वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०९
| प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च।<br>उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च॥ १२३ | आप ही प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष, छींक एवं जँभाई हैं॥ १२०-१२३॥ |
| लोहितान्तर्गतो दृष्टिमहावक्त्रो महोदरः।<br>शुचिरोमा हरिशमश्रूरूर्ध्वकेशश्चलाचलः॥ १२४<br><br>गीतवादित्रनृत्यज्ञो गीतवादित्रप्रियः।<br>मत्स्यो जालो जलौकाश्र्च कालः केलिकला कलिः॥ १२५<br><br>अकालश्च विकालश्च दुष्कालः काल एव च।<br>मृत्युश्च मृत्युकर्ता च यक्षो यक्षभयंकरः॥ १२६<br><br>संवर्त्तकोऽन्तकश्चैव संवर्त्तकबलाहकः।<br>घण्टा घण्टी महाघण्टी चिरी माली च मातलिः॥ १२७ | आप लोहितके अन्तःस्थित, दृष्टि, बड़े मुँहवाले, भारी पेटवाले, पवित्र रोमावलीवाले, हरिश्चश्मश्रु, ऊर्ध्वकेश एवं चल तथा अचल हैं। आप गाने, बजाने, नृत्यकलाके विद्वान् हैं तथा गाना-बजाना करनेवालोंके भी आप प्रिय हैं। आप मत्स्य, जाल, जलौका, काल तथा केलिकला एवं कलह हैं। आप अकाल, विकाल, दुष्काल और कालस्वरूप हैं। आप मृत्यु, मृत्युकर्ता, यक्ष तथा यक्षको भी भय देनेवाले हैं। आप संवर्तक, अन्तक एवं संवर्तक नामक बादल हैं। आप घण्टा, घण्टी, महाघण्टी, चिरी, माली और मातलि भी हैं॥ १२४-१२७॥ |
| ब्रह्मकालयमाग्नीनां दण्डी मुण्डी त्रिमुण्डधृक्।<br>चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्त्तकः ॥ १२८<br><br>चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरस्तथा।<br>नित्यमक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः॥ १२९<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिको गिरिकप्रियः।<br>शिल्पं च शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्त्तकः॥ १३०<br><br>भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः॥ १३१ | आप ब्रह्मा, काल, यम और अग्निको दण्ड देनेवाले, मुण्डी एवं त्रिमुण्डधारी हैं। आप चतुर्युग, चतुर्वेद एवं चातुर्होत्रके प्रवर्तक हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। आप नित्यद्यूतप्रिय, (धर्म्य) धूर्त्तईके भी प्रयोक्ता, गणाध्यक्ष और गणोंके स्वामी हैं। आप लाल माला और लाल वस्त्र धारण करनेवाले हैं तथा गिरिक, गिरिकप्रिय, शिल्प, शिल्पिश्रेष्ठ तथा हर प्रकारके शिल्पोंके प्रवर्तक हैं। आप भगनेत्राङ्कुश, चण्ड एवं पूषाके दाँतोंके विनाशक हैं। आप स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १२८-१३१॥ |
| गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकास्तारकामयः।<br>धाता विधाता संधाता पृथिव्या धरणोऽपरः॥ १३२<br><br>ब्रह्मा तपश्च सत्यं च व्रतचर्यमथार्जवम्।<br>भूतात्मा भूतकृद् भूतिर्भूतभव्यभवोद्भवः॥ १३३<br><br>भूर्भुवः स्वर्ऋतं चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः।<br>दीक्षितोऽदीक्षितः कान्तो दुर्दान्तो दान्तसम्भवः॥ १३४<br><br>चन्द्रावर्त्तो युगावर्त्तः संवर्त्तकप्रवर्त्तकः।<br>बिन्दुः कामो ह्यणुः स्थूलः कर्णिकारस्त्रजप्रियः॥ १३५ | आप गूढ़व्रतवाले, गुप्ततपस्यावाले, तारक और तारकामय हैं। आप धाता, विधाता, संधाता और पृथ्वीके श्रेष्ठ धारण और पोषण करनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, व्रत-चर्या और सरल एवं शुद्ध हैं। आप (पञ्च) भूतस्वरूप ऐश्वर्य और प्राणियोंके उत्पत्ति-स्थान हैं। आप भूः, भुवः, स्वः, ऋतः, ध्रुव, कोमल तथा महेश्वर हैं। आप दीक्षित, अदीक्षित, कान्त, दुर्दान्त (उग्र) और दान्तसे उत्पन्न हैं। आप चन्द्रावर्त, युगावर्त, संवर्तक और प्रवर्तक हैं। आप बिन्दु, काम, अणु, स्थूल तथा कनेरकी मालाके प्रेमी हैं॥ १३२-१३५॥ |
| नन्दीमुखो भीममुखः सुमुखो दुर्मुखस्तथा।<br>हिरण्यगर्भः शकुनिर्महोरगपतिर्विराट्॥ १३६ | आप नन्दीमुख, भीममुख, सुमुख तथा दुर्मुख हैं। आप हिरण्यगर्भ, शकुनि, महासर्पपति तथा विराट् हैं। |