वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५१ ] मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन २१९
| आषाढे मासि मार्गर्क्षे चन्द्रक्षयतिथिर्हि या।<br>तस्यां पुरन्दरः प्रीतः पिण्डं पितृषु भक्तितः॥८<br>प्रादात् तिलमधूमिश्रं हविष्यान्नं कुरुष्वथ।<br>ततः प्रीतास्तु पितरस्तां प्राहुस्तनयां निजाम्॥९<br>मेनां देवाश्च शैलाय हिमयुक्ताय वै ददुः।<br>तां मेनां हिमवाँल्लब्ध्वा प्रसादाद् दैवतेष्वथ।<br>प्रीतिमानभवच्चासौ रराम च यथेच्छया॥१०<br>ततो हिमाद्रिः पितृकन्यया समं<br>समर्पयन् वै विषयान् यथेष्टम्।<br>अजीजनत् सा तनयाश्च तिस्रो<br>रूपातियुक्ताः सुरयोषितोपमाः॥११ | आषाढ़ महीनेके मृगशिरा नक्षत्रमें चन्द्रक्षय (अमावस्या) तिथिके आ जानेपर इन्द्रने प्रसन्न होकर कुरुक्षेत्रमें भक्तिके साथ पितरोंको तिल और मधुसे मिला हुआ हविष्यान्नका पिण्ड प्रदान किया। तब पितरोंने देवोंको अपनी मेना नामकी कन्या दी। देवताओंने उसे हिमालयको सौंप दिया। देवोंके अनुग्रहसे उस मेनाको पाकर वे हिमवान् प्रसन्न हो गये और इच्छानुकूल विनोद-विहारमें लग गये। हिमालय पितरोंद्वारा दी गयी उस कन्याके साथ दाम्पत्यसुखमें आसक्त हो गये। फिर उस मेनाने भी सुरनारियोंके समान अत्यन्त रूपवती तीन कन्याओंको उत्पन्न किया॥८—११॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥५०॥
इक्यावनवाँ अध्याय
मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, कुटिला और रागिणीको शाप, उमाकी तपस्या, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन
| पुलस्त्य उवाच<br>मेनायाः कन्यकास्तिस्रो जाता रूपगुणान्विताः।<br>सुनाभ इति च ख्यातश्चतुर्थस्तनयोऽभवत्॥१<br>रक्ताङ्गी रक्तनेत्रा च रक्ताम्बरविभूषिता।<br>रागिणी नाम संजाता ज्येष्ठा मेनासुता मुने॥२<br>शुभाङ्गी पद्मपत्राक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा।<br>श्वेतमाल्याम्बरधरा कुटिला नाम चापरा॥३<br>नीलाञ्जनचयप्रख्या नीलेन्दीवरलोचना।<br>रूपेणानुपमा काली जघन्या मेनकासुता॥४<br>जातास्ताः कन्यकास्तिस्रः षडब्दात् परतो मुने।<br>कर्तुं तपः प्रयातास्ता देवास्ता ददृशुः शुभाः॥५<br>ततो दिवाकरैः सर्वैर्वसुभिश्च तपस्विनी।<br>कुटिला ब्रह्मलोकं तु नीता शशिकरप्रभा॥६<br>अथोचुर्देवताः सर्वाः किं त्वियं जनयिष्यति।<br>पुत्रं महिषहन्तारं ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥७ | पुलस्त्यजी बोले—मेनाको रूप और गुणोंसे सम्पन्न तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं और चौथा सुनाभ नामसे विख्यात पुत्र उत्पन्न हुआ। मुने! मेनाकी जेठी कन्या 'रागिणी' नामकी थी, जो लाल अङ्गों तथा लाल आँखोंवाली थी। वह लाल वस्त्रोंसे सुशोभित रहती थी। दूसरी 'कुटिला' नामकी कन्या थी, जो सुन्दर शरीरवाली, कमलदलनयना, नीले एवं घुँघराले बालोंवाली थी तथा उज्ज्वल माला और उज्ज्वल वस्त्र धारण किये रहती थी। मेनाकी तीसरी कन्याका नाम था 'काली'। उसका रंग नीले अञ्जनके ढेरके समान और आँखें नीले कमलके जैसी थीं। वह अत्यन्त सुन्दर थी॥१—४॥<br>मुने! वे तीनों कन्याएँ जन्मसे छः वर्षके बाद तपस्या करने चली गयीं। देवताओंने उन सुन्दरी कन्याओंको देखा, फिर आदित्य तथा वसुगण चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिवाली तपस्विनी (मध्यमा कन्या) कुटिलाको ब्रह्मलोकमें ले गये। उसके बाद सभी देवताओंने ब्रह्मासे कहा कि ब्रह्मन्! आप बतलायें कि क्या यह कन्या महिषासुरको मारनेवाले पुत्रको जनेगी? |