वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४७ ] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहारलोभेन तदा प्रविवेश कुटीरकम्।<br>प्रविशन्तं तदा दृष्ट्वा श्वानं भयसमन्वितः॥ ५९<br>स तं पस्पर्श शनकैः स्थाणुतीर्थे ममज्ज ह।<br>पततः पूर्वतीर्थेषु विप्रुषैः परिषिञ्चतः॥ ६०<br>शुनोऽस्य गात्रसम्भूतैरब्बिन्दुभिः स सिञ्चितः।<br>विरक्तदृष्टिश्च शुनः क्षेपेण च ततः परम्॥ ६१<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यात् स पुत्रेण च तारितः।<br>नियतस्तत्क्षणाज्जातो दिव्यदेहसमन्वितः।<br>प्रणिपत्य तदा स्थाणुं स्तुतिं कर्तुं प्रचक्रमे॥ ६२ | उसके बाद आहारके लोभसे उसने कुटीमें प्रवेश किया। उस कुत्तेको प्रवेश करते देखकर भयभीत होकर उस (वेन)-ने उसका धीरेसे स्पर्श किया। स्पर्श करनेके बाद स्थाणुतीर्थमें उसने स्नान किया। पूर्वतीर्थोंमें स्नान करनेके बाद तीर्थके जलबिन्दुओंसे सिञ्चित करनेवाले पुत्रसे एवं उस कुत्तेके शरीरसे निकले जलबिन्दुओंसे सिञ्चित होने तथा कुत्तेके भयसे स्थाणुतीर्थमें गिर जानेके कारण स्नान हो जानेके माहात्म्यसे उसकी दृष्टि विरक्त हो गयी। पुत्रने स्थाणुतीर्थके माहात्म्यसे अपने पिताका उद्धार कर दिया और संयतेन्द्रिय होकर उसने तत्काल दिव्य देह धारण कर भगवान् स्थाणुको प्रणाम किया और स्तुति करना प्रारम्भ किया॥ ५६—६२॥ |
| वेन उवाच<br>प्रपद्ये देवमीशानं त्वामजं चन्द्रभूषणम्।<br>महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम्॥ ६३<br>नमस्ते देवदेवेश सर्वशत्रुनिषूदन।<br>देवेश बलिविष्टम्भ देवदैत्यैश्च पूजित॥ ६४<br>विरूपाक्ष सहस्राक्ष त्र्यक्ष यक्षेश्वरप्रिय।<br>सर्वतः पाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख॥ ६५<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि।<br>शङ्कुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय॥ ६६ | वेन स्तुति करने लगा— मैं अजन्मा चन्द्रमाके शिरोभूषणवाले, ईशानदेव, महात्मा, सारे संसारका पालन करनेवाले आप महादेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। देवदेवेश! समस्त शत्रुओंके निषूदन! देवेश! बलिको निरुद्ध करनेवाले! देवों एवं दैत्योंसे पूजित! आपको नमस्कार है। हे (विरूप आँखवाले) विरूपाक्ष! हे (हजारों आँखोंवाले) सहस्राक्ष! हे तीन नेत्रोंवाले! हे यक्षेश्वरप्रिय! हे चारों ओरसे (हाथ-पैरवाले) पाणिपादयुक्त! हे चारों ओर आँख एवं मुखवाले! आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र सुन सकनेवाले और सभी स्थानोंपर व्याप्त हैं। संसारमें आपने सभीको आवृत कर (ढक) रखा है। हे शङ्कुकर्ण! हे महाकर्ण! हे कुम्भकर्ण! हे समुद्र-निवासी! आपको नमस्कार है॥ ६३—६६॥ |
| गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते।<br>शतजिह्व शतावर्त शतोदर शतानन॥ ६७<br>गायन्ति त्वां गायत्रिणो ह्यर्चयन्त्यर्क्रमर्चिणः।<br>ब्रह्माणं त्वा शतक्रतो उद्वंशमिव मेनिरे॥ ६८<br>मूर्त्तौ हि ते महामूर्ते समुद्राम्बुधरास्तथा।<br>देवताः सर्व एवात्र गोष्ठे गाव इवासते॥ ६९<br>शरीरे तव पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम्।<br>नारायणं तथा सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्॥ ७० | हे गजेन्द्रकर्ण! हे गोकर्ण! हे पाणिकर्ण! हे शतजिह्व! हे शतावर्त! हे शतोदर! हे शतानन! आपको नमस्कार है। गायत्रीका जप करनेवाले विद्वान् आपकी ही महिमा गाते हैं। सूर्यकी पूजा करनेवाले सूर्यरूपसे आपकी ही पूजा करते हैं। आपको ही सभी लोग इन्द्रसे श्रेष्ठ वंशवाला ब्रह्मा मानते हैं। महामूर्ते! आपकी मूर्तिमें समुद्र, मेघ और समस्त देवता ऐसे स्थित हैं जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं। मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, नारायण, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पतिको देख रहा हूँ॥ ६७—७०॥ |
| भगवान् कारणं कार्यं क्रियाकरणमेव तत्।<br>प्रभवः प्रलयश्चैव सदसच्चापि दैवतम्॥ ७१<br>नमो भवाय शर्वाय वरदायोगरूपिणे।<br>अन्धकासुरहन्त्रे च पशूनां पतये नमः॥ ७२ | आप भगवान्, कारण, कार्य, क्रियाके करण, प्रभव, प्रलय, सत्, असत् एवं दैवत हैं। भव, शर्व, वरद, उग्र-रूप धारण करनेवाले, अन्धकासुरको मारनेवाले और पशुओंके पति पशुपतिको नमस्कार है। |