भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233
अध्याय ५१ ]मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन२२३
Sanskrit ShlokaHindi Translation
भिक्षुरुवाच<br>मया स्नानं प्रयागे तु कृतं प्रथममेव हि।<br>ततोऽथ तीर्थे कुब्जाम्रे जयन्ते चण्डिकेश्वरे॥ ५१<br>बन्धुवृन्दे च कर्कन्थे तीर्थे कनखले तथा।<br>सरस्वत्यामग्निकुण्डे भद्रायां तु त्रिविष्टपे॥ ५२<br>कोनटे कोटितीर्थे च कुब्जके च कृशोदरि।<br>निष्कामेन कृतं स्नानं ततोऽभ्यागां तवाश्रमम्॥ ५३<br>इहस्थां त्वां समाभाष्य गमिष्यामि पृथूदकम्।<br>पृच्छामि यदहं त्वां वै तत्र न क्रोधुमर्हसि॥ ५४<br>अहं यत्तपसात्मानं शोषयामि कृशोदरि।<br>बाल्येऽपि संयततनुस्तत्तु श्लाघ्यं द्विजन्मनाम्॥ ५५<br>किमर्थं भवती रौद्रं प्रथमे वयसि स्थिता।<br>तपः समाश्रिता भीरु संशयः प्रतिभाति मे॥ ५६<br>प्रथमे वयसि स्त्रीणां सह भर्त्रा विलासिनि।<br>सुभोगा भोगिताः काले व्रजन्ति स्थिरयौवने॥ ५७<br>तपसा वाञ्छयन्तीह गिरिजे सचराचराः।<br>रूपाभिजनमैश्वर्यं तच्च ते विद्यते बहु॥ ५८<br>तत् किमर्थमपास्यैतानलंकाराञ्जटा धृताः।<br>चीनांशुकं परित्यज्य किं त्वं वल्कलधारिणी॥ ५९भिक्षुने कहा— कृशोदरि! मैंने पहले प्रयागमें स्नान किया, उसके बाद कुब्जाम्र, जयन्त, चण्डिकेश्वर, बन्धुवृन्द, कर्कन्थ, कनखलतीर्थ, सरस्वती, अग्निकुण्ड, भद्रा, त्रिविष्टप, कोनट, कोटितीर्थ और कुब्जकमें निष्कामभावसे स्नान कर मैं तुम्हारे आश्रममें आया हूँ। यहाँपर स्थित रहनेवाली तुमसे वार्ता करनेके बाद मैं पृथूदकतीर्थमें जाऊँगा। मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ, उसपर क्रोध न करना॥ ५१—५४॥<br><br>कृशोदरि! मैं बचपनमें भी शरीरको संयत कर तपस्यासे जो अपनेको सुखा रहा हूँ, वह तो ब्राह्मणोंके लिये प्रशंसनीय है। परंतु भीरु! तुम इस प्रथम अवस्थामें ही क्यों उग्र तप कर रही हो? (इसमें मुझे) शंका हो रही है। अयि स्थिरयौवने! अयि विलासिनि! प्रथम अवस्थामें स्त्रियाँ पतिके साथ सुन्दर भोगोंका भोग करती हैं। पर्वतपुत्रि! चर और अचर सभी प्राणी तपस्यासे संसारमें रूप, उत्तम कुल और सम्पत्ति चाहते हैं, सो तो तुम्हें अधिक-से-अधिक मात्रामें उपलब्ध हैं ही; फिर सौन्दर्य-साधनोंको छोड़कर तुमने जटा क्यों धारण कर ली है? तुमने रेशमी वस्त्र छोड़कर वल्कल क्यों पहन लिया है?॥ ५५—५९॥
पुलस्त्य उवाच<br>ततस्तु तपसा वृद्धा देव्याः सोमप्रभा सखी।<br>भिक्षवे कथयामास यथावत् सा हि नारद॥ ६०पुलस्त्यजी बोले— नारद! उसके बाद तपस्यामें बढ़ी हुई पार्वतीकी सोमप्रभा नामकी सहचरीने उन भिक्षुसे वस्तुस्थिति कही॥ ६०॥
सोमप्रभोवाच<br>तपश्चर्या द्विजश्रेष्ठ पार्वत्या येन हेतुना।<br>तं शृणुष्व त्वियं काली हरं भर्तारमिच्छति॥ ६१सोमप्रभाने कहा— द्विजश्रेष्ठ! पार्वती जिस हेतुसे तपस्या कर रही हैं, उसे सुनिये। ये काली (तपस्याके बलसे) शिवको अपना पति बनाना चाहती हैं॥ ६१॥
पुलस्त्य उवाच<br>सोमप्रभाया वचनं श्रुत्वा संकम्प्य वै शिरः।<br>विहस्य च महाहासं भिक्षुराह वचस्त्विदम्॥ ६२पुलस्त्यजी बोले— सोमप्रभाकी बात सुनकर भिक्षुने सिर हिलाते हुए बड़े जोरसे हँसकर यह वचन कहा—॥ ६२॥
भिक्षुरुवाच<br>वदामि ते पार्वति वाक्यमेवं<br>केन प्रदत्ता तव बुद्धिरेशा।<br>कथं करः पल्लवकोमलस्ते<br>समेष्यते शार्वकरं ससर्पम्॥ ६३<br>तथा दुकूलाम्बरशालिनी त्वं<br>मृगारिचर्माभिभृतस्तु रुद्रः।<br>त्वं चन्दनाक्ता स च भस्मभूषितो<br>न युक्तरूपं प्रतिभाति मे त्विदम्॥ ६४भिक्षुकने कहा— पार्वती! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ; तुमको यह बुद्धि किसने दी? पल्लवके सदृश तुम्हारा कोमल कर शङ्करके सर्पयुक्त हाथसे कैसे मिलेगा? कहाँ तुम सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाली और कहाँ व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले ये रुद्र! कहाँ तुम चन्दनसे चर्चित और कहाँ भस्मसे भूषित शङ्कर! अतः मुझे यह मेल अनुरूप नहीं प्रतीत होता॥ ६३-६४॥