भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| २०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्रष्टा चराचरस्यास्य पाता हर्ता तथैव च।<br>त्वामाहुर्ब्रह्म विद्वांसो ब्रह्म ब्रह्मविदां गतिम्॥ १०७<br><br>मनसः परमज्योतिस्त्वं वायुर्ज्योतिषामपि।<br>हंसवृक्षे मधुकरमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः॥ १०८<br><br>यजुर्मयो ऋङ्मयस्त्वामाहुः साममयस्तथा।<br>पठ्यसे स्तुतिभिर्नित्यं वेदोपनिषदां गणैः॥ १०९<br><br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये।<br>त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युतोऽशनिगर्जितम्॥ ११०आप इस चराचरकी सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले एवं संहार करनेवाले हैं। विद्वज्जन आपको ब्रह्म एवं ज्ञानियोंकी (कैवल्य) गति कहते हैं। आप मनकी परमज्योति हैं और ज्योतियोंके (धारण करनेवाले) वायु हैं। ब्रह्मवादीजन आपको हंसवृक्षपर रहनेवाला भ्रमर कहते हैं। वे आपको यजुर्मय, ऋङ्मय एवं साममय कहते हैं। वेद और उपनिषदोंके समूह स्तुतियोंद्वारा आपका ही नित्य पाठ करते हैं। आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अवर वर्ण, मेघसमूह, विद्युत् तथा मेघगर्जन भी हैं॥ १०७—११०॥
संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च।<br>युगा निमेषाः काष्ठाश्च नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः॥ १११<br><br>वृक्षाणां ककुभोऽसि त्वं गिरीणां हिमवान्गिरिः।<br>व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योनन्तश्च भोगिनाम्॥ ११२<br><br>क्षीरोदोऽस्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च॥ ११३<br><br>त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे।<br>व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ॥ ११४आप युग, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, निमेष, काष्ठा तथा कला हैं। आप वृक्षोंमें अर्जुन वृक्ष, पर्वतोंमें हिमालय, पशुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ और साँपोंमें शेषनाग हैं। आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रोंमें धनुष, आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य हैं। आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं॥ १११—११४॥
त्वं शरी त्वं गदी चापि खट्वाङ्गी च शरासनी।<br>छेत्ता भेत्ता प्रहर्ताऽसि मन्ता नेता सनातनः॥ ११५<br><br>दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>समुद्राः सरितो गङ्गा पर्वताश्च सरांसि च॥ ११६<br><br>लतावल्ल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः।<br>द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः॥ ११७<br><br>आदिश्चान्तश्च वेदानां गायत्री प्रणवस्तथा।<br>लोहितो हरितो नीलः कृष्णः पीतः सितस्तथा॥ ११८<br><br>कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा।<br>सवर्णश्चाप्यवर्णश्च कर्त्ता हर्त्ता त्वमेव हि॥ ११९आप बाण धारण करनेवाले, गदा धारण करनेवाले, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले एवं धनुर्धारी हैं। आप विदारण करनेवाले, प्रहार करनेवाले, अवबोधन (सतर्क) करनेवाले, प्राप्त करानेवाले और सनातन हैं। आप दस लक्षणोंसे संयुक्त धर्म, अर्थ एवं काम तथा समस्त समुद्र, नदियाँ, गङ्गा, पर्वत एवं सरोवर हैं। समस्त लताएँ, वल्लियाँ, तृण, ओषधियाँ; पशु, मृग, पक्षी; पृथ्वी, अप् आदि नवों द्रव्यों; उत्क्षेपण-आक्षेपण आदि पाँच कर्मों; रूप, रस, गन्ध आदि चौबीस गुणोंके आरम्भक भी आप ही हैं। आप ही समयपर फूल एवं फल देनेवाले हैं। आप वेदोंके आदि और अन्त हैं, गायत्री तथा प्रणव भी आप ही हैं। आप ही लोहित, हरित, नील, कृष्ण, पीत, सित, कद्रु, कपिल, कपोत, मेचक, सवर्ण, अवर्ण, कर्ता एवं हर्ता हैं॥ ११५—११९॥
त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः।<br>उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च॥ १२०<br><br>शिक्षाछौत्रं त्रिसौपर्णं यजुषां शतरुद्रियम्।<br>पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्॥ १२१<br><br>तिन्दुको गिरिजो वृक्षो मुद्गं चाखिलजीवनम्।<br>प्राणाः सत्त्वं रजश्चैव तमश्च प्रतिपत्पतिः॥ १२२आप इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, पवन, उपप्लव, चित्रभानु, स्वर्भानु एवं भानु हैं। आप शिक्षा, होत्र, त्रिसौपर्ण, यजुर्वेदका शतरुद्रिय, पवित्रोंमें पवित्र एवं मङ्गलोंमें मङ्गल हैं। आप तिन्दुक, शिलाजतु, वृक्ष, मुद्ग, सबके जीवन, प्राण, सत्त्व, रज, तम तथा प्रतिपत्पति हैं।