वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३५ ततस्तु ऋषयो दृष्ट्वा भार्गवाङ्गिरसो मुने। क्रोधान्विताब्रुवन्सर्वे लिङ्गोऽस्य पततां भुवि ॥ ६५ ततः पपात देवस्य लिङ्गं पृथ्वीं विदारयन्। अन्तर्द्धानं जगामाथ त्रिशूली नीललोहितः ॥ ६६ ततः स पतितो लिङ्गो विभिद्य वसुधातलम्। रसातलं विवेशाशु ब्रह्माण्डं चोर्ध्वतोऽभिनत् ॥ ६७ ततश्चचाल पृथिवी गिरयः सरितो नगाः। पातालभुवनाः सर्वे जङ्गमाजङ्गमैर्वृताः ॥ ६८ संक्षुब्धान् भुवनान् दृष्ट्वा भूर्लोकादीन् पितामहः। जगाम माधवं द्रष्टुं क्षीरोदं नाम सागरम्॥ ६९ तत्र दृष्ट्वा हृषीकेशं प्रणिपत्य च भक्तितः। उवाच देव भुवनाः किमर्थं क्षुभिता विभो ॥ ७० अथोवाच हरिर्ब्रह्मन् शार्वो लिङ्गो महर्षिभिः। पातितस्तस्य भारार्ता संचचाल वसुंधरा ॥ ७१ ततस्तदद्भुततमं श्रुत्वा देवः पितामहः। तत्र गच्छाम देवेश एवमाह पुनः पुनः ॥ ७२ ततः पितामहो देवः केशवश्च जगत्पतिः। आजग्मतुस्तमुद्देशं यत्र लिङ्गं भवस्य तत् ॥ ७३ ततोऽनन्तं हरिलिङ्गं दृष्ट्वारुह्य खगेश्वरम्। पातालं प्रविवेशाथ विस्मयान्तरितो विभुः ॥ ७४ ब्रह्मा पद्मविमानेन ऊर्ध्वमाक्रम्य सर्वतः। नैवान्तमलभद् ब्रह्मन् विस्मितः पुनरागतः ॥ ७५ विष्णुर्गत्वाऽथ पातालान् सप्त लोकपरायणः। चक्रपाणिर्विनिष्क्रान्तो लेभेऽन्तं न महामुने ॥ ७६ विष्णुः पितामहश्चोभौ हरलिङ्गं समेत्य हि। कृताञ्जलिपुटौ भूत्वा स्तोतुं देवं प्रचक्रतुः ॥ ७७ हरिब्रह्माणावूचतुः नमोऽस्तु ते शूलपाणे नमोऽस्तु वृषभध्वज। जीमूतवाहन कवे शर्व त्र्यम्बक शंकर ॥ ७८ महेश्वर महेशान सुवर्णाक्ष वृषाकपे। दक्षयज्ञक्षयकर कालरूप नमोऽस्तु ते ॥ ७९ त्वमादिरस्य जगतस्त्वं मध्यं परमेश्वर। भवानन्तश्च भगवान् सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ८० मदमत्त गजका अनुसरण करे। मुने! यह देखकर ऋषिगण क्रुद्ध हो गये एवं कहा कि इनका लिङ्ग भूमिपर गिर जाय। फिर तो महादेवका लिङ्ग पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ गिर गया एवं तब नीललोहित त्रिशूली अन्तर्धान हो गये ॥ ६३-६६ ॥ वह पृथ्वीपर गिरा लिंग उसका भेदन कर तुरंत रसातलमें प्रविष्ट हो गया एवं ऊपरकी ओर भी उसने विश्वब्रह्माण्डका भेदन कर दिया। इसके बाद पृथ्वी, पर्वत, नदियाँ, पादप तथा चराचरसे पूर्ण समस्त पाताललोक काँप उठे। पितामह ब्रह्मा भूर्लोक आदि भुवनोंको संक्षुब्ध देखकर श्रीविष्णुसे मिलने क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ उन्हें देख भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्रह्माने कहा- देव ! समस्त भुवन विक्षुब्ध कैसे हो गये हैं ? ॥ ६७-७० ॥ इसपर श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन् ! महर्षियोंने शिवके लिङ्गको गिरा दिया है। उसके भारसे कष्टमें पड़ी आर्त पृथ्वी विचलित हो रही है। इसके बाद ब्रह्माजी उस अद्भुत बातको सुनकर देवेश ! हमलोग वहाँ चलें- ऐसा बार-बार कहने लगे। फिर ब्रह्मा और जगत्पति विष्णु वहाँ पहुँचे, जहाँ शंकरका लिङ्ग गिरा था। वहाँ उस अनन्त लिङ्गको देखकर आश्चर्यचकित होकर हरि गरुड़पर सवार हो उसका पता लगानेके लिये पातालमें प्रविष्ट हुए ॥ ७१-७४ ॥ नारदजी ! ब्रह्माजी अपने पद्मायानके द्वारा सम्पूर्ण ऊर्ध्वाकाशको लाँघ गये, पर उस लिङ्गका अन्त नहीं पा सके और आश्चर्यचकित होकर वे लौट आये। मुने ! इसी प्रकार जब चक्रपाणि भगवान् विष्णु भी सातों पातालोंमें प्रवेश कर उस लिङ्गका बिना अन्त पाये ही वहाँसे बाहर आये, तब ब्रह्मा, विष्णु दोनों शिवलिङ्गके पास जाकर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७५-७७ ॥ ब्रह्मा-विष्णु बोले - शूलपाणिजी ! आपको प्रणाम है। वृषभध्वज ! जीमूतवाहन ! कवि ! शर्व ! त्र्यम्बक ! शंकर ! आपको प्रणाम है। महेश्वर ! महेशान ! सुवर्णाक्ष ! वृषाकपे ! दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक ! कालरूप शिव ! आपको प्रणाम है। परमेश्वर ! आप इस जगत्के आदि, मध्य एवं अन्त हैं। आप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सर्वत्रगामी या सर्वत्र व्याप्त हैं। आपको प्रणाम है ॥ ७८-८० ॥