भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 489 में से

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पृष्ठ 249

| अध्याय ५४ ] | भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति | २३९ | | :--- | :--- |

देवा ऊचुः<br>यदि तुष्टोऽसि देवानां वरं दातुमिहेच्छसि।<br>तदिदं त्यज्यतां तावन्महामैथुनमीश्वर॥ ४६देवताओने कहा— ईश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और हम देवताओंको वर देना चाहते हैं तो आप इस महासुरतलीलाका परित्याग कर दें॥ ४६॥
ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु संत्यक्तो मया भावोऽमरोत्तमाः।<br>ममेदं तेज उद्रिक्तं कश्चिद् देवः प्रतीच्छतु॥ ४७ईश्वरने कहा— देवश्रेष्ठो! ऐसा ही होगा। मैंने आसक्ति छोड़ दी। किंतु कोई देवता मेरे इस बढ़े हुए तेज (शुक्र)-को ग्रहण करे॥ ४७॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ताः शम्भुना देवाः सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः।<br>असीदन्त यथा मग्नाः पङ्के वृन्दारका इव॥ ४८<br><br>सीदत्सु दैवतेष्वेवं हुताशोऽभ्येत्य शङ्करम्।<br>प्रोवाच मुञ्च तेजस्त्वं प्रतीच्छाम्येष शङ्कर॥ ४९<br><br>ततो मुमोच भगवांस्तद्रेतः स्कन्नमेव तु।<br>जलं तृषान्ते वै यद्वत् तैलपानं पिपासितः॥ ५०<br><br>ततः पीते तेजसि वै शार्वे देवेन वह्निना।<br>स्वस्थाः सुराः समामन्त्र्य हरं जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ५१पुलस्त्यजी बोले— शम्भुके इस प्रकार कहनेपर (प्रकृत समस्यासे) इन्द्रके साथ चन्द्रमा एवं सूर्य आदि देवता कीचड़में फँसे हुए हाथीके समान दुखी हो गये। देवताओंके इस प्रकार दुखी हो जानेपर अग्निने (साहस कर) शङ्करके पास जाकर कहा—शङ्कर! आप (अपने) तेजको छोड़ें—बाहर करें। मैं उसे ग्रहण करूँगा। उसके बाद भगवान्ने (तेजको) छोड़ दिया और उस त्यक्त रेतस्‌को जैसे जलका प्यासा व्यक्ति तेल पी जाता है, अग्निदेवने उसी प्रकार (उसे) पी लिया। अग्निदेवद्वारा शङ्करके तेजको इस प्रकार पी लिये जानेपर देवतालोग स्वस्थ हो गये और महादेवसे अनुमति लेकर स्वर्गमें लौट गये॥ ४८—५१॥
सम्प्रायातेषु देवेषु हरोऽपि निजमन्दिरम्।<br>समभ्येत्य महादेवीमिदं वचनमब्रवीत्॥ ५२<br><br>देवि देवैरिहाभ्येत्य यत्नात् प्रेष्य हुताशनम्।<br>नीतः प्रोक्तो निषिद्धस्तु पुत्रोत्पत्तिं तवोदरात्॥ ५३<br><br>साऽपि भर्तुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धा रक्तान्तलोचना।<br>शशाप दैवतान् सर्वान् नष्टपुत्रोद्भवा शिवा॥ ५४<br><br>यस्मान्नेच्छन्ति ते दुष्टा मम पुत्रमथौरसम्।<br>तस्मात् ते न जनिष्यन्ति स्वासु योषित्सु पुत्रकान्॥ ५५देवताओंके स्वर्ग चले जानेपर महादेवने भी अपने मन्दिरमें जाकर महादेवीसे यह वचन कहा—देवि! देवोंने यहाँ आकर युक्तिसे अग्निको मेरे निकट भेजकर मुझे बुलाया और तुम्हारी कोखसे पुत्र न जननेके लिये कहा। पुत्र न जननेकी बात पतिसे सुनकर क्रोधसे शिवाकी आँखें लाल हो गयीं और (उन्होंने) समस्त देवताओंको शाप दे दिया; यतः वे दुष्ट मेरे उदरसे पुत्रकी उत्पत्ति नहीं चाहते; अतः वे भी अपनी पत्नियोंसे पुत्र नहीं उत्पन्न करेंगे॥ ५२—५५॥
एवं शप्त्वा सुरान् गौरी शौचशालामुपागमत्।<br>आहूय मालिनीं स्नातुं मतिं चक्रे तपोधना॥ ५६<br><br>मालिनी सुरभिं गृह्य श्लक्ष्णमुद्वर्तनं शुभा।<br>देव्यङ्गममुद्वर्तयते कराभ्यां कनकप्रभम्।<br>तत्स्वेदं पार्वती चैव मेने कीदृग्गुणेन हि॥ ५७<br><br>मालिनी तूर्णमगमद् गृहं स्नानस्य कारणात्।<br>तस्यां गतायां शैलेयी मलाच्चक्रे गजाननम्॥ ५८इस तरह देवताओंको शाप देकर तपोधना गौरी शुद्धिशालामें गयीं और मालिनीको बुलाकर स्नान करनेका विचार किया। सुन्दरी मालिनी सुगन्धयुक्त मुलायम उबटन लेकर देवीके सोने-जैसे कान्तिवाले शरीरमें (उसे) दोनों हाथोंसे लगाने लगी। (उबटन लगाते समय पसीनेसे मिला उबटनका मैल देखकर) पार्वतीजी (अपने मनमें) विचार करने लगीं कि (देखूँ कि) इस स्वेदमें क्या गुण है। मालिनी स्नान (कराने)-के लिये शीघ्र स्नानगृहमें (पहले) चली गयी। उसके चले जानेपर शैलपुत्रीने (उस) मैलसे गजवदनको बनाया।
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