भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46
३६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६
SanskritHindi
पुलस्त्य उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु तस्मिन् दारुवने हरः।<br>स्वरूपी ताविदं वाक्यमुवाच वदतां वरः॥ ८१॥पुलस्त्यजी बोले— उस दारुवनमें इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरने अपने स्वरूपमें प्रकट होकर (अर्थात् मूर्तिमान् होकर) उन दोनोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८१ ॥
हर उवाच<br>किमर्थं देवतानाथौ परिभूतक्रमं त्विह।<br>मां स्तुवाते भृशास्वस्थं कामतापितविग्रहम्॥ ८२भगवान् शंकर बोले— आप दोनों सभी देवताओंके स्वामी हैं। आपलोग चलते-चलते थके हुए तथा कामाग्निसे दग्ध और मुझ सब प्रकारसे अस्वस्थ व्यक्तिकी क्यों स्तुति कर रहे हैं?॥ ८२॥
देवावूचतुः<br>भवतः पातितं लिङ्गं यदेतद् भुवि शंकर।<br>एतत् प्रगृह्यतां भूय अतो देव स्तुवावहे॥ ८३(इसपर) ब्रह्मा-विष्णु (दोनों) बोले— शिवजी! पृथ्वीपर आपका जो यह लिङ्ग गिराया गया है, उसे पुनः आप ग्रहण करें। इसीलिये हम आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ ८३॥
हर उवाच<br>यद्यर्चयन्ति त्रिदशा मम लिङ्गं सुरोत्तमौ।<br>तदेतत्प्रतिगृह्णीयां नान्यथेति कथंचन॥ ८४<br><br>ततः प्रोवाच भगवानैवमस्त्विति केशवः।<br>ब्रह्मा स्वयं च जग्राह लिङ्गं कनकपिङ्गलम्॥ ८५<br><br>ततश्चकार भगवांश्चातुर्वर्ण्यं हरार्चने।<br>शास्त्राणि चैषां मुख्यानि नानोक्ति विदितानि च॥ ८६<br><br>आद्यं शैवं परिख्यातमन्त्यत्पाशुपतं मुने।<br>तृतीयं कालवदनं चतुर्थं च कपालिनम्॥ ८७शिवजीने कहा— श्रेष्ठ देवो! यदि सभी देवता मेरे लिङ्गकी पूजा करना स्वीकार करें, तभी मैं इसे पुनः ग्रहण करूँगा, अन्यथा किसी प्रकार भी इसे नहीं धारण करूँगा। तब भगवान् विष्णु बोले—ऐसा ही होगा। फिर ब्रह्माजीने स्वयं उस स्वर्णके सदृश पिंगल लिङ्गको ग्रहण किया। तब भगवान्ने चारों वर्णोंको हर-लिङ्गकी अर्चनाका अधिकारी बनाया। इनके मुख्य शास्त्र नाना प्रकारके वचनोंसे प्रख्यात हैं। मुने! उन शिव-भक्तोंका प्रथम सम्प्रदाय शैव, द्वितीय पाशुपत, तृतीय कालमुख¹ और चतुर्थ सम्प्रदाय कापालिक या भैरव नामसे विख्यात है²॥ ८४–८७॥
शैवश्चासीत्स्वयं शक्तिर्वसिष्ठस्य प्रियः सुतः।<br>तस्य शिष्यो बभूवाथ गोपायन इति श्रुतः॥ ८८महर्षि वसिष्ठके प्रियपुत्र शक्ति ऋषि स्वयं शैव थे। उनके एक शिष्य गोपायन नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने शैव सम्प्रदायको दूरतक फैलाया।
महापाशुपतश्चासीद्भरद्वाजस्तपोधनः ।<br>तस्य शिष्योऽप्यभूद्राजा ऋषभः सोमकेश्वरः॥ ८९तपोधन भरद्वाज महापाशुपत थे और सोमकेश्वर राजा ऋषभ उनके शिष्य हुए, जिनसे पाशुपत-सम्प्रदाय विशेषरूपसे परिवर्तित हुआ।
कालास्यो भगवानासीदापस्तम्बस्तपोधनः।<br>तस्य शिष्यो भवद्वैश्यो नाम्ना क्राथेश्वरो मुने॥ ९०मुने! ऐश्वर्य एवं तपस्याके धनी महर्षि आपस्तम्ब, कालमुख सम्प्रदायके आचार्य थे। क्राथेश्वर नामके उनके वैश्य शिष्यने इस सम्प्रदायका विशेष रूपसे प्रचार

१-गणेशसहस्रनामके 'खम्भात' भाष्यमें कालमुखमतका विशेष परिचय है।
२-शैवं पाशुपतं कालमुखं भैरवशासनम्। (गणेशसहस्रनाम १२९)