वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४८ |
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अड़तालीसवाँ अध्याय
वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य, वेन आदिकी सुगतिका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारने कहा— |
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| अथैनमब्रवीद् देवस्त्रैलोक्याधिपतिर्भवः।<br>आश्वासनकरं चास्य वाक्यविद् वाक्यमुत्तमम्॥ १<br><br>अहो तुष्टोऽस्मि ते राजन् स्तवेनानेन सुव्रत।<br>बहुनाऽत्र किमुक्तेन मत्समीपे वसिष्यसि॥ २<br><br>उषित्वा सुचिरं कालं मम गात्रोद्भवः पुनः।<br>असुरो ह्यन्धको नाम भविष्यसि सुरान्तकृत्॥ ३<br><br>हिरण्याक्षगृहे जन्म प्राप्य वृद्धिं गमिष्यसि।<br>पूर्वाधर्मेण घोरेण वेदनिन्दाकृतेन च॥ ४ | इसके बाद किसीकी किसी प्रकारकी भी उक्तिके अभिप्रायको भलीभाँति जाननेवाले तीनों लोकोंके स्वामी शंकरभगवान्ने उस (वेन)-को आश्वासन देनेवाला उत्तम वचन कहा—राजन्! सुव्रत! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं संतुष्ट हूँ। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है; तुम मेरे निकट (में ही सदा) निवास करोगे। बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद तुम फिर देवोंको नष्ट करनेवाले अन्धक नामक असुर होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होओगे और वेदकी निन्दा करनेसे पूर्वकालिक प्रचण्ड पापके कारण पुनः हिरण्याक्षके घरमें उत्पन्न होकर बड़े होगे—सयाने होगे॥ १—४॥ |
| साभिलाषो जगन्मातुर्भविष्यसि यदा तदा।<br>देहं शूलेन हत्वाहं पावयिष्यामि समार्बुदम्॥ ५<br><br>तत्राप्यकल्मषो भूत्वा स्तुत्वा मां भक्तितः पुनः।<br>ख्यातो गणाधिपो भूत्वा नाम्ना भृङ्गिरिटिः स्मृतः॥ ६<br><br>मत्सन्निधाने स्थित्वा त्वं ततः सिद्धिं गमिष्यसि।<br>वेनप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्त्तयेद् यः शृणोति च॥ ७<br><br>नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>यथा सर्वेषु देवेषु विशिष्टो भगवाञ्छिवः॥ ८<br><br>तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां वेननिर्मितः।<br>यशो राज्यसुखैश्वर्यधनमानाय कीर्त्तितः॥ ९ | जब तुम जगत्की माता (पार्वती)-की अभिलाषा करोगे तब मैं शूलद्वारा तुम्हारी देहका हनन करके दस करोड़ वर्षोंतकके लिये (तुम्हें) पवित्र करूँगा। उसके बाद वहाँ पापसे रहित होकर पुनः मेरी स्तुति करोगे और तब तुम भृङ्गिरिटि नामसे प्रसिद्ध गणाधिप बनोगे। फिर मेरी संनिधिमें रहकर तुम सिद्धिको प्राप्त करोगे। जो मनुष्य वेनके द्वारा कही हुई इस स्तुतिका कीर्तन करेगा या इसे सुनेगा, वह कभी अशुभ (अकल्याण)-को नहीं प्राप्त होगा और दीर्घ आयु प्राप्त करेगा। जैसे सभी देवताओंमें भगवान् शिवकी विशिष्टता है, वैसे ही वेनसे निर्मित यह स्तव सभी स्तवोंमें श्रेष्ठ (विशिष्ट) है। इसका कीर्तन यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, धन एवं मानका देनेवाला है॥ ५—९॥ |
| श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः।<br>व्याधितो दुःखितो दीनश्चौरराजभयान्वितः॥ १०<br><br>राजकार्यविमुक्तो वा मुच्यते महतो भयात्।<br>अनेनैव तु देहेन गणानां श्रेष्ठतां व्रजेत्॥ ११<br><br>तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः।<br>न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः॥ १२ | विद्याकी इच्छा रखनेवालेको श्रद्धासहित यत्नपूर्वक इस स्तुतिको सुनना चाहिये। व्याधिसे ग्रस्त, दुःखित, दीन, चोर या राजासे भयभीत अथवा राजकार्यसे अलग किया गया पुरुष (इस स्तुतिके द्वारा) महान् भयसे मुक्त होकर इसी देहसे गणोंमें श्रेष्ठता प्राप्त करता है एवं निर्मल होकर तेज एवं यशसे युक्त होता है। जिस गृहमें इस स्तवका पाठ होता है उसमें राक्षस, पिशाच, भूत या विनायकगण विघ्न नहीं करते। पतिकी आज्ञा प्राप्त कर |