वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| ३० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६ |
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छठा अध्याय
नर-नारायणकी उत्पत्ति, तपश्चर्या, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, काम-दाह और कामकी अनङ्गताका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>हृद्भवो ब्रह्मणो योऽसौ धर्मो दिव्यवपुर्मुने।<br>दाक्षायणी तस्य भार्या तस्यामजनयत्सुतान्॥ १<br>हरिं कृष्णं च देवर्षे नारायणनरौ तथा।<br>योगाभ्यासरतो नित्यं हरिकृष्णौ बभूवतुः॥ २<br>नरनारायणौ चैव जगतो हितकाम्यया।<br>तप्येतां च तपः सौम्यौ पुराणावृषिसत्तमौ॥ ३<br>प्रालेयाद्रिं समागम्य तीर्थे बदरिकाश्रमे।<br>गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले— मुने! ब्रह्माजीके हृदयसे जो दिव्यदेहधारी धर्म प्रकट हुआ था, उसने दक्षकी पुत्री ‘मूर्ति’ नामकी भार्यासे हरि, कृष्ण, नर और नारायण नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया।* देवर्षे! इनमें हरि और कृष्ण ये दो तो नित्य योगाभ्यासमें निरत हो गये और पुरातन ऋषि शान्तमना नर तथा नारायण संसारके कल्याणके लिये हिमालय पर्वतपर जाकर बदरिकाश्रम तीर्थमें गङ्गाके निर्मल तटपर (परब्रह्मका नाम ॐकारका जप करते हुए) तप करने लगे॥ १–४॥ |
| नरनारायणाभ्यां च जगदेतच्चराचरम्।<br>तापितं तपसा ब्रह्मञ्छक्रः क्षोभं तदा ययौ॥ ५<br>संक्षुब्धस्तपसा ताभ्यां क्षोभणाय शतक्रतुः।<br>रम्भाद्याप्सरसः श्रेष्ठाः प्रेषयत्तन् महाश्रमम्॥ ६<br>कन्दर्पश्च सुदुर्धर्षश्चूताङ्कुरमहायुधः।<br>समं सहचरेणैव वसन्तेनाश्रमं गतः॥ ७<br>ततो माधवकन्दर्पौ ताश्चैवाप्सरसो वराः।<br>बदर्याश्रममागम्य विचिक्रीडुर्यथेच्छया॥ ८ | ब्रह्मन्! नर-नारायणकी दुष्कर तपस्यासे सारा स्थावर-जंगमात्मक यह जगत् परितप्त हो गया। इससे इन्द्र विक्षुब्ध हो उठे। उन दोनोंकी तपस्यासे अत्यन्त व्यग्र इन्द्रने उन्हें मोहित करनेके लिये रम्भा आदि श्रेष्ठ अप्सराओंको उनके विशाल आश्रममें भेजा। कामदेवके आयुधोंमें अशोक, आम्रादिकी मंजरियाँ विशेष प्रभावक हैं। इन्हें तथा अपने सहयोगी वसन्त-ऋतुको साथ लेकर वह भी उस आश्रममें गया। अब वे वसन्त, कामदेव तथा श्रेष्ठ अप्सराएँ—ये सब बदरिकाश्रममें जाकर निर्बाध क्रीड़ा करने लग गये॥ ५–८॥ |
| ततो वसन्ते संप्राप्ते किंशुका ज्वलनप्रभाः।<br>निष्पत्राः सततं रेजुः शोभयन्तो धरातलम्॥ ९<br>शिशिरं नाम मातङ्गं विदार्य नखरैरिव।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १०<br>मया तुषारौघकरी निर्जितः स्वेन तेजसा।<br>तमेव हसतेत्युच्चैः वसन्तः कुन्दकुड्मलैः॥ ११<br>वनानि कर्णिकाराणां पुष्पितानि विरेजिरे।<br>यथा नरेन्द्रपुत्राणि कनकाभरणानि हि॥ १२ | तब वसन्त-ऋतुके आ जानेपर अग्नि-शिखाके सदृश कान्तिवाले पलाश पत्रहीन होकर रात-दिन पृथिवीकी शोभा बढ़ाते हुए सुशोभित होने लगे। मुने! वसन्तरूपी सिंह मानो पलाश-पुष्परूपी नखोंसे शिशिररूपी गजराजको विदीर्ण कर वहाँ अपना साम्राज्य जमा चुका था। वह सोचने लगा—मैंने अपने तेजसे शीतसमूहरूपी हाथीको जीत लिया है और वह कुन्दकी कलियोंके बहाने उसका उपहास भी करने लगा है। इधर सुवर्णके अलंकारोंसे मण्डित राजकुमारोंके समान पुष्पित कचनार-अमलतासके वन सुशोभित होने लगे॥ ९–१२॥ |
* यह बात भागवत २।७।६ आदिमें विशेष स्पष्टरूपसे कही गयी है। जिज्ञासु वहाँ भी देखें।