भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ४६] स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य १९७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तमभ्यर्च्य प्रयत्नेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>तस्य दक्षिणदिग्भागे तीर्थं रुद्रकरं स्मृतम्॥ १४नामके गण स्थित हैं। विधिपूर्वक उनकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे छूट जाता है। उनकी दक्षिण दिशामें 'रुद्रकरतीर्थ' है॥ ११—१४॥
तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः।<br>तस्य चोत्तरदिग्भागे रावणेन महात्मना॥ १५<br><br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं गोकर्णं नाम नामतः।<br>आषाढमासे या कृष्णा भविष्यति चतुर्दशी।<br>तस्यां योऽर्चति गोकर्णं तस्य पुण्यफलं शृणु॥ १६<br><br>कामतोऽकामतो वापि यत् पापं तेन संचितम्।<br>तस्माद् विमुच्यते पापात् पूजयित्वा हरं शुचिः॥ १७<br><br>कौमारब्रह्मचर्येण यत्पुण्यं प्राप्यते नरैः।<br>तत्पुण्यं सकलं तस्य अष्टम्यां योऽर्चयेच्छिवम्॥ १८जिसने उस (रुद्रकरतीर्थ)-में स्नान कर लिया मानो उसने सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसकी उत्तर दिशाकी ओर महात्मा रावणने गोकर्ण नामका प्रसिद्ध महालिङ्ग स्थापित किया है। आषाढ़मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें जो गोकर्णकी अर्चना करता है उसके पुण्यफलको सुनो। यदि किसीने अपनी इच्छा या अनिच्छासे भी पापसंचय कर लिया है तो वह भगवान् शंकरकी पूजा करके पवित्र हो जाता है और वह संचित पापसे छूट जाता है। जो अष्टमी तिथिमें शिवका पूजन करता है उसे कौमार-अवस्था (जन्मसे १६ वर्षकी अवस्था)-में ब्रह्मचर्य-पालनसे जो फल प्राप्त होता है वह सम्पूर्ण पुण्य-फल उसे प्राप्त होता है॥ १५—१८॥
यदीच्छेत् परमं रूपं सौभाग्यं धनसंपदः।<br>कुमारेश्वरमाहात्म्यात् सिद्ध्यते नात्र संशयः॥ १९<br><br>तस्य चोत्तरदिग्भागे लिङ्गं पूज्य विभीषणः।<br>अजरामरश्चैव कल्पयित्वा बभूव ह॥ २०<br><br>आषाढस्य तु मासस्य शुक्ला या चाष्टमी भवेत्।<br>तस्यां पूज्य सोपवासो ह्यमृतत्वमवाप्नुयात्॥ २१<br><br>खरेण पूजितं लिङ्गं तस्मिन् स्थाने द्विजोत्तम।<br>तं पूजयित्वा यत्नेन सर्वकामानवाप्नुयात्॥ २२यदि मनुष्य उत्तम सौन्दर्य, सौभाग्य या धन-सम्पत्ति चाहता है तो (उसे कुमारेश्वरकी आराधना करनी चाहिये; क्योंकि) कुमारेश्वरके माहात्म्यसे उसे निस्सन्देह उन सबकी सिद्धि प्राप्त होती है। उन (कुमारेश्वर)-के उत्तर भागमें विभीषणने शिव-लिङ्गको स्थापित कर उसकी पूजा की, जिससे वे अजर और अमर हो गये। आषाढ़ महीनेके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास रहकर उसकी पूजा करनेवाला मनुष्य देवत्व प्राप्त कर लेता है। द्विजोत्तम! खरने वहाँपर लिङ्गकी पूजा की थी। उस लिङ्गकी विधिपूर्वक पूजा करनेवालेकी सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ १९—२२॥
दूषणस्त्रिशिराश्चैव तत्र पूज्य महेश्वरम्।<br>यथाभिलषितान् कामानापतुस्तौ मुदान्वितौ॥ २३<br><br>चैत्रमासे सिते पक्षे यो नरस्तत्र पूजयेत्।<br>तस्य तौ वरदौ देवौ प्रयच्छेतेऽभिवाञ्छितम्॥ २४<br><br>स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण हस्तिपादेश्वरः शिवः।<br>तं दृष्ट्वा मुच्यते पापैरन्यजन्मनि संभवैः॥ २५<br><br>तस्य दक्षिणतो लिङ्गं हारीतस्य ऋषेः स्थितम्।<br>यत् प्रणम्य प्रयत्नेन सिद्धिं प्राप्नोति मानवः॥ २६दूषण एवं त्रिशिराने भी वहाँ महेश्वरकी पूजा की और वे प्रसन्न हो गये। उन दोनोंने अभिवाञ्छित मनोरथ प्राप्त कर लिये। चैत्र महीनेके शुक्लपक्षमें जो मनुष्य वहाँ पूजन करता है, उसकी समस्त इच्छाएँ वे दोनों देव पूरी कर देते हैं। 'हस्तिपादेश्वर' शिव स्थाणुवटकी पूर्व दिशामें हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अन्य जन्मोंमें बने पापोंसे छूट जाता है। उसके दक्षिणमें हारीत नामके ऋषिद्वारा स्थापित किया हुआ लिङ्ग है, जिसको विधिपूर्वक प्रणाम करनेसे (ही) मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ २३—२६॥