भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ४५ ]सांनिहितसर—स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन१९३
सर्वशक्ते सर्वदेव अज सहस्रार्चि पृषार्चि सुधामन् हरधाम अनन्तधाम संवर्त संकर्षण वडवानल अग्नीषोमात्मक पवित्र महापवित्र महामेघ महामायाधर महाकाम कामहन् हंस परमहंस महाराजिक महेश्वर महाकामुक महाहंस भवक्षयकर सुरसिद्धाच्चित हिरण्यवाह हिरण्यरेता हिरण्यनाभ हिरण्याग्रकेश मुञ्जकेशिन् सर्वलोकवरप्रद सर्वानुग्रहकर कमलेशय कुशेशय हृदयेशाय ज्ञानोदधे शम्भो विभो महायज्ञ महायाज्ञिक सर्वयज्ञमय सर्वयज्ञहृदय सर्वयज्ञसंस्तुत निराश्रय समुद्रेशय अत्रिसम्भव भक्तानुकम्पिन् अभ्रग्रयोग योगधर वासुकिमहामणि विद्योतितविग्रह हरितनयन त्रिलोचन जटाधर नीलकण्ठ चन्द्रार्धधर उमाशरीरार्धहर गजचर्मधर दुस्तरसंसारमहासंहारकर प्रसीद भक्तजनवत्सल।सर्वशक्ति! सर्वदेव! अज! सहस्रार्चि! पृषार्चि! सुधामन्! हरधाम! अनन्तधाम! संवर्त! संकर्षण! वडवानल, अग्नि और सोमस्वरूप! पवित्र! महापवित्र! महामेघ! महामायाधर! महाकाम! कामहन्! हंस! परमहंस! महाराजिक! महेश्वर! महाकामुक! महाहंस! भवक्षयकर! हे देवों और सिद्धोंसे पूजित! हिरण्यवाह! हिरण्यरेता! हिरण्यनाभ! हिरण्याग्रकेश! मुञ्जकेशिन्! सर्वलोकवरप्रद! सर्वानुग्रहकर! कमलेशय! कुशेशय! हृदयेशय! ज्ञानोदधे! शम्भो! विभो! महायज्ञ! महायाज्ञिक! सर्वयज्ञमय! सर्वयज्ञहृदय! सर्वयज्ञसंस्तुत! निराश्रय! समुद्रेशय! अत्रिसम्भव! भक्तानुकम्पिन्! अभ्रग्रयोग! योगधर! हे वासुकि और महामणिसे द्युतिमान् शिव! हरितनयन! त्रिलोचन! जटाधर! नीलकण्ठ! चन्द्रार्धधर! उमाशरीरार्धहर! गजचर्मधर! दुस्तरसंसारका महासंहार करनेवाले महाप्रलयंकर शिव! हमारा आपको नमस्कार है। भक्तजनवत्सल शङ्कर! आप हम सबपर प्रसन्न हों।
एवं स्तुतो देवगणैः सुभक्त्या<br>  सब्रह्ममुख्यैश्च पितामहेन।<br>त्यक्त्वा तदा हस्तिरूपं महात्मा<br>  लिङ्गे तदा संनिधानं चकार॥ ३६॥इस प्रकार पितामह ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवगणोंके साथ भक्तिपूर्वक स्तुति करनेपर उन महात्माने हस्तिरूपका त्यागकर लिङ्गमें सन्निधान (निवास) कर लिया॥ ३६॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४४॥


पैंतालीसवाँ अध्याय

सांनिहितसर—स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन

सनत्कुमार उवाच
अथोवाच महादेवो देवान् ब्रह्मपुरोगमान्।<br>ऋषीणां चैव प्रत्यक्षं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्॥ १<br>एतत् सांनिहितं प्रोक्तं सरः पुण्यतमं महत्।<br>मयोपसेवितं यस्मात् तस्मान्मुक्तिप्रदायकम्॥ २<br>इह ये पुरुषाः केचिद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः।<br>लिङ्गस्य दर्शनादेव पश्यन्ति परमं पदम्॥ ३<br>अहन्यहनि तीर्थानि आसमुद्रसरांसि च।<br>स्थाणुतीर्थं समेष्यन्ति मध्यं प्राप्ते दिवाकरे॥ ४**सनत्कुमारने कहा—**इसके बाद महादेवने ऋषियोंके सामने (ही) ब्रह्मा आदि देवोंसे परमश्रेष्ठ तीर्थके माहात्म्यको कहा। ऋषियो! यह सांनिहित नामक सरोवर अत्यन्त पवित्र एवं महान् कहा गया है। यतः मेरे द्वारा यह सेवित किया गया है, अतः यह मुक्ति प्रदान करनेवाला है। यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य—सभी वर्णोंके पुरुष लिङ्गका दर्शन कर ही परम पदका दर्शन करते हैं। समुद्रसे लेकर सरोवरतकके तीर्थ प्रतिदिन भगवान् सूर्यके आकाशके मध्यमें आ जानेपर (दोपहरमें) स्थाणुतीर्थमें आ जाते हैं॥ १–४॥