वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| २०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलासक्तपाणये ।<br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्न नमोऽस्तु ते ॥ ७३<br>नमो मुण्डाय चण्डाय अण्डायोत्पत्तिहेतवे ।<br>डिण्डिमासक्तहस्ताय डिण्डिमुण्डाय ते नमः ॥ ७४ | हे त्रिपुरनाशक! तीन जटावाले, तीन सिरवाले, हाथमें त्रिशूल लिये रहनेवाले त्र्यम्बक एवं त्रिनेत्र (कहलानेवाले) आपको नमस्कार है। हे मुण्ड, चण्ड और अण्डकी उत्पत्तिके हेतु, डिण्डिमपाणि एवं डिण्डिमुण्ड! आपको नमस्कार है॥ ७३-७४॥ |
| नमोर्ध्वकेशदंष्ट्राय शुष्काय विकृताय च ।<br>धूम्रलोहितकृष्णाय नीलग्रीवाय ते नमः ॥ ७५<br>नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।<br>सूर्यमालाय सूर्याय स्वरूपध्वजमालिने ॥ ७६<br>नमो मानातिमानाय नमः पटुतराय ते ।<br>नमो गणेन्द्रनाथाय वृषकन्धाय धन्विने ॥ ७७<br>संक्रन्दनाय चण्डाय पर्णधारपुटाय च ।<br>नमो हिरण्यवर्णाय नमः कनकवर्चसे ॥ ७८ | हे ऊर्ध्वकेश, ऊर्ध्वदंष्ट्र, शुष्क, विकृत, धूम्र, लोहित, कृष्ण एवं नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। अप्रतिरूप, विरूप, शिव, सूर्यमाल, सूर्य एवं स्वरूपध्वजमालीको नमस्कार है। मानातिमानको नमस्कार है। आप पटुतरको नमस्कार है। गणेन्द्रनाथ, वृषकन्ध एवं धन्वीको नमस्कार है। संक्रन्दन, चण्ड, पर्णधारपुट एवं हिरण्यवर्णको नमस्कार है। कनकवर्चसको नमस्कार है॥ ७५-७८॥ |
| नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तुतिस्थाय नमोऽस्तु ते ।<br>सर्व्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतशरीरिणे ॥ ७९<br>नमो होत्रे च हन्त्रे च सितोद्रग्रपताकिने ।<br>नमो नम्याय नम्राय नमः कटकटाय च ॥ ८०<br>नमोऽस्तु कृशनाशाय शयितायोत्थिताय च ।<br>स्थिताय धावमानाय मुण्डाय कुटिलाय च ॥ ८१<br>नमो नर्त्तनशीलाय लयवादित्रशालिने ।<br>नाट्योपहारलुब्धाय मुखवादित्रशालिने ॥ ८२ | स्तुत किये गये तथा स्तुतिके योग्य (आप)-को नमस्कार है। स्तुतिमें स्थित, सर्व, सर्वभक्ष एवं सर्वभूतशरीरी आपको नमस्कार है। होता, हन्ता तथा सफेद और ऊँची पताकावालेको नमस्कार है। नमन करनेयोग्य एवं नम्रको नमस्कार है। आप कटकटको नमस्कार है। कृशनाश, शयित, उत्थित, स्थित, धावमान, मुण्ड एवं कुटिलको नमस्कार है। नर्तनशील, लय वाद्यशाली, नाट्यके उपहारके लोभी एवं मुखोंमें बम-बम-जैसे मुँहसे बोले जानेवाले वाद्य-प्रेमीको नमस्कार है॥ ७९-८२॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलातिबलघातिने ।<br>कालनाशाय कालाय संसारक्षयरूपिणे ॥ ८३<br>हिमवद्दुहितुः कान्त भैरवाय नमोऽस्तु ते ।<br>उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ८४<br>चितिभस्मप्रियायैव कपालाक्तपाणये ।<br>विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ८५<br>नमो विकृतवक्त्राय नमः पूतोग्रदृष्टये ।<br>पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बिवीणायप्रियाय च ॥ ८६ | ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, बलवान्से भी बलवान्को नष्ट करनेवाले, कालनाश, कालस्वरूप एवं संसारक्षयस्वरूप आपको नमस्कार है। हे हिमालयकी पुत्रीके पति-पार्वतीपति! आप भैरवको नमस्कार है और उग्ररूप आपको नित्य नमस्कार है। दस बाहुओंवाले (शिव)-को नमस्कार है। चिताके भस्मको प्रिय माननेवाले, कपालपाणि, अत्यधिक भयंकर भयरूप (भीष्म) एवं व्रतधर (आप)-को (नमस्कार) है। विकृत मुँहवाले (आप)-को नमस्कार है। पवित्र तेजस्विनी दृष्टिवाले, कच्चे-पक्के फलके गूदेको प्रिय माननेवाले, तुम्बी एवं वीणाको प्रिय माननेवालेको नमस्कार है॥ ८३-८६॥ |
| नमो वृषाङ्कवृक्षाय गोवृषाभिरुते नमः ।<br>कटङ्कटाय भीमाय नमः परपराय च ॥ ८७<br>नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदायिने ।<br>नमो विरक्तरक्ताय भावनायाक्षमालिने ॥ ८८<br>विभेदभेदभिन्नाय छायायै तपनाय च ।<br>अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ॥ ८९ | वृषाङ्कवृक्षको नमस्कार है। गोवृषाभिरुतको नमस्कार है। कटङ्कट, भीम एवं परसे भी परको नमस्कार है। सर्ववरिष्ठ, वर एवं वरदायीको नमस्कार है। विरक्त एवं रक्तरूप, भावन एवं अक्षमालीको नमस्कार है। विभेद एवं भेदसे भिन्न, छाया, तपन, अघोर तथा घोररूप एवं घोरघोरतर रूपको नमस्कार है। |