भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४ ततो महर्षयो दृष्ट्वा मृगेन्द्रवदनं गणम्। भीता होत्रं परित्यज्य जग्मुः शरणमच्युतम् ॥ ४० तानातांश्चक्रभृद् दृष्ट्वा महर्षींस्त्रस्तमानसान्। न भेतव्यमितीत्युक्त्वा समुत्तस्थौ वरायुधः ॥ ४१ समानम्य ततः शार्ङ्गं शरानग्निशिखोपमान्। मुमोच वीरभद्राय कायावरणदारणान् ॥ ४२ ते तस्य कायमासाद्य अमोघा वै हरेः शराः। निपेतुर्भुवि भग्नाशा नास्तिकादिव याचकाः ॥ ४३ शरांस्त्वमोघान्मोघत्वमापन्नान्वीक्ष्य केशवः। दिव्यैरस्त्रैर्वीरभद्रं प्रच्छादयितुमुद्यतः ॥ ४४ तानस्त्रान् वासुदेवेन प्रक्षिप्तान् गणनायकः। वारयामास शूलेन गदया मार्गणैस्तथा ॥ ४५ दृष्ट्वा विपन्नान्यस्त्राणि गदां चिक्षेप माधवः। त्रिशूलेन समाहत्य पातयामास भूतले ॥ ४६ मुशलं वीरभद्राय प्रचिक्षेप हलायुधः। लाङ्गलं च गणेशोऽपि गदया प्रत्यवारयत् ॥ ४७ मुशलं सगदं दृष्ट्वा लाङ्गलं च निवारितम्। वीरभद्राय चिक्षेप चक्रं क्रोधात् खगध्वजः ॥ ४८ तमापतन्तं शतसूर्यकल्पं सुदर्शनं वीक्ष्य गणेश्वरस्तु । शूलं परित्यज्य जग्राह चक्रं यथा मधुं मीनवपुः सुरेन्द्रः ॥ ४९ चक्रे निगीर्णे गणनायकेन क्रोधातिरक्तोऽसितचारुनेत्रः । मुरारिरभ्येत्य गणाधिपेन्द्र- मुत्क्षिप्य वेगाद् भुवि निष्पिपेण ॥ ५० हरिबाहूरुवेगेन विनिष्पिष्टस्य भूतले। सहितं रुधिरोद्गारैर्मुखाच्चक्रं विनिर्गतम् ॥ ५१ ततो निःसृतमालोक्य चक्रं कैटभनाशनः। समादाय हृषीकेशो वीरभद्रं मुमोच ह ॥ ५२ हृषीकेशेन मुक्तस्तु वीरभद्रो जटाधरम्। गत्वा निवेदयामास वासुदेवात्पराजयम् ॥ ५३ ततो जटाधरो दृष्ट्वा गणेशं शोणिताप्लुतम्। निःश्वसन्तं यथा नागं क्रोधं चक्रे तदाव्ययः ॥ ५४ तब वे महर्षि सिंहमुख वीरभद्रको देखकर भयसे हवन छोड़कर विष्णुकी शरणमें चले गये। चक्रधारी विष्णुने भयभीत महर्षियोंको दुःखी देखकर 'डरो मत' ऐसा कहकर अपने श्रेष्ठ अस्त्र लेकर खड़े हो गये और अपने शार्ङ्ग धनुषको चढ़ाकर वीरभद्रके ऊपर शरीरको विदीर्ण करनेवाले अग्निशिखाके तुल्य बाणोंकी वर्षा करने लगे। पर श्रीहरिके वे अमोघ (सफल) बाण वीरभद्रके शरीरपर पहुँचकर भी पृथ्वीपर ऐसे (यों ही व्यर्थ होकर) गिर पड़े, जैसे कि याचक नास्तिकके पाससे विफल-निराश होकर लौट जाते हैं॥ ४०-४३॥ अपने (अव्यर्थ) बाणोंको व्यर्थ होते देखकर भगवान् विष्णु पुनः वीरभद्रको दिव्य अस्त्रोंसे ढक देनेके लिये तैयार हो गये। वासुदेवके द्वारा प्रयुक्त उन बाणोंको गणश्रेष्ठ वीरभद्रने शूल, गदा और बाणोंसे रोककर विफल कर दिया। भगवान् विष्णुने अपने अस्त्रोंको नष्ट होते देखकर उसपर कौमोदकी गदा फेंकी। किंतु वीरभद्रने उसे भी अपने त्रिशूलसे काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया। हलायुधने वीरभद्रकी ओर मूसल और हल फेंका जिसे वीरभद्रने गदासे निवारित कर दिया। गदाके सहित मूसल और हलको नष्ट हुआ देखकर गरुडध्वज विष्णुने क्रोधसे वीरभद्रके ऊपर सुदर्शनचक्र चला दिया ॥ ४४-४८ ॥ गणेश्वर वीरभद्रने सैकड़ों सूर्यके सदृश सुदर्शन चक्रको अपनी ओर आते देखा तो शूलको छोड़कर चक्रको वह ऐसे निगल लिया जैसे मीनशरीरधारी विष्णु मधुदैत्यको निगल गये थे। वीरभद्रद्वारा चक्रके निगल लिये जानेपर विष्णुके सुन्दर काले नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे उसके निकट पहुँच गये और उसे वेगसे उठा लिया तथा पृथ्वीपर पटककर उसे पीसने लगे। भगवान् विष्णुकी भुजाओं और जाँघोंके प्रबल वेगसे भूतलमें पटके गये वीरभद्रके मुखसे रुधिरके फौहारेके साथ चक्र बाहर निकल आया। चक्रको मुखसे निकला देखकर भगवान् विष्णुने उसे ले लिया और वीरभद्रको छोड़ दिया ॥ ४९-५२ ॥ भगवान् विष्णुद्वारा छोड़ दिये जानेपर वीरभद्रने जटाधारी शिवके निकट जाकर वासुदेवसे हुई अपनी पराजयका वर्णन किया। फिर वीरभद्रको खूनसे लथ- पथ तथा सर्पके सदृश निःश्वास लेते देख अव्यय