वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४८ ] वेन-कृत शिव-स्तुति एवं स्थाणुतीर्थका माहात्म्य [ २१३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विघ्नं कुर्युर्गृहे तत्र यत्रायं पठ्यते स्तवैः।<br>शृणुयाद् या स्तवं नारी अनुज्ञां प्राप्य भर्तृतः ॥ १३<br>मातृपक्षे पितुः पक्षे पूज्या भवति देववत्।<br>शृणुयाद् यः स्तवं दिव्यं कीर्तयेद् वा समाहितः ॥ १४<br>तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धिं गच्छन्ति नित्यशः।<br>मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचाऽनुकीर्तितम् ॥ १५<br>सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवनस्यानुकीर्तनात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृतमेनो विनश्यति।<br>वरं वरय भद्रं ते यत्त्वया मनसेप्सितम् ॥ १६ | इस स्तवका श्रवण करनेवाली नारी मातृपक्ष एवं पितृपक्षमें देवताके समान पूजनीया हो जाती है। जो मनुष्य समाहित होकर इस दिव्य स्तवको सुनेगा या कीर्तन करेगा, उसके सभी कार्य नित्य सिद्ध होंगे। इस स्तवका कीर्तन करनेवाले मनुष्यके मनमें चिन्तित तथा वचनके द्वारा कथित सभी कार्य सम्पन्न होते जायँगे और मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक—सारे पाप विनष्ट हो जायँगे। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो उस वरको माँग लो; तुम्हारा कल्याण हो॥ १०–१६॥ |
| वेन उवाच<br>अस्य लिङ्गस्य माहात्म्यात् तथा लिङ्गस्य दर्शनात्।<br>मुक्तोऽहं पातकैः सर्वैस्तव दर्शनतः किल ॥ १७<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>देवस्वभक्षणाज्जातं श्वयोनौ तव सेवकम् ॥ १८<br>एतस्यापि प्रसादं त्वं कर्तुमर्हसि शंकर।<br>एतस्यापि भयान्येद्ये सरसोऽहं निमज्जितः ॥ १९<br>देवैर्निवारितः पूर्वं तीर्थेऽस्मिन् स्नानकारणात्।<br>अयं कृतोपकारश्च एतदर्थे वृणोम्यहम् ॥ २०<br>तस्यैतद् वचनं श्रुत्वा तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>एषोऽपि पापनिर्मुक्तो भविष्यति न संशयः ॥ २१<br>प्रसादान्मे महाबाहो शिवलोकं गमिष्यति।<br>तथा स्तवमिमं श्रुत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २२<br>कुरुक्षेत्रस्य माहात्म्यं सरसोऽस्य महीपते।<br>मम लिङ्गस्य चोत्पत्तिं श्रुत्वा पापैः प्रमुच्यते ॥ २३ | वेनने कहा— इस लिङ्गके माहात्म्यसे, इसके तथा आपके दर्शनसे मैं समस्त पापोंसे निश्चित रूपसे छूट गया हूँ। देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो हे शङ्कर! अपने उस सेवकपर कृपा करें जो देवद्रव्यका भक्षण करनेके कारण कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ है। पहले इस तीर्थमें स्नान करनेके लिये देवोंके मना करनेपर भी इस (कुत्ते)-के भयसे मैंने सरोवरमें स्नान किया। इसने मेरा उपकार किया है। अतएव मैं इसके लिये वर माँगता हूँ। उस (वेन)-के इस वचनको सुनकर शंकर सन्तुष्ट होकर बोले—महाबाहो! यह भी मेरी कृपासे निःसन्देह सभी पापोंसे बिलकुल छूट जायगा और शिवलोकको प्राप्त करेगा। इस स्तवको सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। राजन्! इस कुरुक्षेत्र तथा इस सरोवरका माहात्म्य और मेरे लिङ्गकी उत्पत्तिका वर्णन सुननेसे मनुष्य पापसे बिलकुल छूट जाता है॥ १७–२३॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् सर्वलोकनमस्कृतः।<br>पश्यतां सर्वलोकानां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २४<br>स च श्वा तत्क्षणादेव स्मृत्वा जन्म पुरातनम्।<br>दिव्यमूर्त्तिधरो भूत्वा तं राजानमुपस्थितः ॥ २५<br>कृत्वा स्नानं ततो वैन्यः पितृदर्शनलालसः।<br>स्थाणुतीर्थे कुटीं शून्यां दृष्ट्वा शोकसमन्वितः ॥ २६<br>दृष्ट्वा वेनोऽब्रवीद् वाक्यं हर्षेण महताऽन्वितः।<br>सत्पुत्रेण त्वया वत्स त्रातोऽहं नरकार्णवात् ॥ २७ | सनत्कुमारने कहा— इस प्रकार कहकर समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत भगवान् सभी लोगोंके देखते हुए वहीं अन्तर्हित हो गये। वह कुत्ता भी उसी समय पूर्वजन्मका स्मरण करके दिव्य शरीर धारणकर उस राजाके सामने उपस्थित हुआ। उसके बाद वेनका पुत्र पृथु स्नान करके पितृदर्शनकी अभिलाषासे स्थाणु-तीर्थमें आनेपर कुटीको सूनी देख चिन्तित हो गया। वेन उसे देखकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक बोला—वत्स! तुमने नरक-सागरमें जानेसे मेरी रक्षा कर ली, अतः तुम सत्पुत्र सिद्ध हुए॥ २४–२७॥ |