वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३१ तेषामनु तथा नीपाः किङ्करा इव रेजिरे। स्वामिसंलब्धसंमाना भृत्या राजसुतानिव ॥ १३ रक्ताशोकवना भान्ति पुष्पिताः सहसोज्ज्वलाः। भृत्या वसन्तनृपतेः संग्रामे सृक्प्लुता इव ॥ १४ मृगवृन्दाः पिञ्जरिता राजन्ते गहने वने। पुलकाभिर्वृता यद्वत् सज्जनाः सुहृदागमे ॥ १५ मञ्जरीभिर्विराजन्ते नदीकूलेषु वेतसाः। वक्तुकामा इवाङ्गुल्या कोऽस्माकं सदृशो नगः ॥ १६ रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका । नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना ॥ १७ नीलेन्दीवरनेत्रा च ब्रह्मन् बिल्वफलस्तनी । प्रफुल्लकुन्ददशना मञ्जरीकरशोभिता ॥ १८ बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्दुवारनखाद्भुता । पुंस्कोकिलस्वना दिव्या अङ्कोलवसना शुभा ॥ १९ बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वरनूपुरा । प्राग्वंशरसना ब्रह्मन् मत्तहंसगतिस्तथा ॥ २० पुत्रजीवांशुका भृङ्गरोमराजिविराजिता । वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे ॥ २१ ततो नारायणो दृष्ट्वा आश्रमस्यानवद्यताम् । समीक्ष्य च दिशः सर्वास्ततोऽनङ्गमपश्यत ॥ २२ नारद उवाच कोऽसावनङ्गो ब्रह्मर्षे तस्मिन् बदरिकाश्रमे । यं ददर्श जगन्नाथो देवो नारायणोऽव्ययः ॥ २३ पुलस्त्य उवाच कन्दर्पो हर्षतनयो योऽसौ कामो निगद्यते । स शंकरेण संदग्धो ह्यनङ्गत्वमुपागतः ॥ २४ नारद उवाच किमर्थं कामदेवोऽसौ देवदेवेन शंभुना । दग्धस्तु कारणे कस्मिन्नेतद्व्याख्यातुमर्हसि ॥ २५ पुलस्त्य उवाच यदा दक्षसुता ब्रह्मन् सती याता यमक्षयम् । विनाश्य दक्षयज्ञं तं विचचार त्रिलोचनः ॥ २६ ततो वृषध्वजं दृष्ट्वा कन्दर्पः कुसुमायुधः । अपत्नीकं तदाऽस्त्रेण उन्मादेनाभ्यताडयत् ॥ २७ जैसे राजपुत्रोंके पीछे उनके द्वारा सम्मानित सेवक खड़े रहते हैं, वैसे ही उन (वर्णित-वनों)-के पीछे- पीछे कदम्बवृक्ष सुशोभित हो रहे थे। इसी प्रकार लाल अशोक आदिके समूह भी सहसा पुष्पित एवं उद्भासित हो सुशोभित होने लगे। लगता था मानो ऋतुराज वसन्तके अनुयायी युद्धमें रक्तसे लथपथ हो रहे हों। घने वनमें पीले रंगके हरिण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार सुहृद्के आनेसे सज्जन (आनन्दसे) पुलकित होकर सुशोभित होते हैं। नदीके तटोंपर अपनी मंजरियोंके द्वारा वेतस ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो वे अंगुलियोंके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि हमारे सदृश अन्य कौन वृक्ष है ॥ १३-१६ ॥ देवर्षे ! जो दिव्य पतली एवं यौवनसे भरी वसन्त- लक्ष्मी उस बदरिकाश्रममें प्रकट हुई थी, उसके मानो रक्ताशोक ही हाथ, पलाश ही चरण, नीला शोक केश- पाश, विकसित कमल ही मुख और नीलकमल ही नेत्र थे। उसके बिल्वफल मानों स्तन, कुन्दपुष्प दन्त, मञ्जरी हाथ, दोपहरियाफूल अधर, सिन्दुवार नख, नर कोयलकी काकली (बोली) स्वर, अंकोल वस्त्र, मयूरयूथ आभूषण, सारस नूपुरस्वरूप और आश्रमके शिखर करधनी थे। उसके मत्त हंस गति, पुत्रजीव ऊर्ध्व वस्त्र और भ्रमर मानो रोमावलीरूपमें विराजित थे। तब नारायणने आश्रमकी अद्भुत रमणीयता देखकर सभी दिशाओंकी ओर देखा और फिर कामदेवको भी देखा ॥ १७-२२ ॥ नारदजीने पूछा- ब्रह्मर्षे ! जिसे अव्यय जगन्नाथ नारायणने बदरिकाश्रममें देखा था, वह अनङ्ग (काम) कौन है ? ॥ २३ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- यह कंदर्प हर्षका पुत्र है, इसे ही काम कहा जाता है। शंकर (-की नेत्राग्नि)-द्वारा भस्म होकर वह 'अनङ्ग' हो गया ॥ २४ ॥ नारदजीने पूछा- पुलस्त्यजी ! आप यह बतलायें कि देवाधिदेव शंकरने कामदेवको किस कारणसे भस्म किया ? ॥ २५ ॥ पुलस्त्यजीने कहा- ब्रह्मन् ! दक्ष-पुत्री सतीके प्राण-त्याग करनेपर शिवजी दक्ष-यज्ञका ध्वंस कर (जहाँ-तहाँ) विचरण करने लगे। तब शिवजीको स्त्री- रहित देखकर पुष्पास्त्रवाले कामदेवने उनपर अपना 'उन्मादन' नामक अस्त्र छोड़ा। इस उन्मादन-बाणसे