वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ पादप्रहारैरपरे त्रिशूलेनापरे मुने। दृष्ट्यग्निना तथैवान्ये देवाद्याः प्रलयीकृताः ॥ ९ ततः पूषा हरं वीक्ष्य विनिघ्नन्तं सुरासुरान्। क्रोधाद् बाहू प्रसार्याथ प्रदुद्राव महेश्वरम् ॥ १० तमापतन्तं भगवान् संनिरीक्ष्य त्रिलोचनः । बाहुभ्यां प्रतिजग्राह करेणैकेन शंकरः ॥ ११ कराभ्यां प्रगृहीतस्य शंभुनांशुमतोऽपि हि। कराङ्गुलिभ्यो निश्चेरुरसृग्धाराः समन्ततः ॥ १२ ततो वेगेन महता अंशुमन्तं दिवाकरम्। भ्रामयामास सततं सिंहो मृगशिशुं यथा ॥ १३ भ्रामितस्यातिवेगेन नारदांशुमतोऽपि हि। भुजौ ह्रस्वत्वमापन्नौ त्रुटितस्नायुबन्धनौ ॥ १४ रुधिराप्लुतसर्वाङ्गमंशुमन्तं महेश्वरः । संनिरीक्ष्योत्ससर्जैनमन्यतोऽभिजगाम ह ॥ १५ ततस्तु पूषा विहसन् दशनानि विदर्शयन्। प्रोवाचैह्येहि कापालिन् पुनः पुनरथेश्वरम् ॥ १६ ततः क्रोधाभिभूतेन पूष्णो वेगेन शंभुना। मुष्टिनाहत्य दशनाः पातिता धरणीतले ॥ १७ भग्नदन्तस्तथा पूषा शोणिताभिप्लुताननः । पपात भुवि निःसंज्ञो वज्राहत इवाचलः ॥ १८ भगोऽभिवीक्ष्य पूषाणं पतितं रुधिरोक्षितम् । नेत्राभ्यां घोररूपाभ्यां वृषध्वजमवैक्षत ॥ १९ त्रिपुरघ्नस्ततः क्रुद्धस्तलेनाहत्य चक्षुषी । निपातयामास भुवि क्षोभयन् सर्वदेवताः ॥ २० ततो दिवाकराः सर्वे पुरस्कृत्य शतक्रतुम्। मरुद्भिश्च हुताशैश्च भयाज्जग्मुर्दिशो दश ॥ २१ प्रतियातेषु देवेषु प्रह्रादाद्या दितीश्वराः । नमस्कृत्य ततः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयो मुने ॥ २२ ततस्तं यज्ञवाटं तु शंकरो घोरचक्षुषा । ददर्श दग्धुं कोपेन सर्वांश्चैव सुरासुरान् ॥ २३ ततो निलिल्यिरे वीराः प्रणेमुर्दुद्रुवुस्तथा । भयादन्ये हरं दृष्ट्वा गता वैवस्वतक्षयम् ॥ २४ मुने ! शंकरने इसी प्रकार कुछ देवताओंको पैरोंके प्रहारसे, कुछको त्रिशूलसे और कुछको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निद्वारा नष्ट कर दिया। उसके बाद देवों एवं असुरोंका संहार करते हुए शंकरको देखकर पूषादेवता (अन्यतम सूर्य) क्रोधपूर्वक दोनों बाँहोंको फैलाकर शिवजीकी ओर दौड़े। त्रिलोचन शिवने उन्हें अपनी ओर आते देख एक ही हाथसे उनकी दोनों भुजाओंको पकड़ लिया। शिवद्वारा सूर्यके पकड़ी गयी दोनों भुजाओंकी अङ्गुलियोंसे चारों ओर रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी ॥ ९ - १२ ॥ फिर भगवान् शिव दिवाकर सूर्यदेवको अत्यन्त वेगसे ऐसे घुमाने लगे जैसे सिंह हिरण-शावकको घुमाता (दौड़ाता) है। नारदजी! अत्यन्त वेगसे घुमाये गये सूर्यकी भुजाओंके स्नायुबन्ध टूट गये और वे (स्नायुएँ) बहुत छोटी-नष्टप्राय हो गयीं। सूर्यके सभी अङ्गोंको रक्तसे लथपथ देखकर उन्हें छोड़कर शंकरजी दूसरी ओर चले गये। उसी समय हँसते एवं दाँत दिखलाते हुए पूषा देवता (बारह आदित्योंमेंसे एक सूर्य) कहने लगे- ओ कपालिन् ! आओ, इधर आओ ॥ १३-१६ ॥ इसपर क्रुद्ध रुद्रने वेगपूर्वक मुक्केसे मारकर पूषाके दाँतोंको धरतीपर गिरा दिया। इस प्रकार दाँत टूटने एवं रक्तसे लथपथ होकर पूषा देवता वज्रसे नष्ट हुए पर्वतके समान बेहोश होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार गिरे हुए पूषाको रुधिरसे लथपथ देखकर भग देवता (तृतीय सूर्यभेद) भयंकर नेत्रोंसे शिवजीको देखने लगे। इससे क्रुद्ध त्रिपुरान्तक शिवने सभी देवताओंको क्षुब्ध करते हुए हथेलीसे पीटकर भगकी दोनों आँखें पृथ्वीपर गिरा दीं ॥ १७-२० ॥ फिर क्या था ? सभी दसों सूर्य इन्द्रको आगे कर मरुद्गणों तथा अग्नियोंके साथ भयसे दसों दिशाओंमें भाग गये। मुने ! देवताओंके चले जानेपर प्रह्लाद आदि दैत्य महेश्वरको प्रणामकर अञ्जलि बाँधकर खड़े हो गये। इसके बाद शंकर उस यज्ञमण्डपको तथा सभी देवासुरोंको दग्ध करनेके लिये क्रोधपूर्ण घोर दृष्टिसे देखने लगे। इधर दूसरे वीर महादेवको देखकर भयसे जहाँ-तहाँ छिप गये। कुछ लोग प्रणाम करने लगे, कुछ भाग गये और कुछ तो भयसे ही सीधे यमपुरी पहुँच गये ॥ २१-२४ ॥