भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४ पुलस्त्य उवाच जयायास्तद्वचः श्रुत्वा वज्रपातसमं सती। मन्युनाऽभिप्लुता ब्रह्मन् पञ्चत्वमगमत् ततः॥ १० जया मृतां सतीं दृष्ट्वा क्रोधशोकपरप्लुता। मुञ्चती वारि नेत्राभ्यां सस्वरं विललाप ह॥ ११ आक्रन्दितध्वनिं श्रुत्वा शूलपाणिस्त्रिलोचनः। आः किमेतदितीत्युक्त्वा जयाभ्याशमुपागतः॥ १२ आगतो ददृशे देवीं लतामिव वनस्पतेः। कृत्तां परशुना भूमौ श्लथाङ्गीं पतितां सतीम्॥ १३ देवीं निपतितां दृष्ट्वा जयां पप्रच्छ शंकरः। किमियं पतिता भूमौ निकृत्तेव लता सती॥ १४ सा शंकरवचः श्रुत्वा जया वचनमब्रवीत्। श्रुत्वा मखस्था दक्षस्य भगिन्यः पतिभिः सह ॥ १५ आदित्याद्यास्त्रिलोकेश समं शक्रादिभिः सुरैः। मातृष्वसा विपन्नेयमन्तर्दुःखेन दह्यती ॥ १६ पुलस्त्य उवाच एतच्छ्रुत्वा वचो रौद्रं रुद्रः क्रोधाप्लुतो बभौ। क्रुद्धस्य सर्वगात्रेभ्यो निश्चेरुः सहसार्चिषः॥ १७ ततः क्रोधात् त्रिनेत्रस्य गात्ररोमोद्भवा मुने। गणाः सिंहमुखा जाता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १८ गणैः परिवृतस्तस्मान्मन्दराद्धिमसाह्वयम्। गतः कनखलं तस्माद् यत्र दक्षोऽयजत् क्रतुम्॥ १९ ततो गणानामधिपो वीरभद्रो महाबलः। दिशि प्रतीच्युत्तरायां तस्थौ शूलधरो मुने॥ २० जया क्रोधाद् गदां गृह्य पूर्वदक्षिणतः स्थिता। मध्ये त्रिशूलधृक् शर्वस्तस्थौ क्रोधान्महामुने॥ २१ मृगारिवदनं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः। ऋषयो यक्षगन्धर्वाः किमिदं त्वित्यचिन्तयन् ॥ २२ ततस्तु धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान्। द्वारपालस्तदा धर्मो वीरभद्रमुपाद्रवत्॥ २३ तमापतन्तं सहसा धर्मं दृष्ट्वा गणेश्वरः। करेणैकेन जग्राह त्रिशूलं वह्निसन्निभम्॥ २४ कार्मुकं च द्वितीयेन तृतीयेनाथ मार्गणान्। चतुर्थेन गदां गृह्य धर्ममभ्यद्रवद् गणः॥ २५ पुलस्त्यजी बोले-ब्रह्मन् ! (नारदजी!) वज्रपातके समान जयाकी उस बातको सुनकर क्रोध एवं दुःखसे भरकर सतीने प्राण छोड़ दिये। सतीको मरी हुई देखकर क्रोध एवं दुःखसे भरी जया आँसू बहाते हुए जोर- जोरसे विलाप करने लगी। रोनेकी करुणध्वनि सुनकर शूलपाणि भगवान् शिव 'अरे क्या हुआ, क्या हुआ'- ऐसा कहकर उसके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने फरसेसे कटी वृक्षपर चढ़ी लताकी तरह सतीको भूमिपर मरी पड़ी देखा तो जयासे पूछा-ये सती कटी लताकी तरह भूमिपर क्यों पड़ी हुई हैं? शिवके वचनको सुनकर जया बोली-हे त्रिलोकेश्वर ! दक्षके यज्ञमें अपने- अपने पतिके साथ बहनोंका एवं इन्द्र आदि देवोंके साथ आदित्य आदिका निमन्त्रित होकर उपस्थित होना सुनकर आन्तरिक दुःख (की ज्वाला)-से दग्ध हो गयीं। इससे मेरी माताकी बहन (सती)-के प्राण निकल गये ॥ १०-१६॥ पुलस्त्यजीने कहा - जयाके इस भयंकर (अमङ्गल) वचनको सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उनके शरीरसे सहसा अग्निकी तेज ज्वालाएँ निकलने लगीं। मुने ! इसके बाद क्रोधके कारण त्रिनेत्र भगवान् शिवके शरीरके लोमोंसे सिंहके समान मुखवाले वीरभद्र आदि बहुत-से रुद्रगण उत्पन्न हो गये। अपने गणोंसे घिरे भगवान् शिव मंदरपर्वतसे हिमालयपर गये और वहाँसे कनखल चले गये, जहाँ दक्ष यज्ञ कर रहे थे। इसके बाद सभी गणोंमें अग्रणी महाबली वीरभद्र शूल धारण किये पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशामें चले गये ॥ १७-२० ॥ महामुने ! क्रोधसे गदा लेकर जया पूर्व-दक्षिण दिशा (अग्निकोण)-में खड़ी हो गयी और मध्यमें क्रोधसे भरे त्रिशूल लिये शंकर खड़े हो गये। सिंहवदन (वीरभद्र)-को देखकर इन्द्र आदि देवता, ऋषि, यक्ष एवं गन्धर्वलोग सोचने लगे कि यह क्या है? तदनन्तर द्वारपाल धर्म धनुष एवं सर्पके समान बाणोंको लेकर वीरभद्रकी ओर दौड़े। सहसा धर्मको आता हुआ देखकर गणेश्वर एक हाथमें अग्निके सदृश त्रिशूल, दूसरे हाथमें धनुष, तीसरे हाथमें बाण और चौथे हाथमें गदा लेकर उनकी ओर दौड़ पड़े ॥ २१-२५ ॥

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