वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ४९ ] | चार मुखोंकी उत्पत्ति-कथा, ब्रह्म-कृत शिवकी स्तुति | २१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो ववृधिरे सर्वाः प्रीतियुक्ताः परस्परम्।<br>भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरौ त्वयि॥ ३१<br>समुत्तिष्ठञ्जलात् तस्मात् प्रजाः संदृष्टवानहम्।<br>ततोऽहं ताः प्रजा दृष्ट्वा विहिताः स्वेन तेजसा ॥ ३२<br>क्रोधेन महता युक्तो लिङ्गमुत्पाट्य चाक्षिपम्।<br>तत् क्षिप्तं सरसो मध्ये ऊर्ध्वमेव यदा स्थितम् ॥ ३३<br>तदा प्रभृति लोकेषु स्थाणुरित्येष विश्रुतः।<br>सकृद् दर्शनमात्रेण विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥ ३४<br>प्रयाति मोक्षं परमं यस्मान्नावर्तते पुनः।<br>यश्चेह तीर्थे निवसेत् कृष्णाष्टम्यां समाहितः ॥ ३५<br>स मुक्तः पातकैः सर्वैरगम्यागमनोद्भवैः।<br>इत्युक्त्वा भगवान् देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३६ | फिर तो वे सब परस्पर प्रेमपूर्वक रहकर बढ़ने लगे। प्राणि-समुदायके बढ़ने एवं लोकके गुरु आपके हर्षित होनेपर मैंने उस जलसे निकलकर प्रजाको देखा। उसके बाद अपने तेजसे उत्पन्न हुई उन प्रजाओंको देखकर भारी क्रोधसे भरकर मैंने लिङ्गको उखाड़कर फेंक दिया। तालाबके बीचमें फेंका गया वह (लिङ्ग) ऊपर स्थित हो गया। तभीसे वह (लिङ्ग) संसारमें 'स्थाणु' नामसे प्रसिद्ध हो गया। इस (लिङ्ग)-का एक बार भी दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे छूटकर मोक्षपद प्राप्त कर लेता है; जहाँसे वह फिर नहीं लौटता। कृष्णाष्टमीके दिन मनको शान्त—समाहित कर इस तीर्थमें निवास करनेवाला व्यक्ति अगम्यागमनसे होनेवाले सभी पापोंसे छूट जाता है—ऐसा कहकर भगवान् महादेव वहीं अन्तर्हित हो गये॥ ३१—३६॥ |
| ब्रह्मा विशुद्धपापस्तु पूज्य देवं चतुर्मुखम्।<br>लिङ्गानि देवदेवस्य ससृजे सरमध्यतः ॥ ३७<br>आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं हरिपाश्र्वे प्रतिष्ठितम्।<br>द्वितीयं ब्रह्मसदनं स्वकीये ह्याश्रमे कृतम् ॥ ३८<br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे तृतीयं च प्रतिष्ठितम्।<br>चतुर्थं ब्रह्मणा लिङ्गं सरस्वत्यास्तटे कृतम् ॥ ३९<br>एतानि ब्रह्मतीर्थानि पुण्यानि पावनानि च।<br>ये पश्यन्ति निराहारास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ ४० | पापके शोधन हो जानेके कारण ब्रह्माने भी चतुर्मुख महादेवका पूजन कर तालाबके बीचमें देवाधिदेव (शिव)-के लिङ्गोंकी सृष्टि की। पहले तो उन्होंने हरिकी बगलमें ब्रह्मसरको स्थापित किया और दूसरा अपने आश्रम ब्रह्मसदनका निर्माण किया। उसीकी पूर्व दिशामें ब्रह्माने तृतीय लिङ्गको एवं सरस्वती नदीके तटपर चतुर्थ लिङ्गको प्रतिष्ठित किया। जो प्राणी उपवास-व्रतपूर्वक इन पवित्र और पापनाशक ब्रह्मतीर्थोंका दर्शन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त करते हैं॥ ३७—४०॥ |
| कृते युगे हरेः पार्श्वे त्रेतायां ब्रह्मण आश्रमे।<br>द्वापरे तस्य पूर्वेण सरस्वत्यास्तटे कलौ ॥ ४१<br>एतानि पूजयित्वा च दृष्ट्वा भक्तिसमन्विताः।<br>विमुक्ताः कलुषैः सर्वैः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ४२<br>सृष्टिकाले भगवता पूजितस्तु महेश्वरः।<br>सरस्वत्युत्तरे तीरे नाम्ना ख्यातश्चतुर्मुखः ॥ ४३<br>तं प्रणम्य श्रद्दधानो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>लोलासंकरसंभूतैस्तथा वैभाण्डसंकरैः ॥ ४४ | सत्ययुगमें हरिकी बगलमें, त्रेतामें ब्रह्माके आश्रममें, द्वापरमें उसके पूर्व तथा कलिमें सरस्वतीके तटपर स्थित लिङ्गोंका भक्तिपूर्वक पूजन एवं दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे छूटकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। सृष्टि करनेके समय सरस्वतीके उत्तरी तटपर भगवान् ब्रह्मासे अर्चित भगवान् महेश्वर चतुर्मुख नामसे विख्यात हुए। मनुष्य उनको श्रद्धाके साथ प्रणाम कर लोलासाङ्कर्य (चंचलासे उत्पन्न वर्णसंकर) तथा वैभाण्डसाङ्कर्यसे उत्पन्न सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४१-४४॥ |
| तथैव द्वापरे प्राप्ते स्वाश्रमे पूज्य शङ्करम्।<br>विमुक्तो राजसैर्भावैर्वर्णसंकरसम्भवैः ॥ ४५<br><br>ततः कृष्णचतुर्दश्यां पूजयित्वा तु मानवः।<br>विमुक्तः पातकैः सर्वैर्भोज्यस्यान्नसम्भवैः ॥ ४६ | उसी प्रकार द्वापरयुगके आनेपर अपने आश्रममें शङ्करका पूजन कर ब्रह्मा वर्णसाङ्कर्यसे उत्पन्न होनेवाले रजोगुणके भावोंसे मुक्त हुए। मनुष्य कृष्णचतुर्दशी तिथिमें वहाँ शङ्करजीका पूजन कर अभक्ष्य अन्नके भक्षण करनेसे होनेवाले समस्त पापोंसे विमुक्त हो जाता है। |