वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ५१ ] | मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन | २२१ | | :--- | :--- | | तदेव माता नामास्याश्चक्रे पितृसुता शुभा।<br>उमेत्येव हि कन्यायाः सा जगाम तपोवनम्॥ २२<br><br>ततः सा मनसा देवं शूलपाणिं वृषध्वजम्।<br>रुद्रं चेतसि संधाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ २३<br><br>ततो ब्रह्माऽब्रवीद् देवान् गच्छध्वं हिमवत्सुताम्।<br>इहानयध्वं तां कालीं तपस्यन्तीं हिमालये॥ २४ | करनेसे रोका। उसने 'उ' 'मा' ऐसा कहा। पितरोंकी पुत्री, कल्याणमयी माता (मेना)-ने कन्याका वही दो अक्षरोंसे संयुक्त 'उमा' यह नाम रखा। उमा भी तपोवनमें चली गयी। उसके बाद उसने मनमें शूलपाणि वृषध्वज रुद्रका ध्यानकर कठिन तपस्या की। फिर ब्रह्माने देवताओंसे कहा—देवताओ! तुमलोग हिमालयपर तप करती हुई हिमालयकी पुत्री कालीके पास जाओ और उसे यहाँ लिवा लाओ॥ २१—२४॥ | | ततो देवाः समाजग्मुर्ददृशुः शैलनन्दिनीम्।<br>तेजसा विजितास्तस्या न शेकुरुपसर्पितुम्॥ २५<br><br>इन्द्रोऽमरगणैः सार्द्धं निर्द्धूतस्तेजसा तया।<br>ब्रह्मणोऽधिकतेजोऽस्य विनिवेद्य प्रतिष्ठितः॥ २६<br><br>ततो ब्रह्माऽब्रवीत् सा हि ध्रुवं शङ्करवल्लभा।<br>यूयं यत्तेजसा नूनं विक्षिप्तास्तु हतप्रभाः॥ २७<br><br>तस्माद् भजध्वं स्वं स्वं हि स्थानं भो विगतज्वराः।<br>सतारकं हि महिषं विद्ध्वं निहतं रणे॥ २८ | उसके बाद देवगण (हिमालयपर) आये और (उन लोगोंने) शैलनन्दिनीको देखा। परंतु उसके तेजसे व्यग्र (व्याकुल) हो जानेके कारण वे उसके निकट न जा सके। देवताओंके साथ इन्द्र भी उसके तेजसे कान्तिहीन-से हो गये। वे ब्रह्मासे उसके तेजका आधिक्य बतलाकर खड़े हो गये। उसके बाद ब्रह्माने कहा—वह निश्चय ही शङ्करकी पत्नी होगी; क्योंकि उसके तेजसे तुम सब आकुल और प्रभाहीन हो गये हो। अतः देवताओ! तुमलोग चिन्ता छोड़कर अपने-अपने स्थानको जाओ। अब समझ लो कि युद्धमें तारकके साथ महिष मारा (ही) गया॥ २५—२८॥ | | इत्येवमुक्ता देवेन ब्रह्मणा सेन्द्रकाः सुराः।<br>जग्मुः स्वान्येव धिष्ण्यानि सद्यो वै विगतज्वराः॥ २९<br><br>उमामपि तपस्यन्तीं हिमवान् पर्वतेश्वरः।<br>निवर्त्य तपसस्तस्मात् सदारो ह्यानयद्गृहान्॥ ३०<br><br>देवोऽप्याश्रित्य तद्रौद्रं व्रतं नाम्ना निराश्रयम्।<br>विचचार महाशैलान् मेरुप्राग्र्यान् महामतिः॥ ३१<br><br>स कदाचिन्महाशैलं हिमवन्तं समागतः।<br>तेनार्चितः श्रद्धयाऽसौ तां रात्रिमवसद्धरः॥ ३२ | इस प्रकार ब्रह्माने जब इन्द्रके साथ सभी देवताओंसे कहा तब देवगण चिन्तारहित होकर उसी समय अपने-अपने स्थानपर चले गये। फिर पत्नीसहित पर्वतराज हिमवान् तपश्चर्यामें लगी हुई उमाको भी उस तपश्चर्यासे हटाकर उसे घर ले आये। महाज्ञानी महादेव भी निराश्रय नामके उस कठिन (रौद्र) व्रतका आश्रय लेकर मेरु आदि बड़े-बड़े पर्वतोंपर भ्रमण करने लगे। वे कभी पर्वतराज हिमाचलपर गये। हिमालयने उनकी श्रद्धासे पूजा की। उस रात उन्होंने वहीं निवास किया॥ २९—३२॥ | | द्वितीयेऽह्नि गिरीशेन महादेवो निमन्त्रितः।<br>इहैव तिष्ठस्व विभो तपःसाधनकारणात्॥ ३३<br><br>इत्येवमुक्तो गिरिणा हरश्चक्रे मतिं च ताम्।<br>तस्थावाश्रममाश्रित्य त्यक्त्वा वासं निराश्रयम्॥ ३४<br><br>वसतोऽप्याश्रमे तस्य देवदेवस्य शूलिनः।<br>तं देशमगमत् काली गिरिराजसुता शुभा॥ ३५<br><br>तामागतां हरो दृष्ट्वा भूयो जातां प्रियां सतीम्।<br>स्वागतेनाभिसम्पूज्य तस्थौ योगरतो हरः॥ ३६ | दूसरे दिन पर्वतराज (हिमालय)-ने महादेवको निमन्त्रित किया (और) कहा—हे विभो! आप तपस्या करनेके लिये यहीं रहें। हिमालयके इस प्रकार कहनेपर शङ्करने भी वही विचार किया और बिना घरका रहना छोड़कर आश्रममें रहने लगे। देवाधिदेव त्रिशूलधारी शङ्करके आश्रममें रहनेपर गिरिराजकी कल्याणी कन्या काली उस स्थानपर आयी। अपनी प्रिया सतीको पुनः हिमतनया उमाके रूपमें उत्पन्न हुई और (अपने) सामने आयी देखकर शङ्करने उनके आनेका अभिनन्दन तो किया, पर वे फिर योगमें लीन हो गये॥ ३३—३६॥ |