भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५

| विशाखांशमनुराधा ज्येष्ठा भौमगृहं त्विदम्।<br>द्वितीयं वृश्चिको राशिर्मेढ्रं कालस्वरूपिणः॥ ३८<br><br>मूलं पूर्वोत्तरांशश्च देवाचार्यगृहं धनुः।<br>ऊरुयुगलमीशस्य अमरर्षे प्रगीयते॥ ३९<br><br>उत्तरांशास्त्रयो ऋक्षं श्रवणं मकरो मुने।<br>धनिष्ठार्थं शनिक्षेत्रं जानुनी परमेष्ठिनः॥ ४०<br><br>धनिष्ठार्धं शतभिषा प्रौष्ठपद्यांशकत्रयम्।<br>सौरेः सद्मापरमिदं कुम्भो जङ्घे च विश्रुते॥ ४१ | विशाखाका एक चरण, सम्पूर्ण अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्र, मङ्गलका द्वितीय क्षेत्र वृश्चिक राशि कालरूपी महादेवका उपस्थ है। सम्पूर्ण मूल, पूरा पूर्वाषाढ और उत्तराषाढकी प्रथम चरणवाली धनु राशि जो बृहस्पतिका क्षेत्र है, महेश्वरके दोनों ऊरु हैं। मुने! उत्तराषाढ़के शेष तीन चरण, सम्पूर्ण श्रवण नक्षत्र और धनिष्ठाके दो पूर्व चरणकी मकर राशि शनिका क्षेत्र और परमेष्ठी महेश्वरके दोनों घुटने हैं। धनिष्ठाके दो चरण, सम्पूर्ण शतभिष और पूर्वभाद्रपदके तीन चरणवाली कुम्भ राशि शनिका द्वितीय गृह और शिवकी दो जंघाएँ हैं॥ ३८—४१॥ | | प्रौष्ठपद्यांशमेकं तु उत्तरा रेवती तथा।<br>द्वितीयं जीवसदनं मीनस्तु चरणावुभौ॥ ४२<br><br>एवं कृत्वा कालरूपं त्रिनेत्रो<br>यज्ञं क्रोधान्मार्गणैराजघान।<br>विद्धश्चासौ वेदनाबुद्धिमुक्तः<br>खे संतस्थौ तारकाभिश्चिताङ्गः॥ ४३ | पूर्वाभाद्रपदके शेष एक चरण, सम्पूर्ण उत्तरभाद्रपद और सम्पूर्ण रेवती नक्षत्रोंवाला बृहस्पतिका द्वितीय क्षेत्र एवं मीन राशि उनके दो चरण हैं। इस प्रकार कालरूप धारणकर शिवने क्रोधपूर्वक हरणिरूपधारी यज्ञको बाणोंसे मारा। उसके बाद बाणोंसे विद्ध होकर, किंतु वेदनाकी अनुभूति न करता हुआ, वह यज्ञ ताराओंसे घिरे शरीरवाला होकर आकाशमें स्थित हो गया॥ ४२-४३॥ | | नारद उवाच<br>राशयो गदिता ब्रह्मंस्त्वया द्वादश वै मम।<br>तेषां विशेषतो ब्रूहि लक्षणानि स्वरूपतः॥ ४४ | नारदजीने कहा— ब्रह्मन्! आपने मुझसे बारहौं राशियोंका वर्णन किया। अब विशेषरूपसे उनके स्वरूपके अनुसार लक्षणोंको बतलायें॥ ४४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>स्वरूपं तव वक्ष्यामि राशीनां शृणु नारद।<br>यादृशा यत्र संचारा यस्मिन् स्थाने वसन्ति च॥ ४५<br><br>मेषः समानमूर्तिश्च अजाविकधनादिषु।<br>संचारस्थानमेवास्य धान्यरत्नाकरादिषु॥ ४६<br><br>नवशाद्वलसंछन्नवसुधायां च सर्वशः।<br>नित्यं चरति फुल्लेषु सरसां पुलिनेषु च॥ ४७<br><br>वृषः सदृशरूपो हि चरते गोकुलादिषु।<br>तस्याधिवासभूमिस्तु कृषीवलधराश्रयः॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आपको मैं राशियोंका स्वरूप बतलाता हूँ; सुनिये। वे जैसी हैं तथा जहाँ संचार और निवास करती हैं वह सभी वर्णित करता हूँ। मेष राशि भेड़के समान आकारवाली है। बकरी, भेड़, धन-धान्य एवं रत्नाकरादि इसके संचार-स्थान हैं तथा नवदूर्वासे आच्छादित समग्र पृथ्वी एवं पुष्पित वनस्पतियोंसे युक्त सरोवरोंके पुलिनोंमें यह नित्य संचरण करती है। वृषभके समान रूपयुक्त वृषराशि गोकुलादिमें विचरण करती है तथा कृषकोंकी भूमि इसका निवास-स्थान है॥ ४५—४८॥ | | स्त्रीपुंसयोः समं रूपं शय्यासनपरिग्रहः।<br>वीणावाद्यधृङ् मिथुनं गीतनर्तकशिल्पिषु॥ ४९<br><br>स्थितः क्रीडारतिर्नित्यं विहारावनिरेस्य तु।<br>मिथुनं नाम विख्यातं राशिर्द्वैधात्मकः स्थितः॥ ५० | मिथुन राशि एक स्त्री और एक पुरुषके साथ-साथ रहनेके समान रूपवाली है। यह शय्या और आसनोंपर स्थित है। पुरुष-स्त्रीके हाथोंमें वीणा एवं (अन्य) वाद्य हैं। इस राशिका संचरण गानेवालों, नाचनेवालों एवं शिल्पियोंमें होता है। इस द्विखभाव राशिको मिथुन कहते हैं। इस राशिका निवास क्रीडास्थल एवं |