वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४५ |
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| स्तोत्रेणानेन च नरो यो मां स्तोष्यति भक्तितः।<br>तस्याहं सुलभो नित्यं भविष्यामि न संशयः॥ ५<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रो ह्यन्तर्धानं गतः प्रभुः।<br>देवाश्च ऋषयः सर्वे स्वानि स्थानानि भेजिरे॥ ६<br><br>ततो निरन्तरं स्वर्गं मानुषैर्मिश्रितं कृतम्।<br>स्थाणुलिङ्गस्य माहात्म्यं दर्शनात् स्वर्गमाप्नुयात्॥ ७<br><br>ततो देवाः सर्व एव ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तानुवाच तदा ब्रह्मा किमर्थमिह चागताः॥ ८ | जो मनुष्य इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करेगा, उसके लिये मैं सदा सुलभ होऊँगा—इसमें कोई संदेह नहीं है। यह कहकर भगवान् शंकर अदृश्य हो गये। सभी देवता तथा ऋषिगण अपने-अपने स्थानको चले गये। उसके बाद पूरा—सारा-का-सारा स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया; क्योंकि स्थाणुलिङ्गका यह माहात्म्य है कि उसका दर्शन करनेसे ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है। फिर सभी देवता ब्रह्माकी शरणमें गये, तब ब्रह्माने उनसे पूछा—देवताओ! आपलोग यहाँ किस कार्यसे आये हैं?॥ ५-८॥ | | ततो देवाः सर्व एव इदं वचनमब्रुवन्।<br>मानुषेभ्यो भयं तीव्रं रक्षास्माकं पितामह॥ ९<br><br>तानुवाच तदा ब्रह्मा सुरांस्त्रिदशनायकः।<br>पांशुना पूर्यतां शीघ्रं सरः शक्रे हितं कुरु॥ १०<br><br>ततो ववर्ष भगवान् पांशुना पाकशासनः।<br>सप्ताहं पूरयामास सरो देवैस्तदा वृतः॥ ११<br><br>तं दृष्ट्वा पांशुवर्षं च देवदेवो महेश्वरः।<br>करेण धारयामास लिङ्गं तीर्थवटं तदा॥ १२ | तब सभी देवताओंने यह वचन कहा—पितामह! हमलोगोंको मनुष्योंसे बहुत भारी भय हो रहा है। आप हम सबकी रक्षा करें। उसके बाद देवताओंके नेता ब्रह्माने उन देवोंसे कहा—इन्द्र! सरोवरको शीघ्र धूलिसे पाट दो और इस प्रकार इन्द्रका कल्याण करो। ब्रह्माके इस प्रकार समझानेपर पाक नामके राक्षसको मारनेवाले (पाकशासन) भगवान् इन्द्रने देवताओंके साथ सात दिनतक धूलिकी वर्षा की और सरोवरको धूलिसे पाट दिया। देवदेव महेश्वरने देवताओंद्वारा बरसायी गयी इस धूलिकी वर्षाको देखकर लिङ्ग और तीर्थवटको अपने हाथमें ले लिया॥ ९-१२॥ | | तस्मात् पुण्यतमं तीर्थमाद्यं यत्रोदकं स्थितम्।<br>तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थैः स्नातो भवति मानवः॥ १३<br><br>यस्तत्र कुरुते श्राद्धं वटलिङ्गस्य चान्तरे।<br>तस्य प्रीताश्च पितरो दास्यन्ति भुवि दुर्लभम्॥ १४<br><br>पूरितं च ततो दृष्ट्वा ऋषयः सर्व एव ते।<br>पांशुना सर्वगात्राणि स्पृशन्ति श्रद्धया युताः॥ १५<br><br>तेऽपि निर्धूतपापास्ते पांशुना मुनयो गताः।<br>पूज्यमानाः सुरगणैः प्रयाता ब्रह्मणः पदम्॥ १६ | इसलिये पहले जिस स्थानपर जल था, वह तीर्थ अत्यन्त पवित्र है। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य सभी तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य वट और लिङ्गके बीचमें श्राद्ध करता है उसके पितर उसपर संतुष्ट होकर उसे पृथ्वी (भर)-में दुर्लभ वस्तु सुलभ कर देते हैं—ऐसा सुनकर वे सभी ऋषि धूलिसे भरे हुए सरोवरको देखकर श्रद्धासे अपने सभी अङ्गोंमें धूलि मलने लगे। वे मुनि भी धूलि मलनेके कारण निष्पाप हो गये और देवताओंसे पूजित होकर ब्रह्मलोक चले गये॥ १३-१६॥ | | ये तु सिद्धा महात्मानस्ते लिङ्गं पूजयन्ति च।<br>व्रजन्ति परमां सिद्धिं पुनरावृत्तिदुर्लभाम्॥ १७<br><br>एवं ज्ञात्वा तदा ब्रह्मा लिङ्गं शैलमयं तदा।<br>आद्यलिङ्गं तदा स्थाप्य तस्योपरि दधार तत्॥ १८ | जो सिद्ध महात्मा पुरुष लिङ्गकी पूजा करते वे आवागमनसे रहित होकर परमसिद्धिको प्राप्त करने लगे। ऐसा जानकर तब ब्रह्माने उस आद्यलिङ्गको नीचे रख उसके ऊपर पाषाणमय लिङ्गको स्थापित कर दिया। |