वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४९- चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति और स्थाणुतीर्थका माहात्म्य
| १९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४५ |
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| स्तोत्रेणानेन च नरो यो मां स्तोष्यति भक्तितः।<br>तस्याहं सुलभो नित्यं भविष्यामि न संशयः॥ ५<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रो ह्यन्तर्धानं गतः प्रभुः।<br>देवाश्च ऋषयः सर्वे स्वानि स्थानानि भेजिरे॥ ६<br><br>ततो निरन्तरं स्वर्गं मानुषैर्मिश्रितं कृतम्।<br>स्थाणुलिङ्गस्य माहात्म्यं दर्शनात् स्वर्गमाप्नुयात्॥ ७<br><br>ततो देवाः सर्व एव ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>तानुवाच तदा ब्रह्मा किमर्थमिह चागताः॥ ८ | जो मनुष्य इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करेगा, उसके लिये मैं सदा सुलभ होऊँगा—इसमें कोई संदेह नहीं है। यह कहकर भगवान् शंकर अदृश्य हो गये। सभी देवता तथा ऋषिगण अपने-अपने स्थानको चले गये। उसके बाद पूरा—सारा-का-सारा स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया; क्योंकि स्थाणुलिङ्गका यह माहात्म्य है कि उसका दर्शन करनेसे ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है। फिर सभी देवता ब्रह्माकी शरणमें गये, तब ब्रह्माने उनसे पूछा—देवताओ! आपलोग यहाँ किस कार्यसे आये हैं?॥ ५-८॥ | | ततो देवाः सर्व एव इदं वचनमब्रुवन्।<br>मानुषेभ्यो भयं तीव्रं रक्षास्माकं पितामह॥ ९<br><br>तानुवाच तदा ब्रह्मा सुरांस्त्रिदशनायकः।<br>पांशुना पूर्यतां शीघ्रं सरः शक्रे हितं कुरु॥ १०<br><br>ततो ववर्ष भगवान् पांशुना पाकशासनः।<br>सप्ताहं पूरयामास सरो देवैस्तदा वृतः॥ ११<br><br>तं दृष्ट्वा पांशुवर्षं च देवदेवो महेश्वरः।<br>करेण धारयामास लिङ्गं तीर्थवटं तदा॥ १२ | तब सभी देवताओंने यह वचन कहा—पितामह! हमलोगोंको मनुष्योंसे बहुत भारी भय हो रहा है। आप हम सबकी रक्षा करें। उसके बाद देवताओंके नेता ब्रह्माने उन देवोंसे कहा—इन्द्र! सरोवरको शीघ्र धूलिसे पाट दो और इस प्रकार इन्द्रका कल्याण करो। ब्रह्माके इस प्रकार समझानेपर पाक नामके राक्षसको मारनेवाले (पाकशासन) भगवान् इन्द्रने देवताओंके साथ सात दिनतक धूलिकी वर्षा की और सरोवरको धूलिसे पाट दिया। देवदेव महेश्वरने देवताओंद्वारा बरसायी गयी इस धूलिकी वर्षाको देखकर लिङ्ग और तीर्थवटको अपने हाथमें ले लिया॥ ९-१२॥ | | तस्मात् पुण्यतमं तीर्थमाद्यं यत्रोदकं स्थितम्।<br>तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थैः स्नातो भवति मानवः॥ १३<br><br>यस्तत्र कुरुते श्राद्धं वटलिङ्गस्य चान्तरे।<br>तस्य प्रीताश्च पितरो दास्यन्ति भुवि दुर्लभम्॥ १४<br><br>पूरितं च ततो दृष्ट्वा ऋषयः सर्व एव ते।<br>पांशुना सर्वगात्राणि स्पृशन्ति श्रद्धया युताः॥ १५<br><br>तेऽपि निर्धूतपापास्ते पांशुना मुनयो गताः।<br>पूज्यमानाः सुरगणैः प्रयाता ब्रह्मणः पदम्॥ १६ | इसलिये पहले जिस स्थानपर जल था, वह तीर्थ अत्यन्त पवित्र है। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य सभी तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य वट और लिङ्गके बीचमें श्राद्ध करता है उसके पितर उसपर संतुष्ट होकर उसे पृथ्वी (भर)-में दुर्लभ वस्तु सुलभ कर देते हैं—ऐसा सुनकर वे सभी ऋषि धूलिसे भरे हुए सरोवरको देखकर श्रद्धासे अपने सभी अङ्गोंमें धूलि मलने लगे। वे मुनि भी धूलि मलनेके कारण निष्पाप हो गये और देवताओंसे पूजित होकर ब्रह्मलोक चले गये॥ १३-१६॥ | | ये तु सिद्धा महात्मानस्ते लिङ्गं पूजयन्ति च।<br>व्रजन्ति परमां सिद्धिं पुनरावृत्तिदुर्लभाम्॥ १७<br><br>एवं ज्ञात्वा तदा ब्रह्मा लिङ्गं शैलमयं तदा।<br>आद्यलिङ्गं तदा स्थाप्य तस्योपरि दधार तत्॥ १८ | जो सिद्ध महात्मा पुरुष लिङ्गकी पूजा करते वे आवागमनसे रहित होकर परमसिद्धिको प्राप्त करने लगे। ऐसा जानकर तब ब्रह्माने उस आद्यलिङ्गको नीचे रख उसके ऊपर पाषाणमय लिङ्गको स्थापित कर दिया। |
अध्याय ४५ ] सांनिहितसर-स्थाणुतीर्थ, स्थाणुवट और स्थाणुलिङ्गका माहात्म्य-वर्णन १९५ ततः कालेन महता तेजसा तस्य रञ्जितम्। कुछ समय बीत जानेपर उसके (आद्य लिङ्गके) तस्यापि स्पर्शनात् सिद्धः परं पदमवाप्नुयात् ॥ १९ तेजसे (वह पाषाण-मूर्ति-लिङ्ग भी) रञ्जित हो गया। सिद्ध-समुदाय उसका भी स्पर्श करनेसे परमपदको ततो देवैः पुनर्ब्रह्मा विज्ञप्तो द्विजसत्तम । प्राप्त करने लगा। द्विजश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् देवताओंने पुनः एते यान्ति परां सिद्धिं लिङ्गस्य दर्शनान्नराः ॥ २० ब्रह्माको बतलाया ब्रह्मन् ! ये मनुष्य लिङ्गका दर्शन करके परम सिद्धिको प्राप्त करनेका लाभ उठा रहे हैं। देवताओंसे यह सुनकर भगवान् ब्रह्माने देवताओंके तच्छ्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा देवानां हितकाम्यया। मंगलकी इच्छासे एकके ऊपर एक, इस प्रकार सात उपर्युपरि लिङ्गानि सप्त तत्र चकार ह ॥ २१ लिङ्गोंको स्थापित कर दिया ॥ १७-२१ ॥ ततो ये मुक्तिकामाश्च सिद्धाः शमपरायणाः। उसके बाद मुक्तिके अभिलाषी शम (दमादि)- सेव्यं पांशुं प्रयत्नेन प्रयाताः परमं पदम् ॥ २२ में लगे रहनेवाले सिद्धगण यत्नपूर्वक धूलिका सेवनकर पांशवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुना समुदीरिताः। परमपदको प्राप्त करने लगे। (वस्तुतः) कुरुक्षेत्रमें वायुके चलनेसे उड़ी हुई धूल भी बड़े-बड़े पापियोंको महादुष्कृतकर्माणं प्रयान्ति परमं पदम् ॥ २३ मुक्ति दे देती है। किसी स्त्री या पुरुषने चाहे जानेमें या अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रियो वा पुरुषस्य वा। अनजानेसे पाप किया हो तो उसके सारे पाप स्थाणु- नश्यते दुष्कृतं सर्वं स्थाणुतीर्थप्रभावतः ॥ २४ तीर्थके प्रभावसे नष्ट हो जाते हैं। लिङ्गका दर्शन करनेसे और वटका स्पर्श करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है और लिङ्गस्य दर्शनान्मुक्तिः स्पर्शनाच्च वटस्य च। उसके निकट जलमें स्नान करनेसे मनुष्य मनचाहे तत्संनिधौ जले स्नात्वा प्राप्नोत्यभिमतं फलम् ॥ २५ फलको प्राप्त करता है। उस जलमें पितरोंका तर्पण पितॄणां तर्पणं यस्तु जले तस्मिन् करिष्यति। करनेवाला व्यक्ति जलके प्रत्येक बिन्दुमें अनन्त फलको बिन्दौ बिन्दौ तु तोयस्य अनन्तफलभाग्भवेत् ॥ २६ प्राप्त करता है ॥ २२-२६ ॥ यस्तु कृष्णतिलैः सार्द्धं लिङ्गस्य पश्चिमे स्थितः। लिङ्गसे पश्चिम दिशामें काले तिलोंसे श्रद्धापूर्वक तर्पयेच्छ्रद्धया युक्तः स प्रीणाति युगत्रयम् ॥ २७ तर्पण करनेवाला व्यक्ति तीन युगोंतक (पितरोंको) तृप्त करता है। जबतक मन्वन्तर है और जबतक यावन्मन्वन्तरं प्रोक्तं यावल्लिङ्गस्य संस्थितिः। लिङ्गकी संस्थिति है, तबतक पितृगण संतुष्ट होकर तावत्प्रीताश्च पितरः पिबन्ति जलमुत्तमम् ॥ २८ उत्तम जलका पान करते हैं। सत्ययुगमें 'सान्निहत्य' कृते युगे सान्निहत्यं त्रेतायां वायुसंज्ञितम्। सर, त्रेतामें 'वायु' नामका हृद, कलि एवं द्वापरमें कलिद्वापरयोर्मध्ये कूपं रुद्रह्रदं स्मृतम् ॥ २९ 'रुद्रहृद' नामके कूप सेवनीय माने गये हैं। चैत्रके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन 'रुद्रह्रद' नामक तीर्थमें चैत्रस्य कृष्णपक्षे च चतुर्दश्यां नरोत्तमः। स्नान करनेवाला उत्तम पुरुष परमपद-मुक्तिको प्राप्त स्नात्वा रुद्रह्रदे तीर्थे परं पदमवाप्नुयात् ॥ ३० करता है। रात्रिके समय वटके नीचे रहकर परमेश्वरका यस्तु वटे स्थितो रात्रिं ध्यायते परमेश्वरम्। ध्यान करनेवालेको स्थाणुवटके अनुग्रह (दया)-से स्थाणोर्वटप्रसादेन मनसा चिन्तितं फलम् ॥ ३१ मनोवाञ्छित फल प्राप्त होता है ॥ २७-३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४५ ॥
| १९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४६ |
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छियालीसवाँ अध्याय
स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य
| सनत्कुमार उवाच<br>स्थाणोर्वटस्योत्तरतः शुक्रतीर्थं प्रकीर्तितम्।<br>स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण सोमतीर्थं द्विजोत्तम॥ १<br>स्थाणोर्वटं दक्षिणतो दक्षतीर्थमुदाहृतम्।<br>स्थाणोर्वटात् पश्चिमत्ः स्कन्दतीर्थं प्रतिष्ठितम्॥ २<br>एतानि पुण्यतीर्थानि मध्ये स्थाणुरिति स्मृतः।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्नोति परमं पदम्॥ ३<br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यस्त्वेतानि परिक्रमेत्।<br>पदे पदे यज्ञफलं स प्राप्नोति न संशयः॥ ४<br>एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तदा।<br>मरुद्भिर्वह्निभिश्चैव सेवितानि प्रयत्नतः॥ ५<br><br>अन्ये ये प्राणिनः केचित् प्रविष्टाः स्थाणुमुत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ६<br><br>अस्ति तत्संनिधौ लिङ्गं देवदेवस्य शूलिनः।<br>उमा च लिङ्गरूपेण हरपार्श्वं न मुञ्चति॥ ७<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण सिद्धिं प्राप्नोति मानवः।<br>वटस्य उत्तरे पार्श्वे तक्षकेण महात्मना॥ ८<br><br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वकामप्रदायकम्।<br>वटस्य पूर्वदिग्भागे विश्वकर्मकृतं महत्॥ ९<br><br>लिङ्गं प्रत्यङ्मुखं दृष्ट्वा सिद्धिमाप्नोति मानवः।<br>तत्रैव लिङ्गरूपेण स्थिता देवी सरस्वती॥ १०<br>प्रणम्य तां प्रयत्नेन बुद्धिं मेधां च विन्दति।<br>वटपार्श्वे स्थितं लिङ्गं ब्रह्मणा तत् प्रतिष्ठितम्॥ ११<br><br>दृष्ट्वा वटेश्वरं देवं प्रयाति परमं पदम्।<br>ततः स्थाणुवटं दृष्ट्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्॥ १२<br><br>प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।<br>स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे नकुलीशो गणः स्मृतः॥ १३ | **सनत्कुमारने कहा—**द्विजोत्तम! स्थाणुवटकी उत्तर दिशामें ‘शुक्रतीर्थ’ और स्थाणुवटकी पूर्व दिशामें ‘सोमतीर्थ’ कहा गया है। स्थाणुवटके दक्षिण ‘दक्षतीर्थ’ एवं स्थाणुवटके पश्चिममें ‘स्कन्दतीर्थ’ स्थित है। इन परम पावन तीर्थोंके बीचमें ‘स्थाणु’ नामका तीर्थ है। उसका दर्शन करनेमात्रसे परमपद (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको इनकी प्रदक्षिणा करता है, वह एक-एक पगपर यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १-४॥<br><br>मुनियों, साध्यों, आदित्यों, वसुओं, मरुतों एवं अग्नियोंने इन तीर्थोंका यत्नपूर्वक सेवन किया है। जो भी अन्य कोई प्राणी उस उत्तम स्थाणुतीर्थमें प्रवेश करते हैं वे भी सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। उसीके निकट त्रिशूल धारण करनेवाले देवदेव भगवान् शंकरका लिङ्ग है। उमादेवी वहाँपर लिङ्गरूपमें रहनेवाले शंकरजीके पासमें ही रहती हैं; वे उनकी बगलसे अलग नहीं होतीं। उस लिङ्गके दर्शन करनेमात्रसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त करता है। वटके उत्तरी भागमें महात्मा तक्षकने सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाले महालिङ्गको प्रतिष्ठित किया है। वटकी पूर्व दिशाकी ओर विश्वकर्माके द्वारा निर्मित किया गया महान् लिङ्ग है। पश्चिमकी ओर रहनेवाले लिङ्गका दर्शन कर मानवको सिद्धि प्राप्त होती है। वहींपर देवी सरस्वती लिङ्गरूपसे स्थित हैं॥ ५-१०॥<br><br>मनुष्य उन्हें प्रयत्न (श्रद्धा-विधि)-पूर्वक प्रणाम कर बुद्धि एवं तीव्र मेधा प्राप्त करता है। वटकी बगलमें ब्रह्माके द्वारा प्रतिष्ठापित वटेश्वर-लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है। तत्पश्चात् जिसने स्थाणुवटका दर्शन और प्रदक्षिणा कर ली उसकी वह मानो सातों द्वीपवाली पृथ्वीकी की हुई प्रदक्षिणा हो जाती है। स्थाणुकी पश्चिम दिशाकी ओर ‘नकुलीश’ |
अध्याय ४६] स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य १९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमभ्यर्च्य प्रयत्नेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे तीर्थं रुद्रकरं स्मृतम्॥ १४ | नामके गण स्थित हैं। विधिपूर्वक उनकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे छूट जाता है। उनकी दक्षिण दिशामें 'रुद्रकरतीर्थ' है॥ ११—१४॥ |
| तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे रावणेन महात्मना॥ १५<br><br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं गोकर्णं नाम नामतः।<br>आषाढमासे या कृष्णा भविष्यति चतुर्दशी।<br>तस्यां योऽर्चति गोकर्णं तस्य पुण्यफलं शृणु॥ १६<br><br>कामतोऽकामतो वापि यत् पापं तेन संचितम्।<br>तस्माद् विमुच्यते पापात् पूजयित्वा हरं शुचिः॥ १७<br><br>कौमारब्रह्मचर्येण यत्पुण्यं प्राप्यते नरैः।<br>तत्पुण्यं सकलं तस्य अष्टम्यां योऽर्चयेच्छिवम्॥ १८ | जिसने उस (रुद्रकरतीर्थ)-में स्नान कर लिया मानो उसने सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसकी उत्तर दिशाकी ओर महात्मा रावणने गोकर्ण नामका प्रसिद्ध महालिङ्ग स्थापित किया है। आषाढ़मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें जो गोकर्णकी अर्चना करता है उसके पुण्यफलको सुनो। यदि किसीने अपनी इच्छा या अनिच्छासे भी पापसंचय कर लिया है तो वह भगवान् शंकरकी पूजा करके पवित्र हो जाता है और वह संचित पापसे छूट जाता है। जो अष्टमी तिथिमें शिवका पूजन करता है उसे कौमार-अवस्था (जन्मसे १६ वर्षकी अवस्था)-में ब्रह्मचर्य-पालनसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण पुण्य-फल उसे प्राप्त होता है॥ १५—१८॥ |
| यदीच्छेत् परमं रूपं सौभाग्यं धनसंपदः।<br>कुमारेश्वरमाहात्म्यात् सिद्ध्यते नात्र संशयः॥ १९<br><br>तस्य चोत्तरदिग्भागे लिङ्गं पूज्य विभीषणः।<br>अजरामरश्चैव कल्पयित्वा बभूव ह॥ २०<br><br>आषाढस्य तु मासस्य शुक्ला या चाष्टमी भवेत्।<br>तस्यां पूज्य सोपवासो ह्यमृतत्वमवाप्नुयात्॥ २१<br><br>खरेण पूजितं लिङ्गं तस्मिन् स्थाने द्विजोत्तम।<br>तं पूजयित्वा यत्नेन सर्वकामानवाप्नुयात्॥ २२ | यदि मनुष्य उत्तम सौन्दर्य, सौभाग्य या धन-सम्पत्ति चाहता है तो (उसे कुमारेश्वरकी आराधना करनी चाहिये; क्योंकि) कुमारेश्वरके माहात्म्यसे उसे निस्सन्देह उन सबकी सिद्धि प्राप्त होती है। उन (कुमारेश्वर)-के उत्तर भागमें विभीषणने शिव-लिङ्गको स्थापित कर उसकी पूजा की, जिससे वे अजर और अमर हो गये। आषाढ़ महीनेके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास रहकर उसकी पूजा करनेवाला मनुष्य देवत्व प्राप्त कर लेता है। द्विजोत्तम! खरने वहाँपर लिङ्गकी पूजा की थी। उस लिङ्गकी विधिपूर्वक पूजा करनेवालेकी सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ १९—२२॥ |
| दूषणस्त्रिशिराश्चैव तत्र पूज्य महेश्वरम्।<br>यथाभिलषितान् कामानापतुस्तौ मुदान्वितौ॥ २३<br><br>चैत्रमासे सिते पक्षे यो नरस्तत्र पूजयेत्।<br>तस्य तौ वरदौ देवौ प्रयच्छेतेऽभिवाञ्छितम्॥ २४<br><br>स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण हस्तिपादेश्वरः शिवः।<br>तं दृष्ट्वा मुच्यते पापैरन्यजन्मनि संभवैः॥ २५<br><br>तस्य दक्षिणतो लिङ्गं हारीतस्य ऋषेः स्थितम्।<br>यत् प्रणम्य प्रयत्नेन सिद्धिं प्राप्नोति मानवः॥ २६ | दूषण एवं त्रिशिराने भी वहाँ महेश्वरकी पूजा की और वे प्रसन्न हो गये। उन दोनोंने अभिवाञ्छित मनोरथ प्राप्त कर लिये। चैत्र महीनेके शुक्लपक्षमें जो मनुष्य वहाँ पूजन करता है, उसकी समस्त इच्छाएँ वे दोनों देव पूरी कर देते हैं। 'हस्तिपादेश्वर' शिव स्थाणुवटकी पूर्व दिशामें हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अन्य जन्मोंमें बने पापोंसे छूट जाता है। उसके दक्षिणमें हारीत नामके ऋषिद्वारा स्थापित किया हुआ लिङ्ग है, जिसको विधिपूर्वक प्रणाम करनेसे (ही) मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ २३—२६॥ |
५०- कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीयाके महत्त्वकी कथा
| १९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४६ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु वापीतस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं त्रैलोक्यविख्यातं सर्वपापहरं शिवम्॥ २७<br>कङ्कालरूपिणा चापि रुद्रेण सुमहात्मना।<br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २८<br>भुक्तिदं मुक्तिदं प्रोक्तं सर्वकिल्बिषनाशनम्।<br>लिङ्गस्य दर्शनाच्चैव अग्निष्टोमफलं लभेत्॥ २९<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे लिङ्गं सिद्धप्रतिष्ठितम्।<br>सिद्धेश्वरं तु विख्यातं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ ३० | उसके निकट दक्षिण भागमें महात्मा वापीतके द्वारा संस्थापित सभी पापोंका हरण करनेवाला कल्याणकर्ता लिङ्ग है जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। कंकालके रूपमें रहनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रने भी समस्त पापोंका नाश करनेवाला महालिङ्ग प्रतिष्ठित किया है। महात्मा रुद्रद्वारा प्रतिष्ठापित वह लिङ्ग भुक्ति एवं मुक्तिका देनेवाला तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। उस लिङ्गका दर्शन करनेसे ही अग्निष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति हो जाती है। उसकी पश्चिम दिशामें सिद्धोंद्वारा प्रतिष्ठित सिद्धेश्वर नामसे विख्यात लिङ्ग है। वह सर्वसिद्धिप्रदाता है॥ २७-३०॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे मृकण्डेन महात्मना।<br>तत्र प्रतिष्ठितं लिङ्गं दर्शनात् सिद्धिदायकम्॥ ३१<br>तस्य पूर्वे च दिग्भागे आदित्येन महात्मना।<br>प्रतिष्ठितं लिङ्गवरं सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ३२<br>चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो रम्भा चाप्सरसां वरा।<br>परस्परं सानुरागौ स्थाणुदर्शनकाङ्क्षिणौ॥ ३३<br>दृष्ट्वा स्थाणुं पूजयित्वा सानुरागौ परस्परम्।<br>आराध्य वरदं देवं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्॥ ३४ | उसकी दक्षिण दिशामें महात्मा मृकण्डने (शिव) लिङ्गकी स्थापना की है। उस लिङ्गके दर्शन करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। उसके पूर्व भागमें महात्मा आदित्यने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ लिङ्गको प्रतिष्ठापित किया है। अप्सराओंमें श्रेष्ठ रम्भा और चित्राङ्गद नामके गन्धर्व—इन दोनोंने परस्परमें प्रेमपूर्वक स्थाणु भगवान्के दर्शन किये; फिर उनका पूजन किया और तब वरदानी देवकी स्थापनाकर आराधना की। (उनसे स्थापित लिङ्गोंका नाम हुआ चित्राङ्गद और रम्भेश्वर)॥ ३१-३४॥ |
| चित्राङ्गदेश्वरं दृष्ट्वा तथा रम्भेश्वरं द्विज।<br>सुभगो दर्शनीयश्च कुले जन्म समाप्नुयात्॥ ३५<br>तस्य दक्षिणतो लिङ्गं वज्रिणा स्थापितं पुरा।<br>तस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br>पराशरेण मुनिना तथैवाराध्य शंकरम्।<br>प्राप्तं कवित्वं परमं दर्शनाच्छंकरस्य च॥ ३७<br>वेदव्यासेन मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>सर्वज्ञत्वं ब्रह्मज्ञानं प्राप्तं देवप्रसादतः॥ ३८ | द्विज! चित्राङ्गदेश्वर एवं रम्भेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सुन्दर और दर्शनीय (रूपवाला) हो जाता है एवं सत्कुलमें जन्म ग्रहण करता है। उसके दक्षिण भागमें इन्द्रने प्राचीन कालमें लिङ्गकी स्थापना की थी। इन्द्रद्वारा प्रतिष्ठापित लिङ्गके प्रसादसे मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार पराशर मुनिने शंकरकी आराधना की और भगवान् शंकरके दर्शनसे उत्कृष्ट कवित्वको प्राप्त किया। वेदव्यास मुनिने परमेश्वर (शंकर)-की आराधना की और उनकी कृपासे सर्वज्ञता तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया॥ ३५-३८॥ |
| स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे वायुना जगदायुना।<br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं दर्शनात् पापनाशनम्॥ ३९<br>तस्यापि दक्षिणे भागे लिङ्गं हिमवतेश्वरम्।<br>प्रतिष्ठितं पुण्यकृतां दर्शनात् सिद्धिकारकम्॥ ४० | स्थाणुके पश्चिम भागमें जगत्के प्राण-स्वरूप (जगत्प्राण) वायुने महालिङ्गको प्रतिष्ठित किया है, जो दर्शनमात्रसे ही पापका विनाश कर देता है। उसके भी दक्षिण भागमें हिमवतेश्वर लिङ्ग प्रतिष्ठित है। पुण्यात्माओंने उसे प्रतिष्ठित किया है। उसका दर्शन सिद्धि देनेवाला है। |
| अध्याय ४६ ] | स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य | १९९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यापि पश्चिमे भागे कार्तवीर्येण स्थापितम्।<br>लिङ्गं पापहरं सद्यो दर्शनात् पुण्यमाप्नुयात्॥ ४१<br><br>तस्याप्युत्तरदिग्भागे सुपार्श्वे स्थापितं पुनः।<br>आराध्य हनुमांश्चाप सिद्धिं देवप्रसादतः॥ ४२ | उसके पश्चिम भागमें कार्तवीर्यने (एक) लिङ्गकी स्थापना की है। (यह लिङ्ग) पापका तत्काल हरण करनेवाला है। (इसके) दर्शन करनेसे पुण्यकी प्राप्ति होती है। उसके भी उत्तरकी ओर बिलकुल निकट स्थानमें (एक) लिङ्गकी स्थापना हुई है; हनुमान्ने उस लिङ्गकी आराधना कर शंकरकी कृपासे सिद्धि प्राप्त की॥ ३९-४२॥ |
| तस्यैव पूर्वदिग्भागे विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>आराध्य वरदं देवं चक्रं लब्धं सुदर्शनम्॥ ४३<br><br>तस्यापि पूर्वदिग्भागे मित्रेण वरुणेन च।<br>प्रतिष्ठितौ लिङ्गवरौ सर्वकामप्रदायकौ॥ ४४<br><br>एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।<br>सेवितानि प्रयत्नेन सर्वपापहराणि वै॥ ४५<br><br>स्वर्णलिङ्गस्य पश्चात्तु ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येषां संख्या न विद्यते॥ ४६<br><br>तथा ह्युत्तरतस्तस्य यावदोधवती नदी।<br>सहस्रमेकं लिङ्गानां देवपश्चिम्रतः स्थितम्॥ ४७ | उसके भी पूर्वी भागमें प्रभावशाली विष्णुने वरदाता महादेवकी आराधना कर सुदर्शनचक्र प्राप्त किया था। उसके भी पूर्वी भागमें मित्र एवं वरुणने सभी अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाले दो लिङ्गोंकी स्थापना की है। ये दोनों लिङ्ग सभी प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले हैं। मुनियों, साध्यों, आदित्यों एवं वसुओंद्धारा इन लिङ्गोंकी उत्साहपूर्वक सेवा की गयी है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने स्वर्णलिङ्गके पीछेकी ओर जिन लिङ्गोंको प्रतिष्ठित किया है, उनकी संख्या नहीं गिनी जा सकती। उसी प्रकार स्वर्णलिङ्गके उत्तर ओघवती नदीतक पश्चिमकी ओर महादेवके एक हजार लिङ्ग स्थित हैं॥ ४३-४७॥ |
| तस्यापि पूर्वदिग्भागे बालखिल्यैर्महात्मभिः।<br>प्रतिष्ठिता रुद्रकोट्यार्वित्संनिहितं सरः॥ ४८<br><br>दक्षिणेन तु देवस्य गन्धर्वैर्यक्षकिन्नरैः।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येषां संख्या न विद्यते॥ ४९<br><br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च लिङ्गानां वायुरब्रवीत्।<br>असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्राः स्थाणुमाश्रिताः॥ ५०<br><br>एतज्ज्ञात्वा श्रद्दधानः स्थाणुलिङ्गं समाश्रयेत्।<br>यस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम्॥ ५१ | उस (नदी)-के पूर्वी भागमें महात्मा बालखिल्योंने संनिहित सरोवरतक करोड़ों रुद्रोंकी स्थापना की है। गन्धर्वों, यक्षों एवं किन्नरोंने दक्षिण दिशाकी ओर भगवान् शंकरके असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना की है। वायुका कहना है कि साढ़े तीन करोड़ लिङ्गोंकी स्थापना हुई है। स्थाणुतीर्थमें अनन्त सहस्र रुद्र-लिङ्ग विद्यमान हैं। मनुष्यको चाहिये कि श्रद्धाके साथ स्थाणु-लिङ्गका आश्रय ले। इससे स्थाणु-लिङ्गकी दयासे मनोवाञ्छित फल मिलता है॥ ४८-५१॥ |
| अकामो वा सकामो वा प्रविष्टः स्थाणुमन्दिरम्।<br>विमुक्तः पातकैर्घोरैः प्राप्नोति परमं पदम्॥ ५२<br><br>चैत्रमासे त्रयोदश्यां दिव्यनक्षत्रयोगतः।<br>शुक्रार्कचन्द्रसंयोगे दिने पुण्यतमे शुभे॥ ५३ | जो मनुष्य निष्काम या सकामभावसे स्थाणु-मन्दिरमें प्रवेश करता है, वह घोर पापोंसे छुटकारा पाकर परम पदको प्राप्त करता है। जब चैत्र महीनेकी त्रयोदशी तिथिमें दिव्य नक्षत्रोंका योग हुआ और उसमें शुक्र, सूर्य, चन्द्रका (शुभ) संयोग हुआ तब |
अध्याय ४७ ] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०१ तत्र कृत्वा तपो घोरं धर्मेणावृत्य रोदसी। प्राप्तवान् ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ ८ वेनो राजा समभवत् समस्ते क्षितिमण्डले। स मातामहदोषेण तेन कालात्मजात्मजः॥ ९ घोषयामास नगरे दुरात्मा वेदनिन्दकः। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं कदाचन ॥ १० अहमेकोऽत्र वै वन्द्यः पूज्योऽहं भवतां सदा। मया हि पालिता यूयं निवसंध्वं यथासुखम् ॥ ११ तन्मत्तोऽन्यो न देवोऽस्ति युष्माकं यः परायणम्। एतच्छ्रुत्वा तु वचनमृषयः सर्व एव ते॥ १२ परस्परं समागम्य राजानं वाक्यमब्रुवन् । श्रुतिः प्रमाणं धर्मस्य ततो यज्ञः प्रतिष्ठितः ॥ १३ यज्ञैर्विना नो प्रीयन्ते देवाः स्वर्गनिवासिनः। अप्रीता न प्रयच्छन्ति वृष्टिं सस्यस्य वृद्धये ॥ १४ तस्माद् यज्ञैश्च देवैश्च धार्यते सचराचरम्। एतच्छ्रुत्वा क्रोधदृष्टिर्वेनः प्राह पुनः पुनः ॥ १५ न यष्टव्यं न दातव्यमित्याह क्रोधमूर्च्छितः। ततः क्रोधसमाविष्टा ऋषयः सर्व एव ते ॥ १६ निजघ्नुर्मन्त्रपूतैस्ते कुशैर्वज्रसमन्वितैः। ततस्त्वराजके लोके तमसा संवृते तदा ॥ १७ दस्युभिः पीड्यमानास्तान् ऋषींस्ते शरणं ययुः । ततस्ते ऋषयः सर्वे ममन्थुस्तस्य वै करम् ॥ १८ सव्यं तस्मात् समुत्तस्थौ पुरुषो ह्रस्वदर्शनः। तमूचुर्ऋषयः सर्वे निषीदतु भवानिति ॥ १९ उसने वहाँ घोर तपस्या की तथा पृथ्वी एवं आकाशके बीचके स्थानको धर्मसे व्याप्तकर नहीं लौटनेवाले स्थान उस ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया। (और इधर) वेन सम्पूर्ण भूमण्डलका राजा हो गया। अपने नानाके उस दोषके कारण कालकन्या भयाके उस दुष्टात्मा वेद-निन्दक पुत्रने नगरमें यह घोषणा करा दी कि कभी भी (कोई) दान न दे, यज्ञ न करे एवं हवन न करे - (दान, यज्ञ, हवन करना अपराध माना जायेगा) ॥ ७-१०॥ इस संसारमें एकमात्र मैं ही आपलोगोंका वन्दनीय और पूजनीय हूँ। आपलोग मुझसे रक्षित रहकर आनन्दपूर्वक निवास करें। मुझसे भिन्न कोई दूसरा देवता नहीं है, जो आपलोगोंका उत्तम आश्रय हो सके। वेनके इस वचनको सुननेके पश्चात् सभी ऋषियोंने आपसमें मिलकर (निश्चय किया और) राजासे यह वचन कहा - राजन् ! धर्मके विषयमें वेद (-शास्त्र) ही प्रमाण हैं। उन्हींसे यज्ञ विहित हैं, प्रतिष्ठित हैं- विष्णुरूपमें मान्य हैं। (उन) यज्ञोंके किये बिना स्वर्गमें रहनेवाले देवता सन्तुष्ट नहीं होते और बिना सन्तुष्ट हुए वे अन्नकी वृद्धिके लिये जलकी वृष्टि नहीं करते। अतः विष्णुमय यज्ञों और देवताओंसे ही चर-अचर समस्त संसारका धारण और पोषण होता है। यह सुनकर वेन क्रोधसे आँखें लालकर बार-बार कहने लगा - ॥ ११-१५॥ क्रोधसे झल्लाकर (तिलमिलाकर) उसने 'न यज्ञ करना होगा और न दान देना होगा' - ऐसा कहा। उसके बाद ऋषियोंने भी क्रुद्ध होकर मन्त्रद्वारा वज्रमय कुशोंसे उसे मार डाला। उसके (मर जानेके) बाद (राजासे रहित) संसारमें अराजकता छा गयी, जिससे सर्वत्र अशान्ति फैल गयी। चोरों-डाकुओंने लोकजनोंको पीड़ित कर डाला। दस्युदलोंसे त्रस्त जनवर्ग उन ऋषियोंकी शरणमें गया, जिस ऋषिवर्गने उस वेनको मार डाला था। उसके बाद उन सभी ऋषियोंने उसके बायें हाथको मथित किया। उससे एक पुरुष निकला जो छोटा बौना दीख रहा था। सभी ऋषियोंने उससे कहा- 'निषीदतु भवान्' अर्थात् आप बैठें ॥ १६-१९॥
| २०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
|---|
| प्रायश्चित्तं करिष्येऽहं यद् वदिष्यन्ति देवताः।<br>ततस्ता देवताः सर्वा इदं वचनमब्रुवन्॥ ४५<br><br>स्नात्वा स्नात्वा च तीर्थेषु अभिषिञ्चस्व वारिणा।<br>ओजसा चुलुकं यावत् प्रतिकूले सरस्वतीम्॥ ४६<br><br>स्नात्वा मुक्तिमवाप्नोति पुरुषः श्रद्धयान्वितः।<br>एष स्वपोषणपरो देवदूषणतत्परः॥ ४७<br><br>ब्राह्मणैश्च परित्यक्तो नैष शुद्ध्यति कर्हिचित्।<br>तस्मादेनं समुद्दिश्य स्नात्वा तीर्थेषु भक्तितः॥ ४८<br><br>अभिषिञ्चस्व तोयेन ततः पूतो भविष्यति।<br>इत्येतद्वचनं श्रुत्वा कृत्वा तस्याश्रमं ततः॥ ४९<br><br>तीर्थयात्रां ययौ राजा उद्दिश्य जनकं स्वकम्।<br>स तेषु प्लावनं कुर्वंस्तीर्थेषु च दिने दिने॥ ५०<br><br>अभ्यषिञ्चत् स्वपितरं तीर्थतोयेन नित्यशः।<br>एतस्मिन्नेव काले तु सारमेयो जगाम ह॥ ५१<br><br>स्थाणोर्मठे कौलपतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता।<br>परिग्रहस्य द्रव्यस्य परिपालयिता सदा॥ ५२<br><br>प्रियश्च सर्वलोकेषु देवकार्यपरायणः।<br>तस्यैवं वर्त्तमानस्य धर्ममार्गे स्थितस्य च॥ ५३<br><br>कालेन चलिता बुद्धिर्देवद्रव्यस्य नाशने।<br>तेनाधर्मेण युक्तस्य परलोकगतस्य च॥ ५४<br><br>दृष्ट्वा यमोऽब्रवीद् वाक्यं श्वयोनिं व्रज मा चिरम्।<br>तद्वाक्यानन्तरं जातः श्वा वै सौगन्धिके वने॥ ५५<br><br>ततः कालेन महता श्वयूथपरिवारितः।<br>परिभूतः सरमया दुःखेन महता वृतः॥ ५६<br><br>त्यक्त्वा द्वैतवनं पुण्यं सन्निहत्यं ययौ सरः।<br>तस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु स्थाणोरेव प्रसादतः॥ ५७<br><br>अतीव तृषया युक्तः सरस्वत्यां ममज्ज ह।<br>तत्र संप्लुतदेहस्तु विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः॥ ५८ | (परन्तु) देवगण! आपलोग इसके लिये जो प्रायश्चित्त कहेंगे, उसे मैं करूँगा। उसके ऐसा कहनेपर उन सभी देवताओंने यह बात कही—तीर्थमें बार-बार (स्नान करके) तीर्थ-जलद्वारा इसे बार-बार सींचो। सरस्वतीके तटपर 'ओजसतीर्थ'से 'चुलुक'पर्यन्त हर-एक तीर्थमें स्नान करनेवाला श्रद्धालु पुरुष मुक्तिको प्राप्त करता है। यह अपना ही पालन-पोषण करनेमें लगा रहता था एवं देवताओंकी निन्दा करनेमें तत्पर रहता था। ब्राह्मणोंने इसको पाप करनेके कारण त्याग दिया था। यह कभी भी शुद्ध नहीं हो सकता। इसलिये (इसकी यदि शुद्धि चाहते हो तो) इसके उद्देश्यसे तीर्थोंमें जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करके तीर्थ-जलसे इसे अभिषिक्त करो। इससे यह पवित्र हो जायगा। उसके बाद राजा देवताओंके इन वचनोंके सुननेके बाद वहाँ अपने पिताके लिये एक आश्रमका निर्माण कराकर उसके उद्देश्यसे तीर्थयात्रा करने चला गया। वह प्रतिदिन उन तीर्थोंमें स्नान करते हुए तीर्थजलसे अपने पिताको अभिषिक्त करने लगा। इसी समय वहाँ एक कुत्ता आ गया। (कुत्तेका इतिहास इस प्रकार है—) पूर्वकालमें वह कुत्ता स्थाणुतीर्थमें स्थित मठमें देव-द्रव्योंकी रक्षा करनेवाला—दानमें प्राप्त द्रव्यका सदा पालन करनेवाला—सर्वजनप्रिय एवं देवकृत्यमें रत कौलपति नामका महन्त था। इस प्रकार वह अपना जीवनयापन कर रहा था। एक बार धर्ममार्गमें स्थित रहते हुए भी उस कौलपतिकी बुद्धि कुछ समयके बाद धर्ममार्गसे हट गयी। वह देवद्रव्यका नाश (दुरुपयोग) करने लगा। वह अधर्मी (बना) कौलपति जब मरकर परलोकमें गया, तब यमराजने उसे (उसके कर्मविपाकको) देखकर कहा—तुम कुत्तेकी योनिमें जाओ, देर मत करो। उनके कहनेके पश्चात् वह महन्त सौगन्धिक वनमें कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ॥ ४५—५५॥<br><br>उसके बाद बहुत समय व्यतीत होनेतक वह कुत्ता कुत्तोंके झुंडसे घिरा रहता था; फिर भी कुतियासे अपमानित होनेके कारण अत्यन्त दुःखित रहता था। इसलिये वह द्वैतवनको छोड़कर पवित्र सन्निहत्य-सरोवरमें चला गया। उसमें प्रवेश करते ही स्थाणु भगवान्की ही कृपासे अत्यन्त प्यासा होकर उसने सरस्वती नदीमें डुबकी लगायी। उसमें स्नान करनेसे ही वह समस्त पापोंसे विमुक्त हो गया। |
अध्याय ४७ ] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहारलोभेन तदा प्रविवेश कुटीरकम्।<br>प्रविशन्तं तदा दृष्ट्वा श्वानं भयसमन्वितः॥ ५९<br>स तं पस्पर्श शनकैः स्थाणुतीर्थे ममज्ज ह।<br>पततः पूर्वतीर्थेषु विप्रुषैः परिषिञ्चतः॥ ६०<br>शुनोऽस्य गात्रसम्भूतैरब्बिन्दुभिः स सिञ्चितः।<br>विरक्तदृष्टिश्च शुनः क्षेपेण च ततः परम्॥ ६१<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यात् स पुत्रेण च तारितः।<br>नियतस्तत्क्षणाज्जातो दिव्यदेहसमन्वितः।<br>प्रणिपत्य तदा स्थाणुं स्तुतिं कर्तुं प्रचक्रमे॥ ६२ | उसके बाद आहारके लोभसे उसने कुटीमें प्रवेश किया। उस कुत्तेको प्रवेश करते देखकर भयभीत होकर उस (वेन)-ने उसका धीरेसे स्पर्श किया। स्पर्श करनेके बाद स्थाणुतीर्थमें उसने स्नान किया। पूर्वतीर्थोंमें स्नान करनेके बाद तीर्थके जलबिन्दुओंसे सिञ्चित करनेवाले पुत्रसे एवं उस कुत्तेके शरीरसे निकले जलबिन्दुओंसे सिञ्चित होने तथा कुत्तेके भयसे स्थाणुतीर्थमें गिर जानेके कारण स्नान हो जानेके माहात्म्यसे उसकी दृष्टि विरक्त हो गयी। पुत्रने स्थाणुतीर्थके माहात्म्यसे अपने पिताका उद्धार कर दिया और संयतेन्द्रिय होकर उसने तत्काल दिव्य देह धारण कर भगवान् स्थाणुको प्रणाम किया और स्तुति करना प्रारम्भ किया॥ ५६—६२॥ |
| वेन उवाच<br>प्रपद्ये देवमीशानं त्वामजं चन्द्रभूषणम्।<br>महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम्॥ ६३<br>नमस्ते देवदेवेश सर्वशत्रुनिषूदन।<br>देवेश बलिविष्टम्भ देवदैत्यैश्च पूजित॥ ६४<br>विरूपाक्ष सहस्राक्ष त्र्यक्ष यक्षेश्वरप्रिय।<br>सर्वतः पाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख॥ ६५<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि।<br>शङ्कुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय॥ ६६ | वेन स्तुति करने लगा— मैं अजन्मा चन्द्रमाके शिरोभूषणवाले, ईशानदेव, महात्मा, सारे संसारका पालन करनेवाले आप महादेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। देवदेवेश! समस्त शत्रुओंके निषूदन! देवेश! बलिको निरुद्ध करनेवाले! देवों एवं दैत्योंसे पूजित! आपको नमस्कार है। हे (विरूप आँखवाले) विरूपाक्ष! हे (हजारों आँखोंवाले) सहस्राक्ष! हे तीन नेत्रोंवाले! हे यक्षेश्वरप्रिय! हे चारों ओरसे (हाथ-पैरवाले) पाणिपादयुक्त! हे चारों ओर आँख एवं मुखवाले! आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र सुन सकनेवाले और सभी स्थानोंपर व्याप्त हैं। संसारमें आपने सभीको आवृत कर (ढक) रखा है। हे शङ्कुकर्ण! हे महाकर्ण! हे कुम्भकर्ण! हे समुद्र-निवासी! आपको नमस्कार है॥ ६३—६६॥ |
| गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते।<br>शतजिह्व शतावर्त शतोदर शतानन॥ ६७<br>गायन्ति त्वां गायत्रिणो ह्यर्चयन्त्यर्क्रमर्चिणः।<br>ब्रह्माणं त्वा शतक्रतो उद्वंशमिव मेनिरे॥ ६८<br>मूर्त्तौ हि ते महामूर्ते समुद्राम्बुधरास्तथा।<br>देवताः सर्व एवात्र गोष्ठे गाव इवासते॥ ६९<br>शरीरे तव पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम्।<br>नारायणं तथा सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्॥ ७० | हे गजेन्द्रकर्ण! हे गोकर्ण! हे पाणिकर्ण! हे शतजिह्व! हे शतावर्त! हे शतोदर! हे शतानन! आपको नमस्कार है। गायत्रीका जप करनेवाले विद्वान् आपकी ही महिमा गाते हैं। सूर्यकी पूजा करनेवाले सूर्यरूपसे आपकी ही पूजा करते हैं। आपको ही सभी लोग इन्द्रसे श्रेष्ठ वंशवाला ब्रह्मा मानते हैं। महामूर्ते! आपकी मूर्तिमें समुद्र, मेघ और समस्त देवता ऐसे स्थित हैं जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं। मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, नारायण, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पतिको देख रहा हूँ॥ ६७—७०॥ |
| भगवान् कारणं कार्यं क्रियाकरणमेव तत्।<br>प्रभवः प्रलयश्चैव सदसच्चापि दैवतम्॥ ७१<br>नमो भवाय शर्वाय वरदायोगरूपिणे।<br>अन्धकासुरहन्त्रे च पशूनां पतये नमः॥ ७२ | आप भगवान्, कारण, कार्य, क्रियाके करण, प्रभव, प्रलय, सत्, असत् एवं दैवत हैं। भव, शर्व, वरद, उग्र-रूप धारण करनेवाले, अन्धकासुरको मारनेवाले और पशुओंके पति पशुपतिको नमस्कार है। |
| २०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलासक्तपाणये ।<br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्न नमोऽस्तु ते ॥ ७३<br>नमो मुण्डाय चण्डाय अण्डायोत्पत्तिहेतवे ।<br>डिण्डिमासक्तहस्ताय डिण्डिमुण्डाय ते नमः ॥ ७४ | हे त्रिपुरनाशक! तीन जटावाले, तीन सिरवाले, हाथमें त्रिशूल लिये रहनेवाले त्र्यम्बक एवं त्रिनेत्र (कहलानेवाले) आपको नमस्कार है। हे मुण्ड, चण्ड और अण्डकी उत्पत्तिके हेतु, डिण्डिमपाणि एवं डिण्डिमुण्ड! आपको नमस्कार है॥ ७३-७४॥ |
| नमोर्ध्वकेशदंष्ट्राय शुष्काय विकृताय च ।<br>धूम्रलोहितकृष्णाय नीलग्रीवाय ते नमः ॥ ७५<br>नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।<br>सूर्यमालाय सूर्याय स्वरूपध्वजमालिने ॥ ७६<br>नमो मानातिमानाय नमः पटुतराय ते ।<br>नमो गणेन्द्रनाथाय वृषकन्धाय धन्विने ॥ ७७<br>संक्रन्दनाय चण्डाय पर्णधारपुटाय च ।<br>नमो हिरण्यवर्णाय नमः कनकवर्चसे ॥ ७८ | हे ऊर्ध्वकेश, ऊर्ध्वदंष्ट्र, शुष्क, विकृत, धूम्र, लोहित, कृष्ण एवं नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। अप्रतिरूप, विरूप, शिव, सूर्यमाल, सूर्य एवं स्वरूपध्वजमालीको नमस्कार है। मानातिमानको नमस्कार है। आप पटुतरको नमस्कार है। गणेन्द्रनाथ, वृषकन्ध एवं धन्वीको नमस्कार है। संक्रन्दन, चण्ड, पर्णधारपुट एवं हिरण्यवर्णको नमस्कार है। कनकवर्चसको नमस्कार है॥ ७५-७८॥ |
| नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तुतिस्थाय नमोऽस्तु ते ।<br>सर्व्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतशरीरिणे ॥ ७९<br>नमो होत्रे च हन्त्रे च सितोद्रग्रपताकिने ।<br>नमो नम्याय नम्राय नमः कटकटाय च ॥ ८०<br>नमोऽस्तु कृशनाशाय शयितायोत्थिताय च ।<br>स्थिताय धावमानाय मुण्डाय कुटिलाय च ॥ ८१<br>नमो नर्त्तनशीलाय लयवादित्रशालिने ।<br>नाट्योपहारलुब्धाय मुखवादित्रशालिने ॥ ८२ | स्तुत किये गये तथा स्तुतिके योग्य (आप)-को नमस्कार है। स्तुतिमें स्थित, सर्व, सर्वभक्ष एवं सर्वभूतशरीरी आपको नमस्कार है। होता, हन्ता तथा सफेद और ऊँची पताकावालेको नमस्कार है। नमन करनेयोग्य एवं नम्रको नमस्कार है। आप कटकटको नमस्कार है। कृशनाश, शयित, उत्थित, स्थित, धावमान, मुण्ड एवं कुटिलको नमस्कार है। नर्तनशील, लय वाद्यशाली, नाट्यके उपहारके लोभी एवं मुखोंमें बम-बम-जैसे मुँहसे बोले जानेवाले वाद्य-प्रेमीको नमस्कार है॥ ७९-८२॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलातिबलघातिने ।<br>कालनाशाय कालाय संसारक्षयरूपिणे ॥ ८३<br>हिमवद्दुहितुः कान्त भैरवाय नमोऽस्तु ते ।<br>उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ८४<br>चितिभस्मप्रियायैव कपालाक्तपाणये ।<br>विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ८५<br>नमो विकृतवक्त्राय नमः पूतोग्रदृष्टये ।<br>पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बिवीणायप्रियाय च ॥ ८६ | ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, बलवान्से भी बलवान्को नष्ट करनेवाले, कालनाश, कालस्वरूप एवं संसारक्षयस्वरूप आपको नमस्कार है। हे हिमालयकी पुत्रीके पति-पार्वतीपति! आप भैरवको नमस्कार है और उग्ररूप आपको नित्य नमस्कार है। दस बाहुओंवाले (शिव)-को नमस्कार है। चिताके भस्मको प्रिय माननेवाले, कपालपाणि, अत्यधिक भयंकर भयरूप (भीष्म) एवं व्रतधर (आप)-को (नमस्कार) है। विकृत मुँहवाले (आप)-को नमस्कार है। पवित्र तेजस्विनी दृष्टिवाले, कच्चे-पक्के फलके गूदेको प्रिय माननेवाले, तुम्बी एवं वीणाको प्रिय माननेवालेको नमस्कार है॥ ८३-८६॥ |
| नमो वृषाङ्कवृक्षाय गोवृषाभिरुते नमः ।<br>कटङ्कटाय भीमाय नमः परपराय च ॥ ८७<br>नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदायिने ।<br>नमो विरक्तरक्ताय भावनायाक्षमालिने ॥ ८८<br>विभेदभेदभिन्नाय छायायै तपनाय च ।<br>अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ॥ ८९ | वृषाङ्कवृक्षको नमस्कार है। गोवृषाभिरुतको नमस्कार है। कटङ्कट, भीम एवं परसे भी परको नमस्कार है। सर्ववरिष्ठ, वर एवं वरदायीको नमस्कार है। विरक्त एवं रक्तरूप, भावन एवं अक्षमालीको नमस्कार है। विभेद एवं भेदसे भिन्न, छाया, तपन, अघोर तथा घोररूप एवं घोरघोरतर रूपको नमस्कार है। |
अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक [२०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च।<br>बहुनेत्रकपालाय एकमूर्ते नमोऽस्तु ते॥ ९०॥ | शिव एवं शान्तको नमस्कार है। शान्ततम, बहुनेत्र एवं कपालधारीको नमस्कार है। हे एकमूर्ति! आपको नमस्कार है॥ ८७—९०॥ |
| नमः क्षुद्राय लुब्धाय यज्ञभागप्रियाय च।<br>पञ्चालाय सिताङ्गाय नमो यमनियामिने॥ ९१॥<br>नमश्चित्रोरुघण्टाय घण्टाघण्टनिघण्टिने।<br>सहस्रशतघण्टाय घण्टामालाविभूषिणे॥ ९२॥<br>प्राणसंघट्टगर्वाय नमः किलिकिलिप्रिये।<br>हुंहुंकाराय पाराय हुंहुंकारप्रियाय च॥ ९३॥<br>नमः समसमे नित्यं गृहवृक्षनिकेतने।<br>गर्भमांसशृगालाय तारकाय तराय च॥ ९४॥ | क्षुद्र, लुब्ध, यज्ञभागप्रिय, पञ्चाल एवं सिताङ्गको नमस्कार है। यमके नियमनकर्ताको नमस्कार है। चित्रोरुघण्ट, घण्टाघण्टनिघण्टीको नमस्कार है। सहस्रशतघण्ट एवं घण्टामालाविभूषितको नमस्कार है। प्राणसंघट्टगर्व, किलिकिलिप्रिय, हुंहुंकार, पार एवं हुंहुंकारप्रियको नमस्कार है। समसम, गृहवृक्षनिकेती, गर्भमांसशृगाल, तारक एवं तरको नित्य नमस्कार है॥ ९१—९४॥ |
| नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च।<br>यज्ञवाहाय हव्याय तप्याय तपनाय च॥ ९५॥<br>नमस्तु पयसे तुभ्यं तुण्डानां पतये नमः।<br>अन्नदायान्नपतये नमो नानान्नभोजिने॥ ९६॥<br>नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च।<br>सहस्रोद्यतशूलाय सहस्राभरणाय च॥ ९७॥<br>बालानुचरगोप्त्रे च बाललीलाविलासिने।<br>नमो बालाय वृद्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च॥ ९८॥ | यज्ञ, यजी, हुत, प्रहुत, यज्ञवाह, हव्य, तप्य और तपनको नमस्कार है। पयरूप आपको नमस्कार है। तुण्डोंके पतिको नमस्कार है। अन्नद, अन्नपति एवं अनेक प्रकारके अन्नभोजीको नमस्कार है। हजारों सिरवाले, हजारों चरणवाले, हजारों शूलको उठाये हुए और हजारों आभूषणवालेको नमस्कार है। बालानुचरकी रक्षा करनेवाले, बाललीलामें विलास करनेवाले, बाल, वृद्ध, क्षुब्ध एवं क्षोभणको नमस्कार है॥ ९५—९८॥ |
| गङ्गालुलितकेशाय मुञ्जकेशाय वै नमः।<br>नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च॥ ९९॥<br>नग्नप्राणाय चण्डाय कृशाय स्फोटनाय च।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कथ्याय कथनाय च॥ १००॥<br>साङ्ख्याय साङ्ख्यमुख्याय साङ्ख्ययोगमुखाय च।<br>नमो विरथरथ्याय चतुष्पथरथाय च॥ १०१॥<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने।<br>वक्त्रसंधानकेशाय हरिकेश नमोऽस्तु ते।<br>त्र्यम्बिकाम्बिकनाथाय व्यक्ताव्यक्ताय वेधसे॥ १०२॥ | गङ्गालुलितकेश और मुञ्जकेशको नमस्कार है। छः कर्मोंसे संतुष्ट तथा तीन कर्मोंमें लगे रहनेवाले (आप)-को नमस्कार है। नग्नप्राण, चण्ड, कृश, स्फोटन तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके कथ्य और कथनको नमस्कार है। सांख्य, सांख्यमुख्य, सांख्ययोगमुख, विरथरथ्य तथा चतुष्पथरथको नमस्कार है। काले मृगचर्मके उत्तरीयवाले, साँपके जनेऊवाले, वक्त्रसंधानकेश, त्र्यम्बिकाम्बिकनाथ, दृश्य एवं अदृश्य और वेधास्वरूप हे हरिकेश! आपको नमस्कार है॥ ९९—१०२॥ |
| कामकामदकामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे।<br>नमः सर्वद पापघ्न कल्पसंख्याविचारिणे॥ १०३॥<br>महासत्त्व महाबाहो महाबल नमोऽस्तु ते।<br>महामेघ महाप्रख्य महाकाल महाद्युते॥ १०४॥<br>मेघावर्त्त युगावर्त्त चन्द्रार्कपतये नमः।<br>त्वमन्नमन्नभोक्ता च पक्वभुक् पावनोत्तम॥ १०५॥<br>जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजोद्भिदजाश्च ये।<br>त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः॥ १०६॥ | हे काम! हे कामद! हे कामको नष्ट करनेवाले! आप तृप्त और अतृप्तविचारीको नमस्कार है। हे सर्वद! हे पाप दूर करनेवाले! आप कल्पसंख्याविचारीको नमस्कार है। हे महासत्त्व! हे महाबाहु! हे महाबल! हे महामेघ! हे महाप्रख्य! हे महाकाल एवं हे महाद्युति! आपको नमस्कार है। हे मेघावर्त्त! हे युगावर्त्त! आप चन्द्रार्कपतिको नमस्कार है। आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, पक्वभुक् एवं पवित्रोंमें श्रेष्ठ हैं। हे देवदेवेश! आप ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—चतुर्विध भूतसमुदाय हैं॥ १०३—१०६॥ |
| २०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्रष्टा चराचरस्यास्य पाता हर्ता तथैव च।<br>त्वामाहुर्ब्रह्म विद्वांसो ब्रह्म ब्रह्मविदां गतिम्॥ १०७<br><br>मनसः परमज्योतिस्त्वं वायुर्ज्योतिषामपि।<br>हंसवृक्षे मधुकरमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः॥ १०८<br><br>यजुर्मयो ऋङ्मयस्त्वामाहुः साममयस्तथा।<br>पठ्यसे स्तुतिभिर्नित्यं वेदोपनिषदां गणैः॥ १०९<br><br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये।<br>त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युतोऽशनिगर्जितम्॥ ११० | आप इस चराचरकी सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले एवं संहार करनेवाले हैं। विद्वज्जन आपको ब्रह्म एवं ज्ञानियोंकी (कैवल्य) गति कहते हैं। आप मनकी परमज्योति हैं और ज्योतियोंके (धारण करनेवाले) वायु हैं। ब्रह्मवादीजन आपको हंसवृक्षपर रहनेवाला भ्रमर कहते हैं। वे आपको यजुर्मय, ऋङ्मय एवं साममय कहते हैं। वेद और उपनिषदोंके समूह स्तुतियोंद्वारा आपका ही नित्य पाठ करते हैं। आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अवर वर्ण, मेघसमूह, विद्युत् तथा मेघगर्जन भी हैं॥ १०७—११०॥ |
| संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च।<br>युगा निमेषाः काष्ठाश्च नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः॥ १११<br><br>वृक्षाणां ककुभोऽसि त्वं गिरीणां हिमवान्गिरिः।<br>व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योनन्तश्च भोगिनाम्॥ ११२<br><br>क्षीरोदोऽस्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च॥ ११३<br><br>त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे।<br>व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ॥ ११४ | आप युग, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, निमेष, काष्ठा तथा कला हैं। आप वृक्षोंमें अर्जुन वृक्ष, पर्वतोंमें हिमालय, पशुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ और साँपोंमें शेषनाग हैं। आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रोंमें धनुष, आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य हैं। आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं॥ १११—११४॥ |
| त्वं शरी त्वं गदी चापि खट्वाङ्गी च शरासनी।<br>छेत्ता भेत्ता प्रहर्ताऽसि मन्ता नेता सनातनः॥ ११५<br><br>दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>समुद्राः सरितो गङ्गा पर्वताश्च सरांसि च॥ ११६<br><br>लतावल्ल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः।<br>द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः॥ ११७<br><br>आदिश्चान्तश्च वेदानां गायत्री प्रणवस्तथा।<br>लोहितो हरितो नीलः कृष्णः पीतः सितस्तथा॥ ११८<br><br>कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा।<br>सवर्णश्चाप्यवर्णश्च कर्त्ता हर्त्ता त्वमेव हि॥ ११९ | आप बाण धारण करनेवाले, गदा धारण करनेवाले, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले एवं धनुर्धारी हैं। आप विदारण करनेवाले, प्रहार करनेवाले, अवबोधन (सतर्क) करनेवाले, प्राप्त करानेवाले और सनातन हैं। आप दस लक्षणोंसे संयुक्त धर्म, अर्थ एवं काम तथा समस्त समुद्र, नदियाँ, गङ्गा, पर्वत एवं सरोवर हैं। समस्त लताएँ, वल्लियाँ, तृण, ओषधियाँ; पशु, मृग, पक्षी; पृथ्वी, अप् आदि नवों द्रव्यों; उत्क्षेपण-आक्षेपण आदि पाँच कर्मों; रूप, रस, गन्ध आदि चौबीस गुणोंके आरम्भक भी आप ही हैं। आप ही समयपर फूल एवं फल देनेवाले हैं। आप वेदोंके आदि और अन्त हैं, गायत्री तथा प्रणव भी आप ही हैं। आप ही लोहित, हरित, नील, कृष्ण, पीत, सित, कद्रु, कपिल, कपोत, मेचक, सवर्ण, अवर्ण, कर्ता एवं हर्ता हैं॥ ११५—११९॥ |
| त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः।<br>उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च॥ १२०<br><br>शिक्षाछौत्रं त्रिसौपर्णं यजुषां शतरुद्रियम्।<br>पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्॥ १२१<br><br>तिन्दुको गिरिजो वृक्षो मुद्गं चाखिलजीवनम्।<br>प्राणाः सत्त्वं रजश्चैव तमश्च प्रतिपत्पतिः॥ १२२ | आप इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, पवन, उपप्लव, चित्रभानु, स्वर्भानु एवं भानु हैं। आप शिक्षा, होत्र, त्रिसौपर्ण, यजुर्वेदका शतरुद्रिय, पवित्रोंमें पवित्र एवं मङ्गलोंमें मङ्गल हैं। आप तिन्दुक, शिलाजतु, वृक्ष, मुद्ग, सबके जीवन, प्राण, सत्त्व, रज, तम तथा प्रतिपत्पति हैं। |
५१- मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन
अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०९
| प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च।<br>उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च॥ १२३ | आप ही प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष, छींक एवं जँभाई हैं॥ १२०-१२३॥ |
| लोहितान्तर्गतो दृष्टिमहावक्त्रो महोदरः।<br>शुचिरोमा हरिशमश्रूरूर्ध्वकेशश्चलाचलः॥ १२४<br><br>गीतवादित्रनृत्यज्ञो गीतवादित्रप्रियः।<br>मत्स्यो जालो जलौकाश्र्च कालः केलिकला कलिः॥ १२५<br><br>अकालश्च विकालश्च दुष्कालः काल एव च।<br>मृत्युश्च मृत्युकर्ता च यक्षो यक्षभयंकरः॥ १२६<br><br>संवर्त्तकोऽन्तकश्चैव संवर्त्तकबलाहकः।<br>घण्टा घण्टी महाघण्टी चिरी माली च मातलिः॥ १२७ | आप लोहितके अन्तःस्थित, दृष्टि, बड़े मुँहवाले, भारी पेटवाले, पवित्र रोमावलीवाले, हरिश्चश्मश्रु, ऊर्ध्वकेश एवं चल तथा अचल हैं। आप गाने, बजाने, नृत्यकलाके विद्वान् हैं तथा गाना-बजाना करनेवालोंके भी आप प्रिय हैं। आप मत्स्य, जाल, जलौका, काल तथा केलिकला एवं कलह हैं। आप अकाल, विकाल, दुष्काल और कालस्वरूप हैं। आप मृत्यु, मृत्युकर्ता, यक्ष तथा यक्षको भी भय देनेवाले हैं। आप संवर्तक, अन्तक एवं संवर्तक नामक बादल हैं। आप घण्टा, घण्टी, महाघण्टी, चिरी, माली और मातलि भी हैं॥ १२४-१२७॥ |
| ब्रह्मकालयमाग्नीनां दण्डी मुण्डी त्रिमुण्डधृक्।<br>चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्त्तकः ॥ १२८<br><br>चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरस्तथा।<br>नित्यमक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः॥ १२९<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिको गिरिकप्रियः।<br>शिल्पं च शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्त्तकः॥ १३०<br><br>भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः॥ १३१ | आप ब्रह्मा, काल, यम और अग्निको दण्ड देनेवाले, मुण्डी एवं त्रिमुण्डधारी हैं। आप चतुर्युग, चतुर्वेद एवं चातुर्होत्रके प्रवर्तक हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। आप नित्यद्यूतप्रिय, (धर्म्य) धूर्त्तईके भी प्रयोक्ता, गणाध्यक्ष और गणोंके स्वामी हैं। आप लाल माला और लाल वस्त्र धारण करनेवाले हैं तथा गिरिक, गिरिकप्रिय, शिल्प, शिल्पिश्रेष्ठ तथा हर प्रकारके शिल्पोंके प्रवर्तक हैं। आप भगनेत्राङ्कुश, चण्ड एवं पूषाके दाँतोंके विनाशक हैं। आप स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १२८-१३१॥ |
| गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकास्तारकामयः।<br>धाता विधाता संधाता पृथिव्या धरणोऽपरः॥ १३२<br><br>ब्रह्मा तपश्च सत्यं च व्रतचर्यमथार्जवम्।<br>भूतात्मा भूतकृद् भूतिर्भूतभव्यभवोद्भवः॥ १३३<br><br>भूर्भुवः स्वर्ऋतं चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः।<br>दीक्षितोऽदीक्षितः कान्तो दुर्दान्तो दान्तसम्भवः॥ १३४<br><br>चन्द्रावर्त्तो युगावर्त्तः संवर्त्तकप्रवर्त्तकः।<br>बिन्दुः कामो ह्यणुः स्थूलः कर्णिकारस्त्रजप्रियः॥ १३५ | आप गूढ़व्रतवाले, गुप्ततपस्यावाले, तारक और तारकामय हैं। आप धाता, विधाता, संधाता और पृथ्वीके श्रेष्ठ धारण और पोषण करनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, व्रत-चर्या और सरल एवं शुद्ध हैं। आप (पञ्च) भूतस्वरूप ऐश्वर्य और प्राणियोंके उत्पत्ति-स्थान हैं। आप भूः, भुवः, स्वः, ऋतः, ध्रुव, कोमल तथा महेश्वर हैं। आप दीक्षित, अदीक्षित, कान्त, दुर्दान्त (उग्र) और दान्तसे उत्पन्न हैं। आप चन्द्रावर्त, युगावर्त, संवर्तक और प्रवर्तक हैं। आप बिन्दु, काम, अणु, स्थूल तथा कनेरकी मालाके प्रेमी हैं॥ १३२-१३५॥ |
| नन्दीमुखो भीममुखः सुमुखो दुर्मुखस्तथा।<br>हिरण्यगर्भः शकुनिर्महोरगपतिर्विराट्॥ १३६ | आप नन्दीमुख, भीममुख, सुमुख तथा दुर्मुख हैं। आप हिरण्यगर्भ, शकुनि, महासर्पपति तथा विराट् हैं। |
| २१० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अधर्महा महादेवो दण्डधारो गणोत्कटः।<br>गोनर्दो गोप्रतारश्च गोवृषेश्वरवाहनः॥ १३७<br>त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गो मार्ग एव च।<br>स्थिरः श्रेष्ठश्च स्थाणुश्च विक्रोशः क्रोश एव च॥ १३८<br>दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः।<br>दुर्द्धर्षो दुष्प्रकाशश्च दुर्दर्शो दुर्जयो जयः॥ १३९ | आप अधर्मका नाश करनेवाले महादेव, दण्डधार, गणोत्कट, गोनर्द, गोप्रतार तथा गोवृषेश्वर-वाहन हैं। आप त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द, गोमार्ग तथा मार्ग हैं। आप स्थिर, श्रेष्ठ, स्थाणु, विक्रोश तथा क्रोश हैं। आप दुर्वारण, दुर्विषह, दुःसह, दुरतिक्रम, दुर्धर्ष, दुष्प्रकाश, दुर्दर्श, दुर्जय तथा जय हैं॥ १३६—१३९॥ |
| शशाङ्कानलशीतोष्णः क्षुत्तृष्णा च निरामयः।<br>आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिनाशनः॥ १४०<br><br>समूहश्च समूहस्य हन्ता देवः सनातनः।<br>शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः॥ १४१<br><br>त्र्यम्बको दण्डधारश्च उग्रदंष्ट्रः कुलान्तकः।<br>विषापहः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पते।<br>अमृताशी जगन्नाथो देवदेव गणेश्वरः॥ १४२<br><br>मधुश्च्युतानां मधुपो ब्रह्मवाक् त्वं घृतच्युत।<br>सर्वलोकस्य भोक्ता त्वं सर्वलोकपितामहः॥ १४३ | आप चन्द्र, अनल, शीत, उष्ण, क्षुधा, तृष्णा, निरामय, आधिव्याधि, व्याधिहन्ता एवं व्याधियोंको नष्ट करनेवाले हैं। आप समूह हैं और समूहके हन्ता तथा सनातन देव हैं। आप शिखण्डी, पुण्डरीकाक्ष तथा पुण्डरीकवनके आश्रय हैं। मरुत्पति! हे देवदेव! आप तीन नेत्रवाले, दण्डधारी, भयंकर दाँतवाले, कुलके अन्त करनेवाले, विषको नष्ट करनेवाले, सुरश्रेष्ठ, सोमरस पीनेवाले, अमृताशी, जगत्के स्वामी तथा गणेश्वर हैं। आप मधुसंग्रह करनेवालोंमें मधुप, वाणियोंमें ब्रह्मवाक्, घृतच्युत, समस्त लोकोंका पालन-पोषण और उपसंहार करनेवाले एवं सर्वलोकके पितामह हैं॥ १४०—१४३॥ |
| हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेकः<br>त्वं स्त्री पुमांस्त्वं हि नपुंसकं च।<br>बालो युवा स्थविरो देवदंष्ट्रा<br>त्वन्नो गिरिविश्वकृद् विश्वहर्ता॥ १४४<br>त्वं वै धाता विश्वकृतां वरेण्य-<br>स्त्वां पूजयन्ति प्रणताः सदैव।<br>चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते भवान् हि<br>त्वमेव चाग्निः प्रपितामहश्च।<br>आराध्य त्वां सरस्वतीं वाग्लभन्ते<br>अहोरात्रे निमिषोन्मेषकत्र्ता॥ १४५<br>न ब्रह्मा न च गोविन्दः पौराणा ऋषयो न ते।<br>माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन शंकर॥ १४६<br>पुंसां शतसहस्राणि यत्समावृत्य तिष्ठति।<br>महत्तस्तमसः पारे गोप्ता मन्ता भवान् सदा॥ १४७ | आप हिरण्यरेता तथा अद्वितीय पुरुष हैं। आप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक भी हैं। आप ही बालक, युवक, वृद्ध, देवदंष्ट्रा, गिरि, संसारके रचयिता तथा संसारके संहार करनेवाले भी हैं। आप विश्व रचनेवालोंमें वरणीय धाता हैं। विनयी जन सदैव आपकी पूजा करते हैं। चन्द्रमा एवं सूर्य आपके नेत्रस्वरूप हैं। आप ही अग्नि एवं प्रपितामह हैं। सरस्वतीरूप आपकी आराधना कर लोग (प्राञ्जल) वाणीकी प्राप्ति करते हैं। आप दिन और रात्रि हैं और निमेष एवं उन्मेषके कर्त्ता हैं। हे शंकर! ब्रह्मा, गोविन्द तथा प्राचीन ऋषि भी आपकी महिमाको ठीक-ठीक नहीं जान सकते। आप (अपनेमें) लाखों पुरुषोंको समावृत कर स्थित हैं। आप सदा महान् तमसे परे रहनेवाले परम रक्षक एवं (सबके) अवबोधक हैं॥ १४४—१४७॥ |
| यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ १४८ | निद्रारहित (अतः सदा जागरूक), श्वासपर विजय प्राप्त करनेवाले, सत्त्वगुणमें सदा स्थित एवं संयतेन्द्रिय योगिजन जिस ज्योतिका दर्शन करते हैं, उस योगात्मक (आप)-को नमस्कार है। |
| या मूर्तयश्च सूक्ष्मास्ते न शक्या या निदर्शितुम्।<br>ताभिर्मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम्॥ १४९ | सूक्ष्म होनेके कारण आपकी जो मूर्तियाँ प्रदर्शित नहीं की जा सकतीं उनके द्वारा आप सदा मेरी इस प्रकार रक्षा करें जैसे पिता अपने औरस |
| अध्याय ४७ ] | स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक | २११ |
|---|
| रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते।<br>भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि॥ १५०<br><br>जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे।<br>कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ १५१ | पुत्रकी रक्षा करता है। पुण्यात्मन्! आप मेरी रक्षा करें। मैं आपका रक्षणीय हूँ। आपको नमस्कार है। आप भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् हैं; मैं सदा आपका भक्त हूँ। जटी, दण्डी, लम्बोदरशरीरी तथा कमण्डलुनिषङ्ग रुद्रात्माको नमस्कार है॥ १४८—१५१॥ |
| यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसन्धिषु।<br>कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः॥ १५२<br><br>संभक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते।<br>यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम्॥ १५३<br><br>प्रविश्य वदनं राहोर्र्यः सोमं पिबते निशि।<br>ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानू रक्षितस्तव तेजसा॥ १५४<br><br>ये चात्र पतिता गर्भा रुद्रगन्धस्य रक्षणे।<br>नमस्तेऽस्तु स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्ति तदद्भुते॥ १५५ | जिनके केशोंमें बादल, समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें नदियाँ एवं कुक्षिमें चारों समुद्र हैं, उन तोयात्मा भगवान्को नमस्कार है। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर भूतोंको अपने उदरमें स्थित रखकर जो जलके मध्यमें शयन करते हैं उन जलशायी (विष्णु)-की मैं शरण लेता हूँ। रात्रिमें आप जो राहुके मुखमें प्रवेश कर सोमको पीते हैं तथा आपके तेजसे रक्षित राहु सूर्यको ग्रस लेता है, ऐसे आपको नमस्कार है। रुद्रगन्धकी रक्षामें जो यहाँ गर्भ (वाष्पराशि) गिरे, आपके ही तेजसे गिरे; अतः आपको नमस्कार है; उन्हीं अद्भुत (तेजों)-में स्वाहा तथा स्वधाको वे प्राप्त करते हैं॥ १५२—१५५॥ |
| येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम्।<br>रक्षन्तु ते हि मां नित्यं ते मामाप्याययन्तु वै॥ १५६<br><br>ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च।<br>वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च॥ १५७<br><br>चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च।<br>हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥ १५८<br><br>ये च पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च।<br>चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥ १५९<br><br>रसातलगता ये च ये च तस्मात् परं गताः।<br>नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यश्च नित्यशः॥ १६० | सभी देहधारियोंकी देहमें स्थित अङ्गुष्ठमात्रमें निवास करनेवाले जो पुरुष हैं, वे नित्य मेरी रक्षा करें तथा वे मुझे सर्वदा संतृप्त करें। जो नदियों, समुद्रों, पर्वतों, गुहाओं, वृक्षकी जड़ों, गायोंके रहनेके स्थानों, घने जंगलों, चौराहों, गलियों, चबूतरों, सभाओं, हथसारों, घुड़सारों और रथशालाओं, जीर्ण बाग-बगीचों, आलयों, पञ्चभूतों, पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशाओं एवं अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण एवं ईशानकोणोंमें स्थित हैं। जो चन्द्र और सूर्यके बीचमें रहनेवाले, चन्द्र तथा सूर्यकी किरणोंमें स्थित, रसातलमें रहनेवाले एवं उससे भी आगे पहुँचे हुए हैं, उनको नित्य बारम्बार नमस्कार है; नमस्कार है; नमस्कार है॥ १५६—१६०॥ |
| येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च।<br>असंख्येयगणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः॥ १६१<br><br>प्रसीद मम भद्रं ते तव भावगतस्य च।<br>त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिमतिस्त्वयि॥ १६२<br><br>स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम द्विजोत्तमः॥ १६३ | जिनकी कोई संख्या नहीं है और न प्रमाण तथा रूप ही है, उन अनगिनत रुद्रगणोंको सदा नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आपके भक्तिभावमें स्थित मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। हे देव! आपहीमें मेरा हृदय, मेरी बुद्धि एवं मति है। द्विजोत्तमने इस प्रकार महादेवकी स्तुति करके विराम ले लिया॥ १६१—१६३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७॥
| २१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४८ |
|---|
अड़तालीसवाँ अध्याय
वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, वेन आदिकी सुगतिका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— |
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| अथैनमब्रवीद् देवस्त्रैलोक्याधिपतिर्भवः।<br>आश्वासनकरं चास्य वाक्यविद् वाक्यमुत्तमम्॥ १<br><br>अहो तुष्टोऽस्मि ते राजन् स्तवेनानेन सुव्रत।<br>बहुनाऽत्र किमुक्तेन मत्समीपे वसिष्यसि॥ २<br><br>उषित्वा सुचिरं कालं मम गात्रोद्भवः पुनः।<br>असुरो ह्यन्धको नाम भविष्यसि सुरान्तकृत्॥ ३<br><br>हिरण्याक्षगृहे जन्म प्राप्य वृद्धिं गमिष्यसि।<br>पूर्वाधर्मेण घोरेण वेदनिन्दाकृतेन च॥ ४ | इसके बाद किसीकी किसी प्रकारकी भी उक्तिके अभिप्रायको भलीभाँति जाननेवाले तीनों लोकोंके स्वामी शंकरभगवान्ने उस (वेन)-को आश्वासन देनेवाला उत्तम वचन कहा—राजन्! सुव्रत! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं संतुष्ट हूँ। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है; तुम मेरे निकट (में ही सदा) निवास करोगे। बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद तुम फिर देवोंको नष्ट करनेवाले अन्धक नामक असुर होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होओगे और वेदकी निन्दा करनेसे पूर्वकालिक प्रचण्ड पापके कारण पुनः हिरण्याक्षके घरमें उत्पन्न होकर बड़े होगे—सयाने होगे॥ १—४॥ |
| साभिलाषो जगन्मातुर्भविष्यसि यदा तदा।<br>देहं शूलेन हत्वाहं पावयिष्यामि समार्बुदम्॥ ५<br><br>तत्राप्यकल्मषो भूत्वा स्तुत्वा मां भक्तितः पुनः।<br>ख्यातो गणाधिपो भूत्वा नाम्ना भृङ्गिरिटिः स्मृतः॥ ६<br><br>मत्सन्निधाने स्थित्वा त्वं ततः सिद्धिं गमिष्यसि।<br>वेनप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्त्तयेद् यः शृणोति च॥ ७<br><br>नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>यथा सर्वेषु देवेषु विशिष्टो भगवाञ्छिवः॥ ८<br><br>तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां वेननिर्मितः।<br>यशो राज्यसुखैश्वर्यधनमानाय कीर्त्तितः॥ ९ | जब तुम जगत्की माता (पार्वती)-की अभिलाषा करोगे तब मैं शूलद्वारा तुम्हारी देहका हनन करके दस करोड़ वर्षोंतकके लिये (तुम्हें) पवित्र करूँगा। उसके बाद वहाँ पापसे रहित होकर पुनः मेरी स्तुति करोगे और तब तुम भृङ्गिरिटि नामसे प्रसिद्ध गणाधिप बनोगे। फिर मेरी संनिधिमें रहकर तुम सिद्धिको प्राप्त करोगे। जो मनुष्य वेनके द्वारा कही हुई इस स्तुतिका कीर्तन करेगा या इसे सुनेगा, वह कभी अशुभ (अकल्याण)-को नहीं प्राप्त होगा और दीर्घ आयु प्राप्त करेगा। जैसे सभी देवताओंमें भगवान् शिवकी विशिष्टता है, वैसे ही वेनसे निर्मित यह स्तव सभी स्तवोंमें श्रेष्ठ (विशिष्ट) है। इसका कीर्तन यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, धन एवं मानका देनेवाला है॥ ५—९॥ |
| श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः।<br>व्याधितो दुःखितो दीनश्चौरराजभयान्वितः॥ १०<br><br>राजकार्यविमुक्तो वा मुच्यते महतो भयात्।<br>अनेनैव तु देहेन गणानां श्रेष्ठतां व्रजेत्॥ ११<br><br>तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः।<br>न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः॥ १२ | विद्याकी इच्छा रखनेवालेको श्रद्धासहित यत्नपूर्वक इस स्तुतिको सुनना चाहिये। व्याधिसे ग्रस्त, दुःखित, दीन, चोर या राजासे भयभीत अथवा राजकार्यसे अलग किया गया पुरुष (इस स्तुतिके द्वारा) महान् भयसे मुक्त होकर इसी देहसे गणोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करता है एवं निर्मल होकर तेज एवं यशसे युक्त होता है। जिस गृहमें इस स्तवका पाठ होता है उसमें राक्षस, पिशाच, भूत या विनायकगण विघ्न नहीं करते। पतिकी आज्ञा प्राप्त कर |
अध्याय ४८ ] वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य [ २१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विघ्नं कुर्युर्गृहे तत्र यत्रायं पठ्यते स्तवैः।<br>शृणुयाद् या स्तवं नारी अनुज्ञां प्राप्य भर्तृतः ॥ १३<br>मातृपक्षे पितुः पक्षे पूज्या भवति देववत्।<br>शृणुयाद् यः स्तवं दिव्यं कीर्तयेद् वा समाहितः ॥ १४<br>तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं गच्छन्ति नित्यशः।<br>मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचाऽनुकीर्तितम् ॥ १५<br>सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवनस्यानुकीर्तनात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृतमेनो विनश्यति।<br>वरं वरय भद्रं ते यत्त्वया मनसेप्सितम् ॥ १६ | इस स्तवका श्रवण करनेवाली नारी मातृपक्ष एवं पितृपक्षमें देवताके समान पूजनीया हो जाती है। जो मनुष्य समाहित होकर इस दिव्य स्तवको सुनेगा या कीर्तन करेगा, उसके सभी कार्य नित्य सिद्ध होंगे। इस स्तवका कीर्तन करनेवाले मनुष्यके मनमें चिन्तित तथा वचनके द्वारा कथित सभी कार्य सम्पन्न होते जायँगे और मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक—सारे पाप विनष्ट हो जायँगे। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो उस वरको माँग लो; तुम्हारा कल्याण हो॥ १०–१६॥ |
| वेन उवाच<br>अस्य लिङ्गस्य माहात्म्यात् तथा लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>मुक्तोऽहं पातकैः सर्वैस्तव दर्शनतः किल ॥ १७<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>देवस्वभक्षणाज्जातं श्वयोनौ तव सेवकम् ॥ १८<br>एतस्यापि प्रसादं त्वं कर्तुमर्हसि शंकर।<br>एतस्यापि भयान्येद्ये सरसोऽहं निमज्जितः ॥ १९<br>देवैर्निवारितः पूर्वं तीर्थेऽस्मिन् स्नानकारणात्।<br>अयं कृतोपकारश्च एतदर्थे वृणोम्यहम् ॥ २०<br>तस्यैतद् वचनं श्रुत्वा तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>एषोऽपि पापनिर्मुक्तो भविष्यति न संशयः ॥ २१<br>प्रसादान्मे महाबाहो शिवलोकं गमिष्यति।<br>तथा स्तवमिमं श्रुत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २२<br>कुरुक्षेत्रस्य माहात्म्यं सरसोऽस्य महीपते।<br>मम लिङ्गस्य चोत्पत्तिं श्रुत्वा पापैः प्रमुच्यते ॥ २३ | वेनने कहा— इस लिङ्गके माहात्म्यसे, इसके तथा आपके दर्शनसे मैं समस्त पापोंसे निश्चित रूपसे छूट गया हूँ। देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे शङ्कर! अपने उस सेवकपर कृपा करें जो देवद्रव्यका भक्षण करनेके कारण कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ है। पहले इस तीर्थमें स्नान करनेके लिये देवोंके मना करनेपर भी इस (कुत्ते)-के भयसे मैंने सरोवरमें स्नान किया। इसने मेरा उपकार किया है। अतएव मैं इसके लिये वर माँगता हूँ। उस (वेन)-के इस वचनको सुनकर शंकर सन्तुष्ट होकर बोले—महाबाहो! यह भी मेरी कृपासे निःसन्देह सभी पापोंसे बिलकुल छूट जायगा और शिवलोकको प्राप्त करेगा। इस स्तवको सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। राजन्! इस कुरुक्षेत्र तथा इस सरोवरका माहात्म्य और मेरे लिङ्गकी उत्पत्तिका वर्णन सुननेसे मनुष्य पापसे बिलकुल छूट जाता है॥ १७–२३॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् सर्वलोकनमस्कृतः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २४<br>स च श्वा तत्क्षणादेव स्मृत्वा जन्म पुरातनम्।<br>दिव्यमूर्त्तिधरो भूत्वा तं राजानमुपस्थितः ॥ २५<br>कृत्वा स्नानं ततो वैन्यः पितृदर्शनलालसः।<br>स्थाणुतीर्थे कुटीं शून्यां दृष्ट्वा शोकसमन्वितः ॥ २६<br>दृष्ट्वा वेनोऽब्रवीद् वाक्यं हर्षेण महताऽन्वितः।<br>सत्पुत्रेण त्वया वत्स त्रातोऽहं नरकार्णवात् ॥ २७ | सनत्कुमारने कहा— इस प्रकार कहकर समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत भगवान् सभी लोगोंके देखते हुए वहीं अन्तर्हित हो गये। वह कुत्ता भी उसी समय पूर्वजन्मका स्मरण करके दिव्य शरीर धारणकर उस राजाके सामने उपस्थित हुआ। उसके बाद वेनका पुत्र पृथु स्नान करके पितृदर्शनकी अभिलाषासे स्थाणु-तीर्थमें आनेपर कुटीको सूनी देख चिन्तित हो गया। वेन उसे देखकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक बोला—वत्स! तुमने नरक-सागरमें जानेसे मेरी रक्षा कर ली, अतः तुम सत्पुत्र सिद्ध हुए॥ २४–२७॥ |