वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५० |
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| कलिकोले तु संप्राप्ते वसिष्ठाश्रममास्थितः ।<br>चतुर्मुखं स्थापयित्वा ययौ सिद्धिमनुत्तमाम् ॥ ४७<br>तत्रापि ये निराहाराः श्रद्दधाना जितेन्द्रियाः ।<br>पूजयन्ति महादेवं ते यान्ति परमं पदम् ॥ ४८<br>इत्येतत् स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं कीर्त्तितं तव ।<br>यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ ४९ | कलिकाल आनेपर वसिष्ठाश्रममें स्थित होकर ब्रह्माने चतुर्मुख (शङ्कर)-की स्थापना की तथा उत्तम सिद्धि प्राप्त की। जो लोग वहाँ निराहार, श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय होकर महादेवकी पूजा करेंगे, वे परमपदको प्राप्त करेंगे। इस प्रकार मैंने आपसे स्थाणुतीर्थका माहात्म्य बताया, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४५—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४९॥
पचासवाँ अध्याय
कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीयाके महत्त्वकी कथा
| देवदेव उवाच | देवदेव (महादेव)-ने कहा— |
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| एवं पृथूदको देवाः पुण्यः पापभयापहः।<br>तं गच्छध्वं महातीर्थं यावत् संनिधिबोधितम्॥ १<br><br>यदा मृगशिरोऋक्षे शशिसूर्यौ बृहस्पतिः।<br>तिष्ठन्ति सा तिथिः पुण्या त्वक्षया परिगीयते॥ २<br><br>तं गच्छध्वं सुरश्रेष्ठा यत्र प्राची सरस्वती।<br>पितॄनाराधयध्वं हि तत्र श्राद्धेन भक्तितः॥ ३<br><br>ततो मुरारिवचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समाजग्मुः कुरुक्षेत्रे पुण्यतीर्थं पृथूदकम्॥ ४ | देवताओ! इस प्रकार पृथूदकतीर्थ पाप-भयको नष्ट करनेवाला और पवित्र है। तुमलोग 'सन्निहित' तालाबतक (उस) ज्ञात (व्याप्त) होनेवाले महातीर्थमें जाओ। जिस तिथिमें चन्द्रमा, सूर्य एवं बृहस्पति—ये तीनों ग्रह मृगशिरा नक्षत्रमें स्थित होते हैं, उस पवित्र तिथिको 'अक्षया' तिथि कहते हैं। श्रेष्ठ देवताओ! जहाँ सरस्वती नदी पूर्व दिशामें बह रही है, वहाँ जाकर भक्ति-श्रद्धासे श्राद्ध करके पितरोंकी आराधना करो। भगवान्का निर्देश सुनकर इन्द्रके सहित सभी देवता कुरुक्षेत्रमें विद्यमान पृथूदक नामवाले पवित्र तीर्थमें गये॥ १—४॥ |
| तत्र स्नात्वा सुराः सर्वे बृहस्पतिमचोदयन्।<br>विशस्व भगवन् ऋक्षमिमं मृगशिरं कुरु।<br>पुण्यां तिथिं पापहरां तव कालोऽयमागतः॥ ५<br><br>प्रवर्तते रविस्तत्र चन्द्रमाऽपि विशत्यसौ।<br>त्वदायत्तं गुरो कार्यं सुराणां तत् कुरुष्व च॥ ६<br><br>इत्येवमुक्तो देवैस्तु देवाचार्योऽब्रवीदिदम्।<br>यदि वर्षाधिपोऽहं स्यां ततो यास्यामि देवताः।<br>बाढमूचुः सुराः सर्वे ततोऽसौ प्राक्रमन्मृगम्॥ ७ | वहाँ स्नान करके सभी देवताओंने बृहस्पतिसे कहा—भगवन्! इस मृगशिरा नक्षत्रमें आप प्रविष्ट होकर पापविनाशिनी पवित्र तिथिका निर्माण (विधान) करें। आपका यह (निर्दिष्ट) समय आ गया है। सूर्य उस स्थानपर स्थित हैं तथा चन्द्रमा भी उसमें प्रविष्ट हो रहे हैं। हे बृहस्पति! देवताओंका कार्य आपके अधीन है, आप उसे पूरा करें। देवताओंके इस प्रकार कहनेपर देवोंके गुरु बृहस्पतिने यह कहा—देवताओ! यदि मैं वर्ष-स्वामी बनूँ तो (मृगशिरा नक्षत्रपर) जाऊँगा। सभी देवोंने कहा—ठीक है। तब उन्होंने (बृहस्पतिने) मृगशिरा नक्षत्रमें प्रवेश किया॥ ५—७॥ |