वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४६ |
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छियालीसवाँ अध्याय
स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य
| सनत्कुमार उवाच<br>स्थाणोर्वटस्योत्तरतः शुक्रतीर्थं प्रकीर्तितम्।<br>स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण सोमतीर्थं द्विजोत्तम॥ १<br>स्थाणोर्वटं दक्षिणतो दक्षतीर्थमुदाहृतम्।<br>स्थाणोर्वटात् पश्चिमत्ः स्कन्दतीर्थं प्रतिष्ठितम्॥ २<br>एतानि पुण्यतीर्थानि मध्ये स्थाणुरिति स्मृतः।<br>तस्य दर्शनमात्रेण प्राप्नोति परमं पदम्॥ ३<br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यस्त्वेतानि परिक्रमेत्।<br>पदे पदे यज्ञफलं स प्राप्नोति न संशयः॥ ४<br>एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तदा।<br>मरुद्भिर्वह्निभिश्चैव सेवितानि प्रयत्नतः॥ ५<br><br>अन्ये ये प्राणिनः केचित् प्रविष्टाः स्थाणुमुत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ६<br><br>अस्ति तत्संनिधौ लिङ्गं देवदेवस्य शूलिनः।<br>उमा च लिङ्गरूपेण हरपार्श्वं न मुञ्चति॥ ७<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण सिद्धिं प्राप्नोति मानवः।<br>वटस्य उत्तरे पार्श्वे तक्षकेण महात्मना॥ ८<br><br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वकामप्रदायकम्।<br>वटस्य पूर्वदिग्भागे विश्वकर्मकृतं महत्॥ ९<br><br>लिङ्गं प्रत्यङ्मुखं दृष्ट्वा सिद्धिमाप्नोति मानवः।<br>तत्रैव लिङ्गरूपेण स्थिता देवी सरस्वती॥ १०<br>प्रणम्य तां प्रयत्नेन बुद्धिं मेधां च विन्दति।<br>वटपार्श्वे स्थितं लिङ्गं ब्रह्मणा तत् प्रतिष्ठितम्॥ ११<br><br>दृष्ट्वा वटेश्वरं देवं प्रयाति परमं पदम्।<br>ततः स्थाणुवटं दृष्ट्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्॥ १२<br><br>प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।<br>स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे नकुलीशो गणः स्मृतः॥ १३ | **सनत्कुमारने कहा—**द्विजोत्तम! स्थाणुवटकी उत्तर दिशामें ‘शुक्रतीर्थ’ और स्थाणुवटकी पूर्व दिशामें ‘सोमतीर्थ’ कहा गया है। स्थाणुवटके दक्षिण ‘दक्षतीर्थ’ एवं स्थाणुवटके पश्चिममें ‘स्कन्दतीर्थ’ स्थित है। इन परम पावन तीर्थोंके बीचमें ‘स्थाणु’ नामका तीर्थ है। उसका दर्शन करनेमात्रसे परमपद (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको इनकी प्रदक्षिणा करता है, वह एक-एक पगपर यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १-४॥<br><br>मुनियों, साध्यों, आदित्यों, वसुओं, मरुतों एवं अग्नियोंने इन तीर्थोंका यत्नपूर्वक सेवन किया है। जो भी अन्य कोई प्राणी उस उत्तम स्थाणुतीर्थमें प्रवेश करते हैं वे भी सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। उसीके निकट त्रिशूल धारण करनेवाले देवदेव भगवान् शंकरका लिङ्ग है। उमादेवी वहाँपर लिङ्गरूपमें रहनेवाले शंकरजीके पासमें ही रहती हैं; वे उनकी बगलसे अलग नहीं होतीं। उस लिङ्गके दर्शन करनेमात्रसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त करता है। वटके उत्तरी भागमें महात्मा तक्षकने सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाले महालिङ्गको प्रतिष्ठित किया है। वटकी पूर्व दिशाकी ओर विश्वकर्माके द्वारा निर्मित किया गया महान् लिङ्ग है। पश्चिमकी ओर रहनेवाले लिङ्गका दर्शन कर मानवको सिद्धि प्राप्त होती है। वहींपर देवी सरस्वती लिङ्गरूपसे स्थित हैं॥ ५-१०॥<br><br>मनुष्य उन्हें प्रयत्न (श्रद्धा-विधि)-पूर्वक प्रणाम कर बुद्धि एवं तीव्र मेधा प्राप्त करता है। वटकी बगलमें ब्रह्माके द्वारा प्रतिष्ठापित वटेश्वर-लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है। तत्पश्चात् जिसने स्थाणुवटका दर्शन और प्रदक्षिणा कर ली उसकी वह मानो सातों द्वीपवाली पृथ्वीकी की हुई प्रदक्षिणा हो जाती है। स्थाणुकी पश्चिम दिशाकी ओर ‘नकुलीश’ |