भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| २१० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अधर्महा महादेवो दण्डधारो गणोत्कटः।<br>गोनर्दो गोप्रतारश्च गोवृषेश्वरवाहनः॥ १३७<br>त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गो मार्ग एव च।<br>स्थिरः श्रेष्ठश्च स्थाणुश्च विक्रोशः क्रोश एव च॥ १३८<br>दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः।<br>दुर्द्धर्षो दुष्प्रकाशश्च दुर्दर्शो दुर्जयो जयः॥ १३९आप अधर्मका नाश करनेवाले महादेव, दण्डधार, गणोत्कट, गोनर्द, गोप्रतार तथा गोवृषेश्वर-वाहन हैं। आप त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द, गोमार्ग तथा मार्ग हैं। आप स्थिर, श्रेष्ठ, स्थाणु, विक्रोश तथा क्रोश हैं। आप दुर्वारण, दुर्विषह, दुःसह, दुरतिक्रम, दुर्धर्ष, दुष्प्रकाश, दुर्दर्श, दुर्जय तथा जय हैं॥ १३६—१३९॥
शशाङ्कानलशीतोष्णः क्षुत्तृष्णा च निरामयः।<br>आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिनाशनः॥ १४०<br><br>समूहश्च समूहस्य हन्ता देवः सनातनः।<br>शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः॥ १४१<br><br>त्र्यम्बको दण्डधारश्च उग्रदंष्ट्रः कुलान्तकः।<br>विषापहः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पते।<br>अमृताशी जगन्नाथो देवदेव गणेश्वरः॥ १४२<br><br>मधुश्च्युतानां मधुपो ब्रह्मवाक् त्वं घृतच्युत।<br>सर्वलोकस्य भोक्ता त्वं सर्वलोकपितामहः॥ १४३आप चन्द्र, अनल, शीत, उष्ण, क्षुधा, तृष्णा, निरामय, आधिव्याधि, व्याधिहन्ता एवं व्याधियोंको नष्ट करनेवाले हैं। आप समूह हैं और समूहके हन्ता तथा सनातन देव हैं। आप शिखण्डी, पुण्डरीकाक्ष तथा पुण्डरीकवनके आश्रय हैं। मरुत्पति! हे देवदेव! आप तीन नेत्रवाले, दण्डधारी, भयंकर दाँतवाले, कुलके अन्त करनेवाले, विषको नष्ट करनेवाले, सुरश्रेष्ठ, सोमरस पीनेवाले, अमृताशी, जगत्के स्वामी तथा गणेश्वर हैं। आप मधुसंग्रह करनेवालोंमें मधुप, वाणियोंमें ब्रह्मवाक्, घृतच्युत, समस्त लोकोंका पालन-पोषण और उपसंहार करनेवाले एवं सर्वलोकके पितामह हैं॥ १४०—१४३॥
हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेकः<br>त्वं स्त्री पुमांस्त्वं हि नपुंसकं च।<br>बालो युवा स्थविरो देवदंष्ट्रा<br>त्वन्नो गिरिविश्वकृद् विश्वहर्ता॥ १४४<br>त्वं वै धाता विश्वकृतां वरेण्य-<br>स्त्वां पूजयन्ति प्रणताः सदैव।<br>चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते भवान् हि<br>त्वमेव चाग्निः प्रपितामहश्च।<br>आराध्य त्वां सरस्वतीं वाग्लभन्ते<br>अहोरात्रे निमिषोन्मेषकत्र्ता॥ १४५<br>न ब्रह्मा न च गोविन्दः पौराणा ऋषयो न ते।<br>माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन शंकर॥ १४६<br>पुंसां शतसहस्राणि यत्समावृत्य तिष्ठति।<br>महत्तस्तमसः पारे गोप्ता मन्ता भवान् सदा॥ १४७आप हिरण्यरेता तथा अद्वितीय पुरुष हैं। आप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक भी हैं। आप ही बालक, युवक, वृद्ध, देवदंष्ट्रा, गिरि, संसारके रचयिता तथा संसारके संहार करनेवाले भी हैं। आप विश्व रचनेवालोंमें वरणीय धाता हैं। विनयी जन सदैव आपकी पूजा करते हैं। चन्द्रमा एवं सूर्य आपके नेत्रस्वरूप हैं। आप ही अग्नि एवं प्रपितामह हैं। सरस्वतीरूप आपकी आराधना कर लोग (प्राञ्जल) वाणीकी प्राप्ति करते हैं। आप दिन और रात्रि हैं और निमेष एवं उन्मेषके कर्त्ता हैं। हे शंकर! ब्रह्मा, गोविन्द तथा प्राचीन ऋषि भी आपकी महिमाको ठीक-ठीक नहीं जान सकते। आप (अपनेमें) लाखों पुरुषोंको समावृत कर स्थित हैं। आप सदा महान् तमसे परे रहनेवाले परम रक्षक एवं (सबके) अवबोधक हैं॥ १४४—१४७॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः।<br>ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥ १४८निद्रारहित (अतः सदा जागरूक), श्वासपर विजय प्राप्त करनेवाले, सत्त्वगुणमें सदा स्थित एवं संयतेन्द्रिय योगिजन जिस ज्योतिका दर्शन करते हैं, उस योगात्मक (आप)-को नमस्कार है।
या मूर्तयश्च सूक्ष्मास्ते न शक्या या निदर्शितुम्।<br>ताभिर्मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम्॥ १४९सूक्ष्म होनेके कारण आपकी जो मूर्तियाँ प्रदर्शित नहीं की जा सकतीं उनके द्वारा आप सदा मेरी इस प्रकार रक्षा करें जैसे पिता अपने औरस