वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ५ ] दक्ष-यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २५ ततः क्रोधाभिभूतेन वीरभद्रोऽथ शंभुना। पूर्वोद्दिष्टे तदा स्थाने सायुधस्तु निवेशितः ॥ ५५ वीरभद्रमथादिश्य भद्रकालीं च शंकरः । विवेश क्रोधताम्राक्षो यज्ञवाटं त्रिशूलभृत् ॥ ५६ ततस्तु देवप्रवरे जटाधरे त्रिशूलपाणौ त्रिपुरान्तकारिणि। दक्षस्य यज्ञं विशति क्षयंकरे जातो ऋषीणां प्रवरो हि साध्वसः ॥ ५७ जटाधर (शंकर) - ने क्रोध किया। इसके बाद क्रोधसे तिलमिलाये शंकरने अस्त्रसहित वीरभद्रको पहले बतलाये स्थानपर बैठा दिया। वे त्रिशूलधर शंकर वीरभद्र तथा भद्रकालीको आदेश देकर क्रोधसे लाल आँखें किये यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए। त्रिपुर नामक राक्षसको मारनेवाले उन त्रिशूलपाणि त्रिपुरारि देवश्रेष्ठ जटाधरके दक्ष-यज्ञमें प्रवेश करते ही ऋषियोंमें भारी भय उत्पन्न हो गया ॥ ५३-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४॥ पाँचवाँ अध्याय दक्ष-यज्ञका विध्वंस, देवताओंका प्रताड़न, शंकरके कालरूप और राश्यादि रूपोंमें स्वरूप-कथन पुलस्त्य उवाच जटाधरं हरिर्दृष्ट्वा क्रोधादारक्तलोचनम् । तस्मात् स्थानादपाक्रम्य कुब्जाग्रेऽन्तर्हितः स्थितः ॥ १ वसवोऽष्टौ हरं दृष्ट्वा सुस्रुवुर्वेगतो मुने । सा तु जाता सरिच्छ्रेष्ठा सीता नाम सरस्वती ॥ २ एकादश तथा रुद्रास्त्रिनेत्रा वृषकेतनाः । कान्दिशीका लयं जग्मुः समभ्येत्यैव शंकरम् ॥ ३ विश्वेऽश्विनौ च साध्याश्च मरुतोऽनलभास्कराः । समासाद्य पुरोडाशं भक्षयन्तो महामुने ॥ ४ चन्द्रः सममृक्षगणैर्निशां समुपदर्शयन् । उत्पत्यारुह्य गगनं स्वमधिष्ठानमास्थितः ॥ ५ कश्यपाद्याश्च ऋषयो जपन्तः शतरुद्रियम् । पुष्पाञ्जलिपुटा भूत्वा प्रणताः संस्थिता मुने ॥ ६ असकृद् दक्षदयिता दृष्ट्वा रुद्रं बलाधिकम् । शक्रादीनां सुरेशानां कृपणं विललाप ह ॥ ७ ततः क्रोधाभिभूतेन शंकरेण महात्मना । तलप्रहारैरमरा बहवो विनिपातिताः ॥ ८ पुलस्त्यजी बोले- जटाधारी भगवान् शिवको क्रोधसे आँखें लाल किये देखकर भगवान् विष्णु उस स्थानसे हटकर कुब्जाग्र (ऋषिकेश) - में छिप गये। मुने! क्रुद्ध शिवको देखकर आठ वसु तेजीसे पिघलने लगे। इस कारण वहाँ सीता नामकी श्रेष्ठ नदी प्रवाहित हुई। वहाँ पूजाके लिये स्थित त्रिनेत्रधारी ग्यारहों रुद्र भयके मारे इधर-उधर भागते हुए शंकरके निकट जाकर उनमें ही लीन हो गये। महामुनि नारद ! शंकरको निकट आते देख विश्वेदेवगण, अश्विनीकुमार, साध्यवृन्द, वायु, अग्नि एवं सूर्य पुरोडाश खाते हुए भाग गये ॥ १-४ ॥ फिर तो ताराओंके साथ चन्द्रमा रात्रिको प्रकाशित करते हुए आकाशमें ऊपर जाकर अपने स्थानपर स्थित हो गये। इधर कश्यप आदि ऋषि शतरुद्रिय (मन्त्र)- का जप करते हुए अञ्जलिमें पुष्प लेकर विनीतभावसे खड़े हो गये। इन्द्रादि सभी देवताओंसे अधिक बली रुद्रको देखकर दक्ष-पत्नी अत्यन्त दीन होकर बार-बार करुण विलाप करने लगी। इधर क्रुद्ध भगवान् शंकरने थप्पड़ोंके प्रहारसे अनेक देवताओंको मार गिराया ॥ ५-८ ॥
२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ५ पादप्रहारैरपरे त्रिशूलेनापरे मुने। दृष्ट्यग्निना तथैवान्ये देवाद्याः प्रलयीकृताः ॥ ९ ततः पूषा हरं वीक्ष्य विनिघ्नन्तं सुरासुरान्। क्रोधाद् बाहू प्रसार्याथ प्रदुद्राव महेश्वरम् ॥ १० तमापतन्तं भगवान् संनिरीक्ष्य त्रिलोचनः । बाहुभ्यां प्रतिजग्राह करेणैकेन शंकरः ॥ ११ कराभ्यां प्रगृहीतस्य शंभुनांशुमतोऽपि हि। कराङ्गुलिभ्यो निश्चेरुरसृग्धाराः समन्ततः ॥ १२ ततो वेगेन महता अंशुमन्तं दिवाकरम्। भ्रामयामास सततं सिंहो मृगशिशुं यथा ॥ १३ भ्रामितस्यातिवेगेन नारदांशुमतोऽपि हि। भुजौ ह्रस्वत्वमापन्नौ त्रुटितस्नायुबन्धनौ ॥ १४ रुधिराप्लुतसर्वाङ्गमंशुमन्तं महेश्वरः । संनिरीक्ष्योत्ससर्जैनमन्यतोऽभिजगाम ह ॥ १५ ततस्तु पूषा विहसन् दशनानि विदर्शयन्। प्रोवाचैह्येहि कापालिन् पुनः पुनरथेश्वरम् ॥ १६ ततः क्रोधाभिभूतेन पूष्णो वेगेन शंभुना। मुष्टिनाहत्य दशनाः पातिता धरणीतले ॥ १७ भग्नदन्तस्तथा पूषा शोणिताभिप्लुताननः । पपात भुवि निःसंज्ञो वज्राहत इवाचलः ॥ १८ भगोऽभिवीक्ष्य पूषाणं पतितं रुधिरोक्षितम् । नेत्राभ्यां घोररूपाभ्यां वृषध्वजमवैक्षत ॥ १९ त्रिपुरघ्नस्ततः क्रुद्धस्तलेनाहत्य चक्षुषी । निपातयामास भुवि क्षोभयन् सर्वदेवताः ॥ २० ततो दिवाकराः सर्वे पुरस्कृत्य शतक्रतुम्। मरुद्भिश्च हुताशैश्च भयाज्जग्मुर्दिशो दश ॥ २१ प्रतियातेषु देवेषु प्रह्रादाद्या दितीश्वराः । नमस्कृत्य ततः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयो मुने ॥ २२ ततस्तं यज्ञवाटं तु शंकरो घोरचक्षुषा । ददर्श दग्धुं कोपेन सर्वांश्चैव सुरासुरान् ॥ २३ ततो निलिल्यिरे वीराः प्रणेमुर्दुद्रुवुस्तथा । भयादन्ये हरं दृष्ट्वा गता वैवस्वतक्षयम् ॥ २४ मुने ! शंकरने इसी प्रकार कुछ देवताओंको पैरोंके प्रहारसे, कुछको त्रिशूलसे और कुछको अपने तृतीय नेत्रकी अग्निद्वारा नष्ट कर दिया। उसके बाद देवों एवं असुरोंका संहार करते हुए शंकरको देखकर पूषादेवता (अन्यतम सूर्य) क्रोधपूर्वक दोनों बाँहोंको फैलाकर शिवजीकी ओर दौड़े। त्रिलोचन शिवने उन्हें अपनी ओर आते देख एक ही हाथसे उनकी दोनों भुजाओंको पकड़ लिया। शिवद्वारा सूर्यके पकड़ी गयी दोनों भुजाओंकी अङ्गुलियोंसे चारों ओर रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी ॥ ९ - १२ ॥ फिर भगवान् शिव दिवाकर सूर्यदेवको अत्यन्त वेगसे ऐसे घुमाने लगे जैसे सिंह हिरण-शावकको घुमाता (दौड़ाता) है। नारदजी! अत्यन्त वेगसे घुमाये गये सूर्यकी भुजाओंके स्नायुबन्ध टूट गये और वे (स्नायुएँ) बहुत छोटी-नष्टप्राय हो गयीं। सूर्यके सभी अङ्गोंको रक्तसे लथपथ देखकर उन्हें छोड़कर शंकरजी दूसरी ओर चले गये। उसी समय हँसते एवं दाँत दिखलाते हुए पूषा देवता (बारह आदित्योंमेंसे एक सूर्य) कहने लगे- ओ कपालिन् ! आओ, इधर आओ ॥ १३-१६ ॥ इसपर क्रुद्ध रुद्रने वेगपूर्वक मुक्केसे मारकर पूषाके दाँतोंको धरतीपर गिरा दिया। इस प्रकार दाँत टूटने एवं रक्तसे लथपथ होकर पूषा देवता वज्रसे नष्ट हुए पर्वतके समान बेहोश होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार गिरे हुए पूषाको रुधिरसे लथपथ देखकर भग देवता (तृतीय सूर्यभेद) भयंकर नेत्रोंसे शिवजीको देखने लगे। इससे क्रुद्ध त्रिपुरान्तक शिवने सभी देवताओंको क्षुब्ध करते हुए हथेलीसे पीटकर भगकी दोनों आँखें पृथ्वीपर गिरा दीं ॥ १७-२० ॥ फिर क्या था ? सभी दसों सूर्य इन्द्रको आगे कर मरुद्गणों तथा अग्नियोंके साथ भयसे दसों दिशाओंमें भाग गये। मुने ! देवताओंके चले जानेपर प्रह्लाद आदि दैत्य महेश्वरको प्रणामकर अञ्जलि बाँधकर खड़े हो गये। इसके बाद शंकर उस यज्ञमण्डपको तथा सभी देवासुरोंको दग्ध करनेके लिये क्रोधपूर्ण घोर दृष्टिसे देखने लगे। इधर दूसरे वीर महादेवको देखकर भयसे जहाँ-तहाँ छिप गये। कुछ लोग प्रणाम करने लगे, कुछ भाग गये और कुछ तो भयसे ही सीधे यमपुरी पहुँच गये ॥ २१-२४ ॥
६- नर-नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम-दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन
| २८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५ |
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| विशाखांशमनुराधा ज्येष्ठा भौमगृहं त्विदम्।<br>द्वितीयं वृश्चिको राशिर्मेढ्रं कालस्वरूपिणः॥ ३८<br><br>मूलं पूर्वोत्तरांशश्च देवाचार्यगृहं धनुः।<br>ऊरुयुगलमीशस्य अमरर्षे प्रगीयते॥ ३९<br><br>उत्तरांशास्त्रयो ऋक्षं श्रवणं मकरो मुने।<br>धनिष्ठार्थं शनिक्षेत्रं जानुनी परमेष्ठिनः॥ ४०<br><br>धनिष्ठार्धं शतभिषा प्रौष्ठपद्यांशकत्रयम्।<br>सौरेः सद्मापरमिदं कुम्भो जङ्घे च विश्रुते॥ ४१ | विशाखाका एक चरण, सम्पूर्ण अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्र, मङ्गलका द्वितीय क्षेत्र वृश्चिक राशि कालरूपी महादेवका उपस्थ है। सम्पूर्ण मूल, पूरा पूर्वाषाढ और उत्तराषाढकी प्रथम चरणवाली धनु राशि जो बृहस्पतिका क्षेत्र है, महेश्वरके दोनों ऊरु हैं। मुने! उत्तराषाढ़के शेष तीन चरण, सम्पूर्ण श्रवण नक्षत्र और धनिष्ठाके दो पूर्व चरणकी मकर राशि शनिका क्षेत्र और परमेष्ठी महेश्वरके दोनों घुटने हैं। धनिष्ठाके दो चरण, सम्पूर्ण शतभिष और पूर्वभाद्रपदके तीन चरणवाली कुम्भ राशि शनिका द्वितीय गृह और शिवकी दो जंघाएँ हैं॥ ३८—४१॥ | | प्रौष्ठपद्यांशमेकं तु उत्तरा रेवती तथा।<br>द्वितीयं जीवसदनं मीनस्तु चरणावुभौ॥ ४२<br><br>एवं कृत्वा कालरूपं त्रिनेत्रो<br>यज्ञं क्रोधान्मार्गणैराजघान।<br>विद्धश्चासौ वेदनाबुद्धिमुक्तः<br>खे संतस्थौ तारकाभिश्चिताङ्गः॥ ४३ | पूर्वाभाद्रपदके शेष एक चरण, सम्पूर्ण उत्तरभाद्रपद और सम्पूर्ण रेवती नक्षत्रोंवाला बृहस्पतिका द्वितीय क्षेत्र एवं मीन राशि उनके दो चरण हैं। इस प्रकार कालरूप धारणकर शिवने क्रोधपूर्वक हरणिरूपधारी यज्ञको बाणोंसे मारा। उसके बाद बाणोंसे विद्ध होकर, किंतु वेदनाकी अनुभूति न करता हुआ, वह यज्ञ ताराओंसे घिरे शरीरवाला होकर आकाशमें स्थित हो गया॥ ४२-४३॥ | | नारद उवाच<br>राशयो गदिता ब्रह्मंस्त्वया द्वादश वै मम।<br>तेषां विशेषतो ब्रूहि लक्षणानि स्वरूपतः॥ ४४ | नारदजीने कहा— ब्रह्मन्! आपने मुझसे बारहौं राशियोंका वर्णन किया। अब विशेषरूपसे उनके स्वरूपके अनुसार लक्षणोंको बतलायें॥ ४४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>स्वरूपं तव वक्ष्यामि राशीनां शृणु नारद।<br>यादृशा यत्र संचारा यस्मिन् स्थाने वसन्ति च॥ ४५<br><br>मेषः समानमूर्तिश्च अजाविकधनादिषु।<br>संचारस्थानमेवास्य धान्यरत्नाकरादिषु॥ ४६<br><br>नवशाद्वलसंछन्नवसुधायां च सर्वशः।<br>नित्यं चरति फुल्लेषु सरसां पुलिनेषु च॥ ४७<br><br>वृषः सदृशरूपो हि चरते गोकुलादिषु।<br>तस्याधिवासभूमिस्तु कृषीवलधराश्रयः॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आपको मैं राशियोंका स्वरूप बतलाता हूँ; सुनिये। वे जैसी हैं तथा जहाँ संचार और निवास करती हैं वह सभी वर्णित करता हूँ। मेष राशि भेड़के समान आकारवाली है। बकरी, भेड़, धन-धान्य एवं रत्नाकरादि इसके संचार-स्थान हैं तथा नवदूर्वासे आच्छादित समग्र पृथ्वी एवं पुष्पित वनस्पतियोंसे युक्त सरोवरोंके पुलिनोंमें यह नित्य संचरण करती है। वृषभके समान रूपयुक्त वृषराशि गोकुलादिमें विचरण करती है तथा कृषकोंकी भूमि इसका निवास-स्थान है॥ ४५—४८॥ | | स्त्रीपुंसयोः समं रूपं शय्यासनपरिग्रहः।<br>वीणावाद्यधृङ् मिथुनं गीतनर्तकशिल्पिषु॥ ४९<br><br>स्थितः क्रीडारतिर्नित्यं विहारावनिरेस्य तु।<br>मिथुनं नाम विख्यातं राशिर्द्वैधात्मकः स्थितः॥ ५० | मिथुन राशि एक स्त्री और एक पुरुषके साथ-साथ रहनेके समान रूपवाली है। यह शय्या और आसनोंपर स्थित है। पुरुष-स्त्रीके हाथोंमें वीणा एवं (अन्य) वाद्य हैं। इस राशिका संचरण गानेवालों, नाचनेवालों एवं शिल्पियोंमें होता है। इस द्विखभाव राशिको मिथुन कहते हैं। इस राशिका निवास क्रीडास्थल एवं |
अध्याय ५ ] दक्ष-यज्ञका विध्वंस एवं देवताओंका प्रताड़न २९ कर्कः कुलीरेण समः सलिलस्थः प्रकीर्तितः । केदारवापीपुलिने विविक्तावनिरेव च ॥ ५१ सिंहस्तु पर्वतारण्यदुर्गकन्दरभूमिषु । वसते व्याधपल्लीषु गह्वरेषु गुहासु च ॥ ५२ ब्रीहिप्रदीपिककरा नावारूढा च कन्यका। चरते स्त्रीरतिस्थाने वसते नड्वलेषु च ॥ ५३ तुलापाणिश्च पुरुषो वीथ्यापणविचारकः । नगराध्वानशालासु वसते तत्र नारद ॥ ५४ श्वभ्रवल्मीकसंचारी वृश्चिको वृश्चिकाकृतिः । विषगोमयकीटादिपाषाणादिषु संस्थितः ॥ ५५ धनुस्तुरङ्गजघनो दीप्यमानो धनुर्धरः। वाजिशूरास्त्रविद्वीरः स्थायी गजरथादिषु ॥ ५६ मृगास्यो मकरो ब्रह्मन् वृषस्कन्धेक्षणाङ्गजः । मकरोऽसौ नदीचारी वसते च महोदधौ ॥ ५७ रिक्तकुम्भश्च पुरुषः स्कन्धधारी जलाप्लुतः । द्यूतशालाचरः कुम्भः स्थायी शौण्डिकसद्मसु ॥ ५८ मीनद्वयमथासक्तं मीनस्तीर्थाब्धिसंचरः । वसते पुण्यदेशेषु देवब्राह्मणसद्मसु ॥ ५९ लक्षणा गदितास्तुभ्यं मेषादीनां महामुने । न कस्यचित् त्वयाख्येयं गुह्यमेतत्पुरातनम् ॥ ६० एतन् मया ते कथितं सुरर्षे यथा त्रिनेत्रः प्रममाथ यज्ञम्। पुण्यं पुराणं परमं पवित्र- माख्यातवान्यापहरं शिवं च ॥ ६१ विहार-भूमियोंमें होता है। कर्क राशि केकड़ेके रूपके समान रूपवाली है एवं जलमें रहनेवाली है। जलसे पूर्ण क्यारी एवं नदी-तीर अथवा बालुका एवं एकान्त भूमि इसके रहनेके स्थान हैं। सिंह राशिका निवास वन, पर्वत, दुर्गमस्थान, कन्दरा, व्याधोंके स्थान, गुफा आदि होता है ॥ ४९-५२॥ कन्या राशि अन्न एवं दीपक हाथमें लिये हुए है तथा नौकापर आरूढ़ है। यह स्त्रियोंके रतिस्थान और सरपत, कण्डा आदिमें विचरण करती है। नारद ! तुला राशि हाथमें तुला लिये हुए पुरुषके रूपमें गलियों और बाजारोंमें विचरण करती है तथा नगरों, मार्गों एवं भवनोंमें निवास करती है। वृश्चिक राशिका आकार बिच्छू-जैसा है। यह गड्ढे एवं वल्मीक आदिमें विचरण करती है। यह विष, गोबर, कीट एवं पत्थर आदिमें भी निवास करती है। धनु राशिकी जंघा घोड़ेके समान है। यह ज्योतिःस्वरूप एवं धनुष लिये है। यह घुड़सवारी, वीरताके कार्य एवं अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता तथा शूर है। गज एवं रथ आदिमें इसका निवास होता है ॥ ५३-५६॥ ब्रह्मन् ! मकर राशिका मुख मृगके मुख-सदृश एवं कंधे वृषके कंधोंके तुल्य तथा नेत्र हाथीके नेत्रके समान हैं। यह राशि नदीमें विचरण करती तथा समुद्रमें विश्राम करती है। कुम्भ राशि रिक्त घड़ेको कंधेपर लिये जलसे भीगे पुरुषके समान है। इसका संचार-स्थान द्यूतगृह एवं सुरालय (मद्यशाला) है। मीन राशि दो संयुक्त मछलियोंके आकारवाली है। यह तीर्थस्थान एवं समुद्र-देशमें संचरण करती है। इसका निवास पवित्र देशों, देवमन्दिरों एवं ब्राह्मणोंके घरोंमें होता है। महामुने ! मैंने आपको मेषादि राशियोंका लक्षण बतलाया। आप इस प्राचीन रहस्यको किसी अपात्रसे न बतलाइयेगा। देवर्षे ! भगवान् शिवने जिस प्रकार यज्ञको प्रमथित किया, उसका मैंने आपसे वर्णन कर दिया। इस प्रकार मैंने आपको श्रेयस्कर, परम पवित्र, पापहारी एवं कल्याणकारी अत्यन्त पुराना पुराण-आख्यान सुनाया ॥ ५७-६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
| ३० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६ |
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छठा अध्याय
नर-नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम-दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>हृद्भवो ब्रह्मणो योऽसौ धर्मो दिव्यवपुर्मुने।<br>दाक्षायणी तस्य भार्या तस्यामजनयत्सुतान्॥ १<br>हरिं कृष्णं च देवर्षे नारायणनरौ तथा।<br>योगाभ्यासरतो नित्यं हरिकृष्णौ बभूवतुः॥ २<br>नरनारायणौ चैव जगतो हितकाम्यया।<br>तप्येतां च तपः सौम्यौ पुराणावृषिसत्तमौ॥ ३<br>प्रालेयाद्रिं समागम्य तीर्थे बदरिकाश्रमे।<br>गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले— मुने! ब्रह्माजीके हृदयसे जो दिव्यदेहधारी धर्म प्रकट हुआ था, उसने दक्षकी पुत्री ‘मूर्ति’ नामकी भार्यासे हरि, कृष्ण, नर और नारायण नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया।* देवर्षे! इनमें हरि और कृष्ण ये दो तो नित्य योगाभ्यासमें निरत हो गये और पुरातन ऋषि शान्तमना नर तथा नारायण संसारके कल्याणके लिये हिमालय पर्वतपर जाकर बदरिकाश्रम तीर्थमें गङ्गाके निर्मल तटपर (परब्रह्मका नाम ॐकारका जप करते हुए) तप करने लगे॥ १–४॥ |
| नरनारायणाभ्यां च जगदेतच्चराचरम्।<br>तापितं तपसा ब्रह्मञ्छक्रः क्षोभं तदा ययौ॥ ५<br>संक्षुब्धस्तपसा ताभ्यां क्षोभणाय शतक्रतुः।<br>रम्भाद्याप्सरसः श्रेष्ठाः प्रेषयत्तन् महाश्रमम्॥ ६<br>कन्दर्पश्च सुदुर्धर्षश्चूताङ्कुरमहायुधः।<br>समं सहचरेणैव वसन्तेनाश्रमं गतः॥ ७<br>ततो माधवकन्दर्पौ ताश्चैवाप्सरसो वराः।<br>बदर्याश्रममागम्य विचिक्रीडुर्यथेच्छया॥ ८ | ब्रह्मन्! नर-नारायणकी दुष्कर तपस्यासे सारा स्थावर-जंगमात्मक यह जगत् परितप्त हो गया। इससे इन्द्र विक्षुब्ध हो उठे। उन दोनोंकी तपस्यासे अत्यन्त व्यग्र इन्द्रने उन्हें मोहित करनेके लिये रम्भा आदि श्रेष्ठ अप्सराओंको उनके विशाल आश्रममें भेजा। कामदेवके आयुधोंमें अशोक, आम्रादिकी मंजरियाँ विशेष प्रभावक हैं। इन्हें तथा अपने सहयोगी वसन्त-ऋतुको साथ लेकर वह भी उस आश्रममें गया। अब वे वसन्त, कामदेव तथा श्रेष्ठ अप्सराएँ—ये सब बदरिकाश्रममें जाकर निर्बाध क्रीड़ा करने लग गये॥ ५–८॥ |
| ततो वसन्ते संप्राप्ते किंशुका ज्वलनप्रभाः।<br>निष्पत्राः सततं रेजुः शोभयन्तो धरातलम्॥ ९<br>शिशिरं नाम मातङ्गं विदार्य नखरैरिव।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १०<br>मया तुषारौघकरी निर्जितः स्वेन तेजसा।<br>तमेव हसतेत्युच्चैः वसन्तः कुन्दकुड्मलैः॥ ११<br>वनानि कर्णिकाराणां पुष्पितानि विरेजिरे।<br>यथा नरेन्द्रपुत्राणि कनकाभरणानि हि॥ १२ | तब वसन्त-ऋतुके आ जानेपर अग्नि-शिखाके सदृश कान्तिवाले पलाश पत्रहीन होकर रात-दिन पृथिवीकी शोभा बढ़ाते हुए सुशोभित होने लगे। मुने! वसन्तरूपी सिंह मानो पलाश-पुष्परूपी नखोंसे शिशिररूपी गजराजको विदीर्ण कर वहाँ अपना साम्राज्य जमा चुका था। वह सोचने लगा—मैंने अपने तेजसे शीतसमूहरूपी हाथीको जीत लिया है और वह कुन्दकी कलियोंके बहाने उसका उपहास भी करने लगा है। इधर सुवर्णके अलंकारोंसे मण्डित राजकुमारोंके समान पुष्पित कचनार-अमलतासके वन सुशोभित होने लगे॥ ९–१२॥ |
* यह बात भागवत २।७।६ आदिमें विशेष स्पष्टरूपसे कही गयी है। जिज्ञासु वहाँ भी देखें।
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३१ तेषामनु तथा नीपाः किङ्करा इव रेजिरे। स्वामिसंलब्धसंमाना भृत्या राजसुतानिव ॥ १३ रक्ताशोकवना भान्ति पुष्पिताः सहसोज्ज्वलाः। भृत्या वसन्तनृपतेः संग्रामे सृक्प्लुता इव ॥ १४ मृगवृन्दाः पिञ्जरिता राजन्ते गहने वने। पुलकाभिर्वृता यद्वत् सज्जनाः सुहृदागमे ॥ १५ मञ्जरीभिर्विराजन्ते नदीकूलेषु वेतसाः। वक्तुकामा इवाङ्गुल्या कोऽस्माकं सदृशो नगः ॥ १६ रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका । नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना ॥ १७ नीलेन्दीवरनेत्रा च ब्रह्मन् बिल्वफलस्तनी । प्रफुल्लकुन्ददशना मञ्जरीकरशोभिता ॥ १८ बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्दुवारनखाद्भुता । पुंस्कोकिलस्वना दिव्या अङ्कोलवसना शुभा ॥ १९ बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वरनूपुरा । प्राग्वंशरसना ब्रह्मन् मत्तहंसगतिस्तथा ॥ २० पुत्रजीवांशुका भृङ्गरोमराजिविराजिता । वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे ॥ २१ ततो नारायणो दृष्ट्वा आश्रमस्यानवद्यताम् । समीक्ष्य च दिशः सर्वास्ततोऽनङ्गमपश्यत ॥ २२ नारद उवाच कोऽसावनङ्गो ब्रह्मर्षे तस्मिन् बदरिकाश्रमे । यं ददर्श जगन्नाथो देवो नारायणोऽव्ययः ॥ २३ पुलस्त्य उवाच कन्दर्पो हर्षतनयो योऽसौ कामो निगद्यते । स शंकरेण संदग्धो ह्यनङ्गत्वमुपागतः ॥ २४ नारद उवाच किमर्थं कामदेवोऽसौ देवदेवेन शंभुना । दग्धस्तु कारणे कस्मिन्नेतद्व्याख्यातुमर्हसि ॥ २५ पुलस्त्य उवाच यदा दक्षसुता ब्रह्मन् सती याता यमक्षयम् । विनाश्य दक्षयज्ञं तं विचचार त्रिलोचनः ॥ २६ ततो वृषध्वजं दृष्ट्वा कन्दर्पः कुसुमायुधः । अपत्नीकं तदाऽस्त्रेण उन्मादेनाभ्यताडयत् ॥ २७ जैसे राजपुत्रोंके पीछे उनके द्वारा सम्मानित सेवक खड़े रहते हैं, वैसे ही उन (वर्णित-वनों)-के पीछे- पीछे कदम्बवृक्ष सुशोभित हो रहे थे। इसी प्रकार लाल अशोक आदिके समूह भी सहसा पुष्पित एवं उद्भासित हो सुशोभित होने लगे। लगता था मानो ऋतुराज वसन्तके अनुयायी युद्धमें रक्तसे लथपथ हो रहे हों। घने वनमें पीले रंगके हरिण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार सुहृद्के आनेसे सज्जन (आनन्दसे) पुलकित होकर सुशोभित होते हैं। नदीके तटोंपर अपनी मंजरियोंके द्वारा वेतस ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो वे अंगुलियोंके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि हमारे सदृश अन्य कौन वृक्ष है ॥ १३-१६ ॥ देवर्षे ! जो दिव्य पतली एवं यौवनसे भरी वसन्त- लक्ष्मी उस बदरिकाश्रममें प्रकट हुई थी, उसके मानो रक्ताशोक ही हाथ, पलाश ही चरण, नीला शोक केश- पाश, विकसित कमल ही मुख और नीलकमल ही नेत्र थे। उसके बिल्वफल मानों स्तन, कुन्दपुष्प दन्त, मञ्जरी हाथ, दोपहरियाफूल अधर, सिन्दुवार नख, नर कोयलकी काकली (बोली) स्वर, अंकोल वस्त्र, मयूरयूथ आभूषण, सारस नूपुरस्वरूप और आश्रमके शिखर करधनी थे। उसके मत्त हंस गति, पुत्रजीव ऊर्ध्व वस्त्र और भ्रमर मानो रोमावलीरूपमें विराजित थे। तब नारायणने आश्रमकी अद्भुत रमणीयता देखकर सभी दिशाओंकी ओर देखा और फिर कामदेवको भी देखा ॥ १७-२२ ॥ नारदजीने पूछा- ब्रह्मर्षे ! जिसे अव्यय जगन्नाथ नारायणने बदरिकाश्रममें देखा था, वह अनङ्ग (काम) कौन है ? ॥ २३ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- यह कंदर्प हर्षका पुत्र है, इसे ही काम कहा जाता है। शंकर (-की नेत्राग्नि)-द्वारा भस्म होकर वह 'अनङ्ग' हो गया ॥ २४ ॥ नारदजीने पूछा- पुलस्त्यजी ! आप यह बतलायें कि देवाधिदेव शंकरने कामदेवको किस कारणसे भस्म किया ? ॥ २५ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- ब्रह्मन् ! दक्ष-पुत्री सतीके प्राण-त्याग करनेपर शिवजी दक्ष-यज्ञका ध्वंस कर (जहाँ-तहाँ) विचरण करने लगे। तब शिवजीको स्त्री- रहित देखकर पुष्पास्त्रवाले कामदेवने उनपर अपना 'उन्मादन' नामक अस्त्र छोड़ा। इस उन्मादन-बाणसे
३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ ततो हरः शरेणाथ उन्मादेनाशु ताडितः। विचचार मदोन्मत्तः काननानि सरांसि च ॥ २८ स्मरन् सतीं महादेवस्तथोन्मादेन ताडितः। न शर्म लेभे देवर्षे बाणविद्ध इव द्विपः ॥ २९ ततः पपात देवेशः कालिन्दीसरितं मुने। निमग्ने शंकरे आपो दग्धाः कृष्णत्वमागताः ॥ ३० तदाप्रभृति कालिन्द्या भृङ्गाञ्जननिभं जलम्। आस्यन्दत् पुण्यतीर्था सा केशपाशमिवावनेः ॥ ३१ ततो नदीषु पुण्यासु सरस्सु च नदेषु च। पुलिनेषु च रम्येषु वापीषु नलिनीषु च ॥ ३२ पर्वतेषु च रम्येषु काननेषु च सानुषु। विचरन् स्वेच्छया नैव शर्म लेभे महेश्वरः ॥ ३३ क्षणं गायति देवर्षे क्षणं रोदिति शंकरः। क्षणं ध्यायति तन्वङ्गीं दक्षकन्यां मनोरमाम् ॥ ३४ ध्यात्वा क्षणं प्रस्वपिति क्षणं स्वप्नायते हरः। स्वप्ने तथे॒दं गदति तां दृष्ट्वा दक्षकन्यकाम् ॥ ३५ निर्घृणे तिष्ठ किं मूढे त्यजसे मामनिन्दिते। मुग्धे त्वया विरहितो दग्धोऽस्मि मदनाग्निना ॥ ३६ सति सत्यं प्रकुपिता मा कोपं कुरु सुन्दरि। पादप्रणामावनतमभिभाषितुमर्हसि ॥ ३७ श्रूयसे दृश्यसे नित्यं स्पृश्यसे वन्द्यसे प्रिये। आलिङ्ग्यसे च सततं किमर्थं नाभिभाषसे ॥ ३८ विलपन्तं जनं दृष्ट्वा कृपा कस्य न जायते। विशेषतः पतिं बाले ननु त्वमतिनिर्घृणा ॥ ३९ त्वयोक्तानि वचांस्येवं पूर्वं मम कृशोदरि। विना त्वया न जीवेयं तदसत्यं त्वया कृतम् ॥ ४० एहोहि कामसंतप्तं परिष्वज सुलोचने। नान्यथा नश्यते तापः सत्येनापि शपे प्रिये ॥ ४१ इत्थं विलप्य स्वप्नान्ते प्रतिबुद्धस्तु तत्क्षणात्। उत्कूजति तथारण्ये मुक्तकण्ठं पुनः पुनः ॥ ४२ आहत होकर शिवजी उन्मत्त होकर वनों और सरोवरोंमें घूमने लगे। देवर्षे ! बाणविद्ध गजके समान उन्मादसे व्यथित महादेव सतीका स्मरण करते हुए बड़े अशान्त हो रहे थे—उन्हें चैन नहीं था ॥ २६–२९ ॥ मुने ! उसके बाद शिवजी यमुना नदीमें कूद पड़े। उनके जलमें निमज्जन करनेसे उस नदीका जल काला हो गया। उस समयसे कालिन्दी नदीका जल भृंग और अंजनके सदृश कृष्णवर्णका हो गया एवं वह पवित्र तीर्थोंवाली नदी पृथ्वीके केशपाशके सदृश प्रवाहित होने लगी। उसके बाद पवित्र नदियों, सरोवरों, नदों, रमणीय नदी-तटों, वापियों, कमलवनों, पर्वतों, मनोहर काननों तथा पर्वत-शृङ्गोंपर स्वेच्छापूर्वक विचरण करते हुए भगवान् शिव कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सके ॥ ३०-३३। देवर्षे ! वे कभी गाते, कभी रोते और कभी कृशाङ्गी सुन्दरी सतीका ध्यान करते। ध्यान करके कभी सोते और कभी स्वप्न देखने लगते थे; स्वप्नकालमें सतीको देखकर वे इस प्रकार कहते थे—निर्दये ! रुको, हे मूढे ! मुझे क्यों छोड़ रही हो ? हे अनिन्दिते ! हे मुग्धे ! तुम्हारे विरहमें मैं कामाग्निसे दग्ध हो रहा हूँ। हे सति ! क्या तुम वस्तुतः क्रुद्ध हो ? सुन्दरि ! क्रोध मत करो। मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत होकर प्रणाम करता हूँ। तुम्हें मेरे साथ बात तो करनी ही चाहिये ॥ ३४-३७॥ प्रिये ! मैं सतत तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ, तुम्हें देखता हूँ, तुम्हारा स्पर्श करता हूँ, तुम्हारी वन्दना करता हूँ और तुम्हारा परिष्वङ्ग करता हूँ। तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो ? बाले ! विलाप करनेवाले व्यक्तिको देखकर किसे दया नहीं उत्पन्न होती ? विशेषतः अपने पतिको विलाप करता देखकर तो किसे दया नहीं आती ? निश्चय ही तुम अति निर्दयी हो । सूक्ष्मकटिवाली ! तुमने पहले मुझसे कहा था कि तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रहूँगी। उसे तुमने असत्य कर दिया। सुलोचने ! आओ, आओ; कामसन्तप्त मुझे आलिङ्गित करो। प्रिये ! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि अन्य किसी प्रकार मेरा ताप नहीं शान्त होगा ॥ ३८-४१॥ इस प्रकार वे विलाप कर स्वप्नके अन्तमें उठकर वनमें बार-बार रोने लगे। इस प्रकार मुक्तकण्ठसे
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् वामन
पृष्ठ कूर्म
त्वचा वामन
अंगों पर अंकित पुराण-नाम:
- मस्तक: ब्रह्म
- कण्ठ: ब्रह्माण्ड, पद्म
- वक्ष/हृदय: मत्स्य, स्कन्द, गरुड़
- भुजाएँ: विष्णु, शिव
- कटि/नाभि: नारद
- ऊरु/वस्त्र: भागवत, भागवत, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त
- चरण: लिङ्ग, मार्कण्डेय, अग्नि, वाराह
गीताप्रेस, गोरखपुर
वामनावतारी भगवान् विष्णु
दक्ष-यज्ञका विध्वंस
[चित्र: गीताप्रेस, गोरखपुर]
७- उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग—नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम
Deolalikar
गीताप्रेस, गोरखपुर
चतुर्मुख ब्रह्मा
शिव-विवाह
गीताप्रेस, गोरखपुर
गीताप्रेस, गोरखपुर
मङ्गलायतन भगवान् विनायक
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् कार्तिकेय
गीताप्रेस, गोरखपुर जगन्नाथप्र.
मन्दराचलपर अवस्थित भगवान् शङ्कर
८- प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३३ तं कूजमानं विलपन्तमारात् समीक्ष्य कामो वृषकेतनं हि। विव्याध चापं तरसा विनाम्य संतापनाम्ना तु शरेण भूयः ॥ ४३ संतापनास्त्रेण तदा स विद्धो भूयः स संतप्ततरो बभूव। संतापयँश्चापि जगत्समग्रं फूत्कृत्य फूत्कृत्य विवासते स्म॥ ४४ तं चापि भूयो मदनो जघान विजृम्भणास्त्रेण ततो विजृम्भे। ततो भृशं कामशरैर्विदुन्नो विजृम्भमाणः परितो भ्रमंश्च ॥ ४५ ददर्श यक्षाधिपतेस्तनूजं पाञ्चालिकं नाम जगत्प्रधानम्। दृष्ट्वा त्रिनेत्रो धनदस्य पुत्रं पार्श्वं समभ्येत्य वचो बभाषे। भ्रातृव्य वक्ष्यामि वचो यदद्य तत् त्वं कुरुष्वामितविक्रमोऽसि ॥ ४६ पाञ्चालिक उवाच यन्नाथ मां वक्ष्यसि तत्करिष्ये सुदुष्करं यद्यपि देवसंघैः । आज्ञापयस्वांतुलवीर्य शंभो दासोऽस्मि ते भक्तियुतस्तथेश ॥ ४७ ईश्वर उवाच नाशं गतायां वरदाम्बिकायां कामाग्निना प्लुष्टसुविग्रहोऽस्मि । विजृम्भणोन्मादशरैर्विभिन्नो धृतिं न विन्दामि रतिं सुखं वा ॥ ४८ विजृम्भणं पुत्र तथैव ताप- मुन्मादमुग्रं मदनप्रणुन्नम् । नान्यः पुमान् धारयितुं हि शक्तो मुक्त्वा भवन्तं हि ततः प्रतीच्छ ॥ ४९ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन यक्षः प्रतीच्छत् स विजृम्भणादीन् । तोषं जगामाशु ततस्त्रिशूली तुष्टस्तदैवं वचनं बभाषे ॥ ५० हर उवाच यस्मात्त्वया पुत्र सुदुर्धराणि विजृम्भणादीनि प्रतीच्छितानि । विलाप करते हुए भगवान् शंकरको दूरसे देखकर कामने अपना धनुष झुका (चढ़ा)-कर पुनः वेगसे उन्हें संतापक अस्त्रसे वेध डाला। अब वे इससे विद्ध होकर और भी अधिक संतप्त हो गये एवं मुखसे बारंबार (विलख) फूत्कार कर सम्पूर्ण विश्वको दुःखी करते हुए जैसे-तैसे समय बिताने लगे। फिर कामने उनपर विजृम्भण नामक अस्त्रसे प्रहार किया। इससे उन्हें जँभाई आने लगी। अब कामके बाणोंसे विशेष पीड़ित होकर जँभाई लेते हुए वे चारों ओर घूमने लगे। इसी समय उन्होंने कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकको देखा और उसको देखकर उसके पास जाकर त्रिनेत्र शंकरने यह बात कही - भ्रातृव्य ! तुम अमित विक्रमशाली हो, मैं जो आज बात कहता हूँ तुम उसे करो ॥ ४२-४६ ॥ पाञ्चालिकने कहा - स्वामिन् ! आप जो कहेंगे, देवताओंद्वारा सुदुष्कर होनेपर भी उसे मैं करूँगा। हे अतुल बलशाली शिव ! आप आज्ञा करें। ईश ! मैं आपका श्रद्धालु भक्त एवं दास हूँ ॥ ४७ ॥ भगवान् शिव बोले - वरदायिनी अम्बिका (सती)-के नष्ट होनेसे मेरा सुन्दर शरीर कामाग्निसे अत्यन्त दग्ध हो रहा है। कामके विजृम्भण और उन्माद शरोंसे विद्ध होनेसे मुझे धैर्य, रति या सुख नहीं प्राप्त हो रहा है। पुत्र ! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष, कामदेवसे प्रेरित विजृम्भण, संतापन और उन्माद नामक उग्र अस्त्र सहन करनेमें समर्थ नहीं है। अतः तुम इन्हें ग्रहण कर लो ॥ ४८-४९॥ पुलस्त्यजी बोले - भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर उस यक्ष (कुबेर-पुत्र पाञ्चालिक)-ने विजृम्भण आदि सभी अस्त्रोंको उनसे ले लिया। इससे त्रिशूलीको तत्काल संतोष प्राप्त हो गया और प्रसन्न होकर उन्होंने उससे ये वचन कहे - ॥ ५० ॥ भगवान् महादेवजी बोले- पुत्र ! तुमने अति भयंकर विजृम्भण आदि अस्त्रोंको ग्रहण कर लिया,
३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ तस्माद्वरं त्वां प्रतिपूजनाय दास्यामि लोकस्य च हास्यकारि ॥ ५१ यस्त्वां यदा पश्यति चैत्रमासे स्पृशेनरो वार्चयते च भक्त्या। वृद्धोऽथ बालोऽथ युवाथ योषित् सर्वे तदोन्मादधरा भवन्ति ॥ ५२ गायन्ति नृत्यन्ति रमन्ति यक्ष वाद्यानि यत्नादपि वादयन्ति। तवाग्रतो हास्यवचोऽभिरक्ता भवन्ति ते योग्ययुतास्तु ते स्युः ॥ ५३ ममैव नाम्ना भविताऽसि पूज्यः पाञ्चालिकेशः प्रथितः पृथिव्याम्। मम प्रसादाद् वरदो नराणां भविष्यसे पूज्यतमोऽभिगच्छ ॥ ५४ इत्येवमुक्तो विभुना स यक्षो जगाम देशान् सहसैव सर्वान्। कालञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्यो देशो हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः ॥ ५५ तस्मिन् सुपुण्ये विषये निविष्टो रुद्रप्रसादादभिपूज्यतेऽसौ । तस्मिन् प्रयाते भगवांस्त्रिनेत्रो देवोऽपि विन्ध्यं गिरिमभ्यगच्छत् ॥ ५६ तत्रापि मदनो गत्वा ददर्श वृषकेतनम्। दृष्ट्वा प्रहर्तुकामं च ततः प्रादुद्रवद्धरः ॥ ५७ ततो दारुवनं घोरं मदनाभिसुतो हरः। विवेश ऋषयो यत्र सपत्नीका व्यवस्थिताः ॥ ५८ ते चापि ऋषयः सर्वे दृष्ट्वा मूर्ध्ना नताभवन्। ततस्तान् प्राह भगवान् भिक्षा मे प्रतिदीयताम् ॥ ५९ ततस्ते मौनिनस्तस्थुः सर्व एव महर्षयः। तदाश्रमाणि सर्वाणि परिचक्राम नारद ॥ ६० तं प्रविष्टं तदा दृष्ट्वा भार्गवात्रेययोषितः। प्रक्षोभमगमन् सर्वा हीनसत्त्वाः समन्ततः ॥ ६१ ऋते त्वरुन्धतीमेकामनसूयां च भामिनीम्। एताभ्यां भर्तृपूजासु तच्चिन्तासु स्थितं मनः ॥ ६२ ततः संक्षुभिताः सर्वा यत्र याति महेश्वरः। तत्र प्रयान्ति कामार्त्ता मदविह्वलितेन्द्रियाः ॥ ६३ त्यक्त्वाश्रमाणि शून्यानि स्वानि ता मुनियोषितः। अनुजग्मुर्यथा मत्तं करिण्य इव कुञ्जरम् ॥ ६४ अतः प्रत्युपकारमें तुम्हें सब लोगोंके लिये आनन्ददायक वर दूँगा। चैत्रमासमें जो वृद्ध, बालक, युवा या स्त्री तुम्हारा स्पर्श करेंगे या भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे वे सभी उन्मत्त हो जायेंगे। यक्ष! फिर वे गायेंगे, नाचेंगे, आनन्दित होंगे और निपुणताके साथ बाजे बजायेंगे। किंतु तुम्हारे सम्मुख हँसीकी बात करते हुए भी वे योगयुक्त रहेंगे। मेरे ही नामसे तुम पूज्य होगे। विश्वमें तुम्हारा पाञ्चालिकेश नाम प्रसिद्ध होगा। मेरे आशीर्वादसे तुमलोगोंके वरदाता और पूज्यतम होगे; जाओ ॥ ५१-५४॥ भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर वह यक्ष तुरंत सब देशोंमें घूमने लगा। फिर वह कालञ्जरके उत्तर और हिमालयके दक्षिण परम पवित्र स्थानमें स्थिर हो गया। वह शिवजीकी कृपासे पूजित हुआ। उसके चले जानेपर भगवान् त्रिनेत्र भी विन्ध्यपर्वतपर आ गये। वहाँ भी कामने उन्हें देखा। उसे पुनः प्रहारकी चेष्टा करते देख शिवजी भागने लगे। उसके बाद कामदेवके द्वारा पीछा किये जानेपर महादेवजी घोर दारुवनमें चले गये, जहाँ ऋषिगण अपनी पत्नियोंके साथ निवास करते थे ॥ ५५-५८ ॥ उन ऋषियोंने भी उन्हें देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया। फिर भगवान्ने उनसे कहा-आपलोग मुझे भिक्षा दीजिये। इसपर सभी महर्षि मौन रह गये। नारदजी! इसपर महादेवजी सभी आश्रमोंमें घूमने लगे। उस समय उन्हें आश्रममें आया हुआ देख पतिव्रता अरुन्धती और अनसूयाको छोड़कर ऋषियोंकी समस्त पत्नयाँ प्रक्षुब्ध एवं सत्यहीन हो गयीं। पर अरुन्धती और अनसूया पतिसेवामें ही लगी रहीं ॥ ५९-६२ ॥ अब शिवजी जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ संक्षुभित, कामार्त एवं मदसे विकल इन्द्रियोंवाली स्त्रियाँ भी जाने लगीं। मुनियोंकी वे स्त्रियाँ अपने आश्रमोंको सूना छोड़ उनका इस प्रकार अनुसरण करने लगीं, जैसे करेणु
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३५ ततस्तु ऋषयो दृष्ट्वा भार्गवाङ्गिरसो मुने। क्रोधान्विताब्रुवन्सर्वे लिङ्गोऽस्य पततां भुवि ॥ ६५ ततः पपात देवस्य लिङ्गं पृथ्वीं विदारयन्। अन्तर्द्धानं जगामाथ त्रिशूली नीललोहितः ॥ ६६ ततः स पतितो लिङ्गो विभिद्य वसुधातलम्। रसातलं विवेशाशु ब्रह्माण्डं चोर्ध्वतोऽभिनत् ॥ ६७ ततश्चचाल पृथिवी गिरयः सरितो नगाः। पातालभुवनाः सर्वे जङ्गमाजङ्गमैर्वृताः ॥ ६८ संक्षुब्धान् भुवनान् दृष्ट्वा भूर्लोकादीन् पितामहः। जगाम माधवं द्रष्टुं क्षीरोदं नाम सागरम्॥ ६९ तत्र दृष्ट्वा हृषीकेशं प्रणिपत्य च भक्तितः। उवाच देव भुवनाः किमर्थं क्षुभिता विभो ॥ ७० अथोवाच हरिर्ब्रह्मन् शार्वो लिङ्गो महर्षिभिः। पातितस्तस्य भारार्ता संचचाल वसुंधरा ॥ ७१ ततस्तदद्भुततमं श्रुत्वा देवः पितामहः। तत्र गच्छाम देवेश एवमाह पुनः पुनः ॥ ७२ ततः पितामहो देवः केशवश्च जगत्पतिः। आजग्मतुस्तमुद्देशं यत्र लिङ्गं भवस्य तत् ॥ ७३ ततोऽनन्तं हरिलिङ्गं दृष्ट्वारुह्य खगेश्वरम्। पातालं प्रविवेशाथ विस्मयान्तरितो विभुः ॥ ७४ ब्रह्मा पद्मविमानेन ऊर्ध्वमाक्रम्य सर्वतः। नैवान्तमलभद् ब्रह्मन् विस्मितः पुनरागतः ॥ ७५ विष्णुर्गत्वाऽथ पातालान् सप्त लोकपरायणः। चक्रपाणिर्विनिष्क्रान्तो लेभेऽन्तं न महामुने ॥ ७६ विष्णुः पितामहश्चोभौ हरलिङ्गं समेत्य हि। कृताञ्जलिपुटौ भूत्वा स्तोतुं देवं प्रचक्रतुः ॥ ७७ हरिब्रह्माणावूचतुः नमोऽस्तु ते शूलपाणे नमोऽस्तु वृषभध्वज। जीमूतवाहन कवे शर्व त्र्यम्बक शंकर ॥ ७८ महेश्वर महेशान सुवर्णाक्ष वृषाकपे। दक्षयज्ञक्षयकर कालरूप नमोऽस्तु ते ॥ ७९ त्वमादिरस्य जगतस्त्वं मध्यं परमेश्वर। भवानन्तश्च भगवान् सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ८० मदमत्त गजका अनुसरण करे। मुने! यह देखकर ऋषिगण क्रुद्ध हो गये एवं कहा कि इनका लिङ्ग भूमिपर गिर जाय। फिर तो महादेवका लिङ्ग पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ गिर गया एवं तब नीललोहित त्रिशूली अन्तर्धान हो गये ॥ ६३-६६ ॥ वह पृथ्वीपर गिरा लिंग उसका भेदन कर तुरंत रसातलमें प्रविष्ट हो गया एवं ऊपरकी ओर भी उसने विश्वब्रह्माण्डका भेदन कर दिया। इसके बाद पृथ्वी, पर्वत, नदियाँ, पादप तथा चराचरसे पूर्ण समस्त पाताललोक काँप उठे। पितामह ब्रह्मा भूर्लोक आदि भुवनोंको संक्षुब्ध देखकर श्रीविष्णुसे मिलने क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ उन्हें देख भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्रह्माने कहा- देव ! समस्त भुवन विक्षुब्ध कैसे हो गये हैं ? ॥ ६७-७० ॥ इसपर श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन् ! महर्षियोंने शिवके लिङ्गको गिरा दिया है। उसके भारसे कष्टमें पड़ी आर्त पृथ्वी विचलित हो रही है। इसके बाद ब्रह्माजी उस अद्भुत बातको सुनकर देवेश ! हमलोग वहाँ चलें- ऐसा बार-बार कहने लगे। फिर ब्रह्मा और जगत्पति विष्णु वहाँ पहुँचे, जहाँ शंकरका लिङ्ग गिरा था। वहाँ उस अनन्त लिङ्गको देखकर आश्चर्यचकित होकर हरि गरुड़पर सवार हो उसका पता लगानेके लिये पातालमें प्रविष्ट हुए ॥ ७१-७४ ॥ नारदजी ! ब्रह्माजी अपने पद्मायानके द्वारा सम्पूर्ण ऊर्ध्वाकाशको लाँघ गये, पर उस लिङ्गका अन्त नहीं पा सके और आश्चर्यचकित होकर वे लौट आये। मुने ! इसी प्रकार जब चक्रपाणि भगवान् विष्णु भी सातों पातालोंमें प्रवेश कर उस लिङ्गका बिना अन्त पाये ही वहाँसे बाहर आये, तब ब्रह्मा, विष्णु दोनों शिवलिङ्गके पास जाकर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७५-७७ ॥ ब्रह्मा-विष्णु बोले - शूलपाणिजी ! आपको प्रणाम है। वृषभध्वज ! जीमूतवाहन ! कवि ! शर्व ! त्र्यम्बक ! शंकर ! आपको प्रणाम है। महेश्वर ! महेशान ! सुवर्णाक्ष ! वृषाकपे ! दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक ! कालरूप शिव ! आपको प्रणाम है। परमेश्वर ! आप इस जगत्के आदि, मध्य एवं अन्त हैं। आप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सर्वत्रगामी या सर्वत्र व्याप्त हैं। आपको प्रणाम है ॥ ७८-८० ॥
| ३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६ |
|---|
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु तस्मिन् दारुवने हरः।<br>स्वरूपी ताविदं वाक्यमुवाच वदतां वरः॥ ८१॥ | पुलस्त्यजी बोले— उस दारुवनमें इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरने अपने स्वरूपमें प्रकट होकर (अर्थात् मूर्तिमान् होकर) उन दोनोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८१ ॥ |
| हर उवाच<br>किमर्थं देवतानाथौ परिभूतक्रमं त्विह।<br>मां स्तुवाते भृशास्वस्थं कामतापितविग्रहम्॥ ८२ | भगवान् शंकर बोले— आप दोनों सभी देवताओंके स्वामी हैं। आपलोग चलते-चलते थके हुए तथा कामाग्निसे दग्ध और मुझ सब प्रकारसे अस्वस्थ व्यक्तिकी क्यों स्तुति कर रहे हैं?॥ ८२॥ |
| देवावूचतुः<br>भवतः पातितं लिङ्गं यदेतद् भुवि शंकर।<br>एतत् प्रगृह्यतां भूय अतो देव स्तुवावहे॥ ८३ | (इसपर) ब्रह्मा-विष्णु (दोनों) बोले— शिवजी! पृथ्वीपर आपका जो यह लिङ्ग गिराया गया है, उसे पुनः आप ग्रहण करें। इसीलिये हम आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ ८३॥ |
| हर उवाच<br>यद्यर्चयन्ति त्रिदशा मम लिङ्गं सुरोत्तमौ।<br>तदेतत्प्रतिगृह्णीयां नान्यथेति कथंचन॥ ८४<br><br>ततः प्रोवाच भगवानैवमस्त्विति केशवः।<br>ब्रह्मा स्वयं च जग्राह लिङ्गं कनकपिङ्गलम्॥ ८५<br><br>ततश्चकार भगवांश्चातुर्वर्ण्यं हरार्चने।<br>शास्त्राणि चैषां मुख्यानि नानोक्ति विदितानि च॥ ८६<br><br>आद्यं शैवं परिख्यातमन्त्यत्पाशुपतं मुने।<br>तृतीयं कालवदनं चतुर्थं च कपालिनम्॥ ८७ | शिवजीने कहा— श्रेष्ठ देवो! यदि सभी देवता मेरे लिङ्गकी पूजा करना स्वीकार करें, तभी मैं इसे पुनः ग्रहण करूँगा, अन्यथा किसी प्रकार भी इसे नहीं धारण करूँगा। तब भगवान् विष्णु बोले—ऐसा ही होगा। फिर ब्रह्माजीने स्वयं उस स्वर्णके सदृश पिंगल लिङ्गको ग्रहण किया। तब भगवान्ने चारों वर्णोंको हर-लिङ्गकी अर्चनाका अधिकारी बनाया। इनके मुख्य शास्त्र नाना प्रकारके वचनोंसे प्रख्यात हैं। मुने! उन शिव-भक्तोंका प्रथम सम्प्रदाय शैव, द्वितीय पाशुपत, तृतीय कालमुख¹ और चतुर्थ सम्प्रदाय कापालिक या भैरव नामसे विख्यात है²॥ ८४–८७॥ |
| शैवश्चासीत्स्वयं शक्तिर्वसिष्ठस्य प्रियः सुतः।<br>तस्य शिष्यो बभूवाथ गोपायन इति श्रुतः॥ ८८ | महर्षि वसिष्ठके प्रियपुत्र शक्ति ऋषि स्वयं शैव थे। उनके एक शिष्य गोपायन नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने शैव सम्प्रदायको दूरतक फैलाया। |
| महापाशुपतश्चासीद्भरद्वाजस्तपोधनः ।<br>तस्य शिष्योऽप्यभूद्राजा ऋषभः सोमकेश्वरः॥ ८९ | तपोधन भरद्वाज महापाशुपत थे और सोमकेश्वर राजा ऋषभ उनके शिष्य हुए, जिनसे पाशुपत-सम्प्रदाय विशेषरूपसे परिवर्तित हुआ। |
| कालास्यो भगवानासीदापस्तम्बस्तपोधनः।<br>तस्य शिष्यो भवद्वैश्यो नाम्ना क्राथेश्वरो मुने॥ ९० | मुने! ऐश्वर्य एवं तपस्याके धनी महर्षि आपस्तम्ब, कालमुख सम्प्रदायके आचार्य थे। क्राथेश्वर नामके उनके वैश्य शिष्यने इस सम्प्रदायका विशेष रूपसे प्रचार |
१-गणेशसहस्रनामके 'खम्भात' भाष्यमें कालमुखमतका विशेष परिचय है।
२-शैवं पाशुपतं कालमुखं भैरवशासनम्। (गणेशसहस्रनाम १२९)