्नि चारुचन्द्रांशुशोभितः॥ ४८वे सर्वदा स्नान (शुद्धि) करनेमें निरत तथा देवताओंकी पूजा करनेमें विशेषरूपसे लगे रहते तथा उपवासों एवं तीव्र व्रतोंसे अपने शरीरको सुखाये जा रहे थे। अग्निहोत्रसे युक्त होकर वानप्रस्थकी विधिसे वे उत्कृष्ट तपस्या करते और अपने शरीर सुखाते जाते थे। वे लोग अत्यन्त दुर्बल एवं कंकाल-काय होकर सहस्र दिव्य वर्षोंतक देवेशकी उपासना करते रहे; परंतु भगवान् शंकर प्रसन्न न हुए। उसके बहुत दिनोंके बाद उमाके साथ भगवान् शंकर आकाश-मार्गसे भ्रमण कर रहे थे। धार्मिक कार्योंको करनेवाली उमा (बालखिल्योंकी) इस प्रकारकी दशा (कंकालमात्र) देखकर दुःखी हो गयीं और दुःखी होकर देवदेवेश शंकरको प्रसन्नकर कहने लगीं—देव! देवदारु-वनमें रहनेवाले वे मुनिगण क्लेश उठा रहे हैं। देव! मेरे ऊपर दया करें। आप उनके क्लेशका विनाश करें। देव! वैदिक धर्ममें निष्ठा रखनेवाले इन (तपस्वियों)-के कौन ऐसा अनन्त दुष्कृत है, जिससे ये कङ्गालमात्र होनेपर भी अबतक शुद्ध नहीं हुए? अन्धकको मार गिरानेवाले, चन्द्रमाकी मनोहर किरणोंसे सुशोभित सिरवाले पिनाकधारी शंकरजी उमाकी बातको सुनकर हँसते हुए बोले—॥ ४२—४८॥
श्रीमहादेव उवाच<br><br>न वेत्सि देवि तत्त्वेन धर्मस्य गहना गतिः।<br>नैते धर्मं विजानन्ति न च कामविवर्जिताः॥ ४९श्रीमहादेवजी बोले— देवि! धर्मकी गति गहन होती है। तुम उसे तत्त्वतः नहीं जानती। ये लोग न तो धर्मज्ञ हैं