भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ तस्माद्वरं त्वां प्रतिपूजनाय दास्यामि लोकस्य च हास्यकारि ॥ ५१ यस्त्वां यदा पश्यति चैत्रमासे स्पृशेनरो वार्चयते च भक्त्या। वृद्धोऽथ बालोऽथ युवाथ योषित् सर्वे तदोन्मादधरा भवन्ति ॥ ५२ गायन्ति नृत्यन्ति रमन्ति यक्ष वाद्यानि यत्नादपि वादयन्ति। तवाग्रतो हास्यवचोऽभिरक्ता भवन्ति ते योग्ययुतास्तु ते स्युः ॥ ५३ ममैव नाम्ना भविताऽसि पूज्यः पाञ्चालिकेशः प्रथितः पृथिव्याम्। मम प्रसादाद् वरदो नराणां भविष्यसे पूज्यतमोऽभिगच्छ ॥ ५४ इत्येवमुक्तो विभुना स यक्षो जगाम देशान् सहसैव सर्वान्। कालञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्यो देशो हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः ॥ ५५ तस्मिन् सुपुण्ये विषये निविष्टो रुद्रप्रसादादभिपूज्यतेऽसौ । तस्मिन् प्रयाते भगवांस्त्रिनेत्रो देवोऽपि विन्ध्यं गिरिमभ्यगच्छत् ॥ ५६ तत्रापि मदनो गत्वा ददर्श वृषकेतनम्। दृष्ट्वा प्रहर्तुकामं च ततः प्रादुद्रवद्धरः ॥ ५७ ततो दारुवनं घोरं मदनाभिसुतो हरः। विवेश ऋषयो यत्र सपत्नीका व्यवस्थिताः ॥ ५८ ते चापि ऋषयः सर्वे दृष्ट्वा मूर्ध्ना नताभवन्। ततस्तान् प्राह भगवान् भिक्षा मे प्रतिदीयताम् ॥ ५९ ततस्ते मौनिनस्तस्थुः सर्व एव महर्षयः। तदाश्रमाणि सर्वाणि परिचक्राम नारद ॥ ६० तं प्रविष्टं तदा दृष्ट्वा भार्गवात्रेययोषितः। प्रक्षोभमगमन् सर्वा हीनसत्त्वाः समन्ततः ॥ ६१ ऋते त्वरुन्धतीमेकामनसूयां च भामिनीम्। एताभ्यां भर्तृपूजासु तच्चिन्तासु स्थितं मनः ॥ ६२ ततः संक्षुभिताः सर्वा यत्र याति महेश्वरः। तत्र प्रयान्ति कामार्त्ता मदविह्वलितेन्द्रियाः ॥ ६३ त्यक्त्वाश्रमाणि शून्यानि स्वानि ता मुनियोषितः। अनुजग्मुर्यथा मत्तं करिण्य इव कुञ्जरम् ॥ ६४ अतः प्रत्युपकारमें तुम्हें सब लोगोंके लिये आनन्ददायक वर दूँगा। चैत्रमासमें जो वृद्ध, बालक, युवा या स्त्री तुम्हारा स्पर्श करेंगे या भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे वे सभी उन्मत्त हो जायेंगे। यक्ष! फिर वे गायेंगे, नाचेंगे, आनन्दित होंगे और निपुणताके साथ बाजे बजायेंगे। किंतु तुम्हारे सम्मुख हँसीकी बात करते हुए भी वे योगयुक्त रहेंगे। मेरे ही नामसे तुम पूज्य होगे। विश्वमें तुम्हारा पाञ्चालिकेश नाम प्रसिद्ध होगा। मेरे आशीर्वादसे तुमलोगोंके वरदाता और पूज्यतम होगे; जाओ ॥ ५१-५४॥ भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर वह यक्ष तुरंत सब देशोंमें घूमने लगा। फिर वह कालञ्जरके उत्तर और हिमालयके दक्षिण परम पवित्र स्थानमें स्थिर हो गया। वह शिवजीकी कृपासे पूजित हुआ। उसके चले जानेपर भगवान् त्रिनेत्र भी विन्ध्यपर्वतपर आ गये। वहाँ भी कामने उन्हें देखा। उसे पुनः प्रहारकी चेष्टा करते देख शिवजी भागने लगे। उसके बाद कामदेवके द्वारा पीछा किये जानेपर महादेवजी घोर दारुवनमें चले गये, जहाँ ऋषिगण अपनी पत्नियोंके साथ निवास करते थे ॥ ५५-५८ ॥ उन ऋषियोंने भी उन्हें देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया। फिर भगवान्ने उनसे कहा-आपलोग मुझे भिक्षा दीजिये। इसपर सभी महर्षि मौन रह गये। नारदजी! इसपर महादेवजी सभी आश्रमोंमें घूमने लगे। उस समय उन्हें आश्रममें आया हुआ देख पतिव्रता अरुन्धती और अनसूयाको छोड़कर ऋषियोंकी समस्त पत्नयाँ प्रक्षुब्ध एवं सत्यहीन हो गयीं। पर अरुन्धती और अनसूया पतिसेवामें ही लगी रहीं ॥ ५९-६२ ॥ अब शिवजी जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ संक्षुभित, कामार्त एवं मदसे विकल इन्द्रियोंवाली स्त्रियाँ भी जाने लगीं। मुनियोंकी वे स्त्रियाँ अपने आश्रमोंको सूना छोड़ उनका इस प्रकार अनुसरण करने लगीं, जैसे करेणु