वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ४९ ] | चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति | २१५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुनश्चिन्तयतः सृष्टिं जज्ञे कन्या मनोरमा।<br>नीलोत्पलदलश्यामा तनुमध्या सुलोचना॥ ४<br><br>तां दृष्ट्वाभिमतां ब्रह्मा मैथुनायाजुहाव ताम्।<br>तेन पापेन महता शिरोऽशीर्यत वेधसः॥ ५<br><br>तेन शीर्णेन स ययौ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>सान्निहत्यं सरः पुण्यं सर्वपापक्षयावहम्॥ ६<br><br>तत्र पुण्ये स्थाणुतीर्थे ऋषिसिद्धनिषेविते।<br>सरस्वत्युत्तरे तीरे प्रतिष्ठाप्य चतुर्मुखम्॥ ७<br><br>आराधयामास तदा धूपैर्गन्धैर्मनोरमैः।<br>उपहारैस्तथा हृद्यै रौद्रसूक्तैर्दिने दिने॥ ८<br><br>तस्यैवं भक्तियुक्तस्य शिवपूजापरस्य च।<br>स्वयमेवाजगामाथ भगवान् नीललोहितः॥ ९<br><br>तमागतं शिवं दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>प्रणम्य शिरसा भूमौ स्तुतिं तस्य चकार ह॥ १० | पुनः उनके सृष्टिकी चिन्ता करनेपर एक नीले कमल-दलके समान श्याम, पतले मध्य भागवाली, सुलोचना, मनो-मोहिनी कन्या उत्पन्न हुई। उस मनोहर कन्याको देखकर ब्रह्माने उसे संतानोत्पत्ति हेतु बुलाया। (बस,) उस महान् पापसे ब्रह्माका मस्तक गिर गया॥ २–५॥<br><br>वे (ब्रह्माजी) उस गिरे मस्तकको लेकर सभी पापोंका विनाश करनेवाले तीनों लोकोंमें विख्यात सान्निहत्यसर नामके तीर्थमें गये। ऋषि और सिद्धोंसे सेवित उस पवित्र स्थाणुतीर्थमें सरस्वतीके उत्तरी तटपर चतुर्मुख (चार मुखवाले शिवलिङ्ग)-को स्थापित कर प्रतिदिन मनोरम धूप, गन्ध, सुन्दर उपहारों एवं रुद्र-सूक्तोंसे उसकी उपासना करने लगे। उनके इस प्रकार भक्तिपूर्वक शिवपूजामें तन्मय हो जानेपर भगवान् नीललोहित (शंकरजी) स्वयं ही वहाँ आ गये। लोकपितामह ब्रह्माने उन आये हुए शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया और पुनः वे (ब्रह्माजी) उन (शिव)-की स्तुति करने लगे॥ ६–१०॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>नमस्तेऽस्तु महादेव भूतभव्य भवाश्रय।<br>नमस्ते स्तुतिनित्याय नमस्त्रैलोक्यपालिने॥ ११<br><br>नमः पवित्रदेहाय सर्वकल्मषनाशिने।<br>चराचरगुरो गुह्यगुह्यानां च प्रकाशकृत्॥ १२<br><br>रोगा न यान्ति भिषजैः सर्वरोगविनाशन।<br>रौरवाजिनसंवीत वीतशोक नमोऽस्तु ते॥ १३<br><br>वारिकल्लोलसंक्षुब्धमहाबुद्धिविघट्टिने ।<br>त्वन्नामजापिनो देव न भवन्ति भवाश्रयाः॥ १४ | ब्रह्माने कहा— भूत, भव्य तथा भवके आश्रयस्वरूप महादेवजी! आपको नमस्कार है। नित्य-स्तुति किये जानेवाले और तीनों लोकोंके रक्षक! आपको नमस्कार है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाले एवं पवित्र देहवाले! आपको नमस्कार है। चर और अचरके गुरु! आप रहस्योंके भी रहस्यको (गुप्त-से-गुप्त तत्त्वको) प्रकाशित करनेवाले हैं। वैद्योंकी दवाओंसे दूर न होनेवाले सभी रोगोंका विनाश करनेवाले! रुरुमृगचर्मधारी! शोकसे रहित शिव! आपको नमस्कार है। जलकी उत्ताल तरङ्गोंसे महाबुद्धिके विघटन करनेमें (स्वयं भी) संक्षुब्ध देव! आपके नामका जप करनेवाले प्राणी संसारमें नहीं पड़ते॥ ११–१४॥ |
| नमस्ते नित्यनित्याय नमस्त्रैलोक्यपालन।<br>शंकरायाप्रमेयाय व्याधीनां शमनाय च॥ १५<br><br>परायापरिमेयाय सर्वभूतप्रियाय च।<br>योगेश्वराय देवाय सर्वपापक्षयाय च॥ १६<br><br>नमः स्थाणवे सिद्धाय सिद्धवन्दिसुताय च।<br>भूतसंसारदुर्गाय विश्वरूपाय ते नमः॥ १७ | नित्यके भी नित्य आपको नमस्कार है। तीनों लोकोंके पालक! कल्याणकारी (निश्चयात्मिका बुद्धिसे भी अगम्य) अप्रमेय शारीरिक-मानसिक रोगोंके नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। सबसे परे, अपरिमेय (मापमें न आने योग्य), सभी प्राणियोंके प्रिय देव एवं सभी पापोंके क्षय करनेवाले योगेश्वर! आपको नमस्कार है। (आप) स्थाणुस्वरूप सिद्ध एवं सिद्धों तथा वन्दियोंके द्वारा स्तुत आपको नमस्कार है। संसारके प्राणियोंके लिये दुर्ग बने हुए आप विश्वरूपके लिये नमस्कार है। |