भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

अध्याय ५ ] दक्ष-यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २५ ततः क्रोधाभिभूतेन वीरभद्रोऽथ शंभुना। पूर्वोद्दिष्टे तदा स्थाने सायुधस्तु निवेशितः ॥ ५५ वीरभद्रमथादिश्य भद्रकालीं च शंकरः । विवेश क्रोधताम्राक्षो यज्ञवाटं त्रिशूलभृत् ॥ ५६ ततस्तु देवप्रवरे जटाधरे त्रिशूलपाणौ त्रिपुरान्तकारिणि। दक्षस्य यज्ञं विशति क्षयंकरे जातो ऋषीणां प्रवरो हि साध्वसः ॥ ५७ जटाधर (शंकर) - ने क्रोध किया। इसके बाद क्रोधसे तिलमिलाये शंकरने अस्त्रसहित वीरभद्रको पहले बतलाये स्थानपर बैठा दिया। वे त्रिशूलधर शंकर वीरभद्र तथा भद्रकालीको आदेश देकर क्रोधसे लाल आँखें किये यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए। त्रिपुर नामक राक्षसको मारनेवाले उन त्रिशूलपाणि त्रिपुरारि देवश्रेष्ठ जटाधरके दक्ष-यज्ञमें प्रवेश करते ही ऋषियोंमें भारी भय उत्पन्न हो गया ॥ ५३-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४॥ पाँचवाँ अध्याय दक्ष-यज्ञका विध्वंस, देवताओंका प्रताड़न, शंकरके कालरूप और राश्यादि रूपोंमें स्वरूप-कथन पुलस्त्य उवाच जटाधरं हरिर्दृष्ट्वा क्रोधादारक्तलोचनम् । तस्मात् स्थानादपाक्रम्य कुब्जाग्रेऽन्तर्हितः स्थितः ॥ १ वसवोऽष्टौ हरं दृष्ट्वा सुस्रुवुर्वेगतो मुने । सा तु जाता सरिच्छ्रेष्ठा सीता नाम सरस्वती ॥ २ एकादश तथा रुद्रास्त्रिनेत्रा वृषकेतनाः । कान्दिशीका लयं जग्मुः समभ्येत्यैव शंकरम् ॥ ३ विश्वेऽश्विनौ च साध्याश्च मरुतोऽनलभास्कराः । समासाद्य पुरोडाशं भक्षयन्तो महामुने ॥ ४ चन्द्रः सममृक्षगणैर्निशां समुपदर्शयन् । उत्पत्यारुह्य गगनं स्वमधिष्ठानमास्थितः ॥ ५ कश्यपाद्याश्च ऋषयो जपन्तः शतरुद्रियम् । पुष्पाञ्जलिपुटा भूत्वा प्रणताः संस्थिता मुने ॥ ६ असकृद् दक्षदयिता दृष्ट्वा रुद्रं बलाधिकम् । शक्रादीनां सुरेशानां कृपणं विललाप ह ॥ ७ ततः क्रोधाभिभूतेन शंकरेण महात्मना । तलप्रहारैरमरा बहवो विनिपातिताः ॥ ८ पुलस्त्यजी बोले- जटाधारी भगवान् शिवको क्रोधसे आँखें लाल किये देखकर भगवान् विष्णु उस स्थानसे हटकर कुब्जाग्र (ऋषिकेश) - में छिप गये। मुने! क्रुद्ध शिवको देखकर आठ वसु तेजीसे पिघलने लगे। इस कारण वहाँ सीता नामकी श्रेष्ठ नदी प्रवाहित हुई। वहाँ पूजाके लिये स्थित त्रिनेत्रधारी ग्यारहों रुद्र भयके मारे इधर-उधर भागते हुए शंकरके निकट जाकर उनमें ही लीन हो गये। महामुनि नारद ! शंकरको निकट आते देख विश्वेदेवगण, अश्विनीकुमार, साध्यवृन्द, वायु, अग्नि एवं सूर्य पुरोडाश खाते हुए भाग गये ॥ १-४ ॥ फिर तो ताराओंके साथ चन्द्रमा रात्रिको प्रकाशित करते हुए आकाशमें ऊपर जाकर अपने स्थानपर स्थित हो गये। इधर कश्यप आदि ऋषि शतरुद्रिय (मन्त्र)- का जप करते हुए अञ्जलिमें पुष्प लेकर विनीतभावसे खड़े हो गये। इन्द्रादि सभी देवताओंसे अधिक बली रुद्रको देखकर दक्ष-पत्नी अत्यन्त दीन होकर बार-बार करुण विलाप करने लगी। इधर क्रुद्ध भगवान् शंकरने थप्पड़ोंके प्रहारसे अनेक देवताओंको मार गिराया ॥ ५-८ ॥