वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] विजयाकी मौसी सतीसे दक्ष-यज्ञकी वार्ता एवं सतीका प्राण-त्याग २३ ततश्चतुर्भुजं दृष्ट्वा धर्मराजो गणेश्वरम्। तस्थावष्टभुजो भूत्वा नानायुधधरोऽव्ययः ॥ २६ खड्गचर्मगदाप्रासपरश्वधवराङ्कुशैः । चापमार्गणभृत्तस्थौ हन्तुकामो गणेश्वरम्॥ २७ गणेश्वरोऽपि संक्रुद्धो हन्तुं धर्मं सनातनम्। ववर्ष मार्गणांस्तीक्ष्णान् यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २८ तावन्योन्यं महात्मानौ शरचापधरौ मुने। रुधिरारुणसिक्ताङ्गौ किंशुकाविव रेजतुः ॥ २९ ततो वरास्त्रैर्गणनायकेन जितः स धर्मः तरसा प्रसह्य। पराङ्मुखोऽभूद्विमना मुनीन्द्र स वीरभद्रः प्रविवेश यज्ञम् ॥ ३० यज्ञवाटं प्रविष्टं तं वीरभद्रं गणेश्वरम्। दृष्ट्वा तु सहसा देवा उत्तस्थुः सायुधा मुने॥ ३१ वसवोऽष्टौ महाभागा ग्रहा नव सुदारुणाः । इन्द्राद्या द्वादशादित्या रुद्रास्त्वेकादशैव हि ॥ ३२ विश्वेदेवाश्च साध्याश्च सिद्धगन्धर्वपन्नगाः । यक्षाः किंपुरुषाश्चैव खगाश्चक्रधरास्तथा ॥ ३३ राजा वैवस्वताद् वंशाद् धर्मकीर्तिस्तु विश्रुतः। सोमवंशोद्भवश्चोग्रो भोजकीर्तिर्महाभुजः ॥ ३४ दितिजा दानवाश्चान्ये येऽन्ये तत्र समागताः । ते सर्वेऽभ्यद्रवन् रौद्रं वीरभद्रमुदायुधाः ॥ ३५ तानापतत एवाशु चापबाणधरो गणः । अभिदुद्राव वेगेन सर्वानैव शरोत्करैः ॥ ३६ ते शस्त्रवर्षमतुलं गणेशाय समुत्सृजन्। गणेशोऽपि वरास्त्रैस्तान् प्रचिच्छेद बिभेद च ॥ ३७ शरैः शस्त्रैश्च सततं वध्यमाना महात्मना। वीरभद्रेण देवाद्या अवहारमकुर्वत ॥ ३८ ततो विवेश गणपो यज्ञमध्यं सुविस्तृतम्। जुह्वाना ऋषयो यत्र हवींषि प्रवितन्वते ॥ ३९ इसके बाद धर्मराजने चतुर्भुज गणेश्वरको देख और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सज्जित हो तथा आठ भुजाओंको धारणकर उनका सामना किया और गणोंके स्वामी वीरभद्रपर प्रहार करनेकी इच्छासे वे अपने हाथोंमें ढाल, तलवार, गदा, भाला, फरसा, अंकुश, धनुष एवं बाण लेकर खड़े हो गये। गणेश्वर वीरभद्र भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर धर्मको मारनेके लिये वर्षाकालिक मेघके सदृश उनके ऊपर तीक्ष्ण बाणोंकी वर्षा करने लगे। मुने! धनुषको लिये रुधिरसे लथपथ (अतएव) लाल शरीरवाले वे दोनों महात्मा पलाश-पुष्पके समान दीखने लगे ॥ २६-२९ ॥ मुनिराज! इसके बाद श्रेष्ठ शस्त्रास्त्रोंके कारण वीरभद्रसे पराजित होकर धर्मराज खिन्न होकर पीछे हट गये। इधर वीरभद्र यज्ञशालामें घुस गये। मुने ! गणेश्वर वीरभद्रको यज्ञमण्डपमें घुसते देखकर सहसा सभी देवता अस्त्र-शस्त्र लेकर उठ खड़े हुए। महाभाग आठों वसु, अत्यन्त दारुण नवों ग्रह, इन्द्र आदि दिक्पाल, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, विश्वेदेव, साध्यगण, सिद्ध, गन्धर्व, पन्नग, यक्ष, किंपुरुष, महाबाहु, विहंगम, चक्रधर, वैवस्वत-वंशीय प्रसिद्ध राजा धर्मकीर्ति, चन्द्रवंशीय महाबाहु, उग्र बलशाली राजा भोजकीर्ति, दैत्य-दानव तथा वहाँ आये हुए अन्य सभी लोग आयुध लेकर रौद्र वीरभद्रकी ओर दौड़ पड़े ॥ ३०-३५ ॥ धनुष-बाण धारण किये गणोंने उन देवताओंके आते ही उनपर वेगपूर्वक शस्त्रोंद्वारा आक्रमण कर दिया। इधर देवताओंने भी वीरभद्रके ऊपर अतुलनीय बाणोंकी वर्षा की। गणनायक वीरभद्रने देवताओंके अस्त्रोंको छिन्न-भिन्न कर डाला। महात्मा वीरभद्रद्वारा विविध बाणों और अस्त्रोंसे आहत होकर देवता आदि रणभूमिसे भाग चले। तब गणपति वीरभद्र सुविस्तृत यज्ञके मध्यमें प्रविष्ट हुए जहाँ मुनिगण यज्ञकुण्डमें हविकी आहुति दे रहे थे ॥ ३६-३९ ॥