वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४१ | | :--- | :--- |
| फणीन्द्रोक्तमहिम्ने ते फणीन्द्राङ्गदधारिणे।<br>फणीन्द्रवरहाराय भास्कराय नमो नमः॥ १८ | सर्पराजके द्वारा बखानी गयी महिमावाले, सर्पराजके बाजूबंद एवं माला धारण करनेवाले भास्करस्वरूप! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १५–१८॥ | | एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्माणं प्राह शङ्करः।<br>न च मन्युस्त्वया कार्यों भाविन्यर्थे कदाचन ॥ १९<br><br>पुरा वराहकल्पे ते यन्मयाऽपहृतं शिरः।<br>चतुर्मुखं च तद्भून्न कदाचिन्नशिष्यति ॥ २०<br><br>अस्मिन् सान्निहिते तीर्थे लिङ्गानि मम भक्तितः।<br>प्रतिष्ठाय विमुक्तस्त्वं सर्वपापैर्भविष्यसि ॥ २१<br><br>सृष्टिकामेन च पुरा त्वयाऽहं प्रेरितः किल।<br>तेनाहं त्वां तथेत्युक्त्वा भूतानां देशवर्त्तिवत् ॥ २२<br><br>दीर्घकालं तपस्तप्त्वा मग्नः संनिहिते स्थितः।<br>सुमहान्तं ततः कालं त्वं प्रतीक्षां ममाकरोः॥ २३ | इस प्रकार स्तुति किये जानेपर शंकरने ब्रह्मासे कहा—ब्रह्मन्! जो कार्य अवश्यम्भावी है उसके विषयमें आपको कभी भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। पहले वराह-कल्पमें मैंने आपका जो मस्तक अपहृत किया था वही चार मुख हो गया। अब वह कभी विनष्ट नहीं होगा। इस सान्निहिततीर्थमें भक्तिपूर्वक मेरे लिङ्गोंकी प्रतिष्ठा करके आप सभी पापोंसे छूट जायँगे। प्राचीन कालमें सृष्टि रचनेकी इच्छासे आपने मुझे अनुप्रेरित किया था, अतः मैं 'ऐसा ही होगा' यह कहकर भूतोंके देशमें रहनेवालेकी भाँति दीर्घकालतक तप करके संनिहितमें विलीन होकर स्थित रहा। उसके बाद आपने बहुत दिनोंतक मेरी प्रतीक्षा की॥ १९–२३॥ | | स्रष्टारं सर्वभूतानां मनसा कल्पितं त्वया।<br>सोऽब्रवीत् त्वां तदा दृष्ट्वा मां मग्नं तत्र चाम्भसि॥ २४<br><br>यदि मे नाग्रजस्त्वन्यस्ततः स्त्रक्ष्याम्यहं प्रजाः।<br>त्वयैवोक्तश्च नैवास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः॥ २५<br><br>स्थाणुरेष जले मग्नो विवशः कुरु मद्द्वितम्।<br>स सर्वभूतनसृजद् दक्षादींश्च प्रजापतीन्॥ २६ | फिर आपने अपने मनमें सभी प्राणियोंकी सृष्टि करनेवालेका ध्यान किया। तब उन्होंने मुझे वहाँ जलमें विलीन देखकर आपसे कहा कि यदि मुझसे अन्य कोई बड़ा पहले हुआ न माना जाय तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा। आपने कहा—आपके सिवा कोई दूसरा अग्रज पुरुष नहीं है। ये स्थाणु जलमें विलीन तथा विवश पड़े हैं। आप मेरा कल्याण करें। फिर उन्होंने दक्ष आदि प्रजापतियों तथा समस्त भूतोंकी सृष्टि की ॥ २४–२६॥ | | यैरिमं प्रकरोत् सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम्।<br>ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् ॥ २७<br><br>बिभक्षयिषवो ब्रह्मन् सहसा प्राद्रवंस्तथा।<br>स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् ॥ २८ | (इस तरह) जिन्होंने इस चार प्रकारके प्राणि-समुदायको उत्पन्न किया, सृष्टि होते ही वे सभी प्रजाएँ क्षुधित हो गयीं और प्रजापतिको खानेकी इच्छासे उन्हींपर लपक पड़ीं। जब उन्होंने उन्हींका भक्षण करनेकी चेष्टा की, तब त्राण पानेकी इच्छासे वे पितामहके पास दौड़कर गये और उनसे बोले— | | अथासां च महावृत्तिः प्रजानां संविधीयताम्।<br>दत्तं ताभ्यस्त्वया ह्यन्नं स्थावराणां महौषधीः॥ २९<br><br>जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम्।<br>विहितान्नाः प्रजाः सर्वाः पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ ३० | प्रजाओंकी जीविकाका विधान कीजिये। फिर आपने उन्हें अन्न (जीवन-साधन) प्रदान किया। अचल प्राणियोंकी महौषधियाँ और निर्बल चल प्राणी शक्तिशाली प्राणियोंके अन्न (प्राण-शक्ति) बने। इस प्रकार जीवन-निर्वाहके लिये प्राण-शक्तिका विधान हुआ। फिर सभी प्रजाएँ अपने स्थानको लौट गयीं ॥ २७–३०॥ |