वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ४७ ] | स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक | २११ |
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| रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते।<br>भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि॥ १५०<br><br>जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे।<br>कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः॥ १५१ | पुत्रकी रक्षा करता है। पुण्यात्मन्! आप मेरी रक्षा करें। मैं आपका रक्षणीय हूँ। आपको नमस्कार है। आप भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् हैं; मैं सदा आपका भक्त हूँ। जटी, दण्डी, लम्बोदरशरीरी तथा कमण्डलुनिषङ्ग रुद्रात्माको नमस्कार है॥ १४८—१५१॥ |
| यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसन्धिषु।<br>कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः॥ १५२<br><br>संभक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते।<br>यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम्॥ १५३<br><br>प्रविश्य वदनं राहोर्र्यः सोमं पिबते निशि।<br>ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानू रक्षितस्तव तेजसा॥ १५४<br><br>ये चात्र पतिता गर्भा रुद्रगन्धस्य रक्षणे।<br>नमस्तेऽस्तु स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्ति तदद्भुते॥ १५५ | जिनके केशोंमें बादल, समस्त अङ्गोंकी सन्धियोंमें नदियाँ एवं कुक्षिमें चारों समुद्र हैं, उन तोयात्मा भगवान्को नमस्कार है। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर भूतोंको अपने उदरमें स्थित रखकर जो जलके मध्यमें शयन करते हैं उन जलशायी (विष्णु)-की मैं शरण लेता हूँ। रात्रिमें आप जो राहुके मुखमें प्रवेश कर सोमको पीते हैं तथा आपके तेजसे रक्षित राहु सूर्यको ग्रस लेता है, ऐसे आपको नमस्कार है। रुद्रगन्धकी रक्षामें जो यहाँ गर्भ (वाष्पराशि) गिरे, आपके ही तेजसे गिरे; अतः आपको नमस्कार है; उन्हीं अद्भुत (तेजों)-में स्वाहा तथा स्वधाको वे प्राप्त करते हैं॥ १५२—१५५॥ |
| येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम्।<br>रक्षन्तु ते हि मां नित्यं ते मामाप्याययन्तु वै॥ १५६<br><br>ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च।<br>वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च॥ १५७<br><br>चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च।<br>हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥ १५८<br><br>ये च पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च।<br>चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥ १५९<br><br>रसातलगता ये च ये च तस्मात् परं गताः।<br>नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यश्च नित्यशः॥ १६० | सभी देहधारियोंकी देहमें स्थित अङ्गुष्ठमात्रमें निवास करनेवाले जो पुरुष हैं, वे नित्य मेरी रक्षा करें तथा वे मुझे सर्वदा संतृप्त करें। जो नदियों, समुद्रों, पर्वतों, गुहाओं, वृक्षकी जड़ों, गायोंके रहनेके स्थानों, घने जंगलों, चौराहों, गलियों, चबूतरों, सभाओं, हथसारों, घुड़सारों और रथशालाओं, जीर्ण बाग-बगीचों, आलयों, पञ्चभूतों, पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशाओं एवं अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण एवं ईशानकोणोंमें स्थित हैं। जो चन्द्र और सूर्यके बीचमें रहनेवाले, चन्द्र तथा सूर्यकी किरणोंमें स्थित, रसातलमें रहनेवाले एवं उससे भी आगे पहुँचे हुए हैं, उनको नित्य बारम्बार नमस्कार है; नमस्कार है; नमस्कार है॥ १५६—१६०॥ |
| येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च।<br>असंख्येयगणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः॥ १६१<br><br>प्रसीद मम भद्रं ते तव भावगतस्य च।<br>त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिमतिस्त्वयि॥ १६२<br><br>स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम द्विजोत्तमः॥ १६३ | जिनकी कोई संख्या नहीं है और न प्रमाण तथा रूप ही है, उन अनगिनत रुद्रगणोंको सदा नमस्कार है। आपका कल्याण हो। आपके भक्तिभावमें स्थित मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। हे देव! आपहीमें मेरा हृदय, मेरी बुद्धि एवं मति है। द्विजोत्तमने इस प्रकार महादेवकी स्तुति करके विराम ले लिया॥ १६१—१६३॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७॥