वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
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| प्रायश्चित्तं करिष्येऽहं यद् वदिष्यन्ति देवताः।<br>ततस्ता देवताः सर्वा इदं वचनमब्रुवन्॥ ४५<br><br>स्नात्वा स्नात्वा च तीर्थेषु अभिषिञ्चस्व वारिणा।<br>ओजसा चुलुकं यावत् प्रतिकूले सरस्वतीम्॥ ४६<br><br>स्नात्वा मुक्तिमवाप्नोति पुरुषः श्रद्धयान्वितः।<br>एष स्वपोषणपरो देवदूषणतत्परः॥ ४७<br><br>ब्राह्मणैश्च परित्यक्तो नैष शुद्ध्यति कर्हिचित्।<br>तस्मादेनं समुद्दिश्य स्नात्वा तीर्थेषु भक्तितः॥ ४८<br><br>अभिषिञ्चस्व तोयेन ततः पूतो भविष्यति।<br>इत्येतद्वचनं श्रुत्वा कृत्वा तस्याश्रमं ततः॥ ४९<br><br>तीर्थयात्रां ययौ राजा उद्दिश्य जनकं स्वकम्।<br>स तेषु प्लावनं कुर्वंस्तीर्थेषु च दिने दिने॥ ५०<br><br>अभ्यषिञ्चत् स्वपितरं तीर्थतोयेन नित्यशः।<br>एतस्मिन्नेव काले तु सारमेयो जगाम ह॥ ५१<br><br>स्थाणोर्मठे कौलपतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता।<br>परिग्रहस्य द्रव्यस्य परिपालयिता सदा॥ ५२<br><br>प्रियश्च सर्वलोकेषु देवकार्यपरायणः।<br>तस्यैवं वर्त्तमानस्य धर्ममार्गे स्थितस्य च॥ ५३<br><br>कालेन चलिता बुद्धिर्देवद्रव्यस्य नाशने।<br>तेनाधर्मेण युक्तस्य परलोकगतस्य च॥ ५४<br><br>दृष्ट्वा यमोऽब्रवीद् वाक्यं श्वयोनिं व्रज मा चिरम्।<br>तद्वाक्यानन्तरं जातः श्वा वै सौगन्धिके वने॥ ५५<br><br>ततः कालेन महता श्वयूथपरिवारितः।<br>परिभूतः सरमया दुःखेन महता वृतः॥ ५६<br><br>त्यक्त्वा द्वैतवनं पुण्यं सन्निहत्यं ययौ सरः।<br>तस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु स्थाणोरेव प्रसादतः॥ ५७<br><br>अतीव तृषया युक्तः सरस्वत्यां ममज्ज ह।<br>तत्र संप्लुतदेहस्तु विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः॥ ५८ | (परन्तु) देवगण! आपलोग इसके लिये जो प्रायश्चित्त कहेंगे, उसे मैं करूँगा। उसके ऐसा कहनेपर उन सभी देवताओंने यह बात कही—तीर्थमें बार-बार (स्नान करके) तीर्थ-जलद्वारा इसे बार-बार सींचो। सरस्वतीके तटपर 'ओजसतीर्थ'से 'चुलुक'पर्यन्त हर-एक तीर्थमें स्नान करनेवाला श्रद्धालु पुरुष मुक्तिको प्राप्त करता है। यह अपना ही पालन-पोषण करनेमें लगा रहता था एवं देवताओंकी निन्दा करनेमें तत्पर रहता था। ब्राह्मणोंने इसको पाप करनेके कारण त्याग दिया था। यह कभी भी शुद्ध नहीं हो सकता। इसलिये (इसकी यदि शुद्धि चाहते हो तो) इसके उद्देश्यसे तीर्थोंमें जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करके तीर्थ-जलसे इसे अभिषिक्त करो। इससे यह पवित्र हो जायगा। उसके बाद राजा देवताओंके इन वचनोंके सुननेके बाद वहाँ अपने पिताके लिये एक आश्रमका निर्माण कराकर उसके उद्देश्यसे तीर्थयात्रा करने चला गया। वह प्रतिदिन उन तीर्थोंमें स्नान करते हुए तीर्थजलसे अपने पिताको अभिषिक्त करने लगा। इसी समय वहाँ एक कुत्ता आ गया। (कुत्तेका इतिहास इस प्रकार है—) पूर्वकालमें वह कुत्ता स्थाणुतीर्थमें स्थित मठमें देव-द्रव्योंकी रक्षा करनेवाला—दानमें प्राप्त द्रव्यका सदा पालन करनेवाला—सर्वजनप्रिय एवं देवकृत्यमें रत कौलपति नामका महन्त था। इस प्रकार वह अपना जीवनयापन कर रहा था। एक बार धर्ममार्गमें स्थित रहते हुए भी उस कौलपतिकी बुद्धि कुछ समयके बाद धर्ममार्गसे हट गयी। वह देवद्रव्यका नाश (दुरुपयोग) करने लगा। वह अधर्मी (बना) कौलपति जब मरकर परलोकमें गया, तब यमराजने उसे (उसके कर्मविपाकको) देखकर कहा—तुम कुत्तेकी योनिमें जाओ, देर मत करो। उनके कहनेके पश्चात् वह महन्त सौगन्धिक वनमें कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ॥ ४५—५५॥<br><br>उसके बाद बहुत समय व्यतीत होनेतक वह कुत्ता कुत्तोंके झुंडसे घिरा रहता था; फिर भी कुतियासे अपमानित होनेके कारण अत्यन्त दुःखित रहता था। इसलिये वह द्वैतवनको छोड़कर पवित्र सन्निहत्य-सरोवरमें चला गया। उसमें प्रवेश करते ही स्थाणु भगवान्की ही कृपासे अत्यन्त प्यासा होकर उसने सरस्वती नदीमें डुबकी लगायी। उसमें स्नान करनेसे ही वह समस्त पापोंसे विमुक्त हो गया। |