वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
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| चतुर्भुजं पीनवक्षं पुरुषं लक्षणान्वितम्।<br>कृत्वोत्ससर्ज भूम्यां च स्थिता भद्रासने पुनः॥ ५९ | चार भुजावाले, चौड़ी छातीवाले, सुन्दर लक्षणोंसे युक्त पुरुषको बनाकर उसे भूमिपर रख दिया और वे स्वयं पुनः उत्तम आसनपर बैठ गयीं॥ ५६-५९॥ | | मालिनी तच्छिरःस्नानं ददौ विहसती तदा।<br>ईषद्वद्धासामुमा दृष्ट्वा मालिनीं प्राह नारद॥ ६०<br>किमर्थं भीरु शनकैर्हससि त्वमतीव च।<br>साऽथोवाच हसाम्येवं भवत्यास्तनयः किल॥ ६१<br>भविष्यतीति देवेन प्रोक्तो नन्दी गणाधिपः।<br>तच्छ्रुत्वा मम हासोऽयं संजातोऽद्य कृशोदरि॥ ६२<br>यस्माद् देवैः पुत्रकामः शङ्करो विनिवारितः।<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवी सस्नौ तत्र विधानतः॥ ६३ | उस समय मालिनीने हँसते हुए देवीको सिरसे स्नान कराया। नारदजी! मालिनीको मुसकराते हुए देखकर देवीने कहा—भीरु! तुम धीरे-धीरे इतना क्यों हँस रही हो? मालिनीने कहा—मैं इसलिये हँस रही हूँ कि आपको (अवश्य) पुत्र होगा, ऐसा महादेवने गणपति नन्दीसे कहा था। कृशोदरि! उसे सुनकर (स्मरण कर) आज मुझे हँसी आ गयी है; क्योंकि देवताओंने शङ्करको पुत्रके लिये इच्छा करनेसे रोक दिया है। इस बातको सुनकर देवीने (फिर) वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया॥ ६०-६३॥ | | स्नात्वार्च्य शङ्करं भक्त्या समभ्यागाद् गृहं प्रति।<br>ततः शम्भुः समागत्य तस्मिन् भद्रासने त्वपि॥ ६४<br>स्नातस्तस्य ततोऽधस्तात् स्थितः स मलपूरुषः।<br>उमास्वेदं भवस्वेदं जलभूतिसमन्वितम्॥ ६५<br>तत्सम्पर्कात् समुत्तस्थौ फूत्कृत्य करमुत्तमम्।<br>अपत्यं हि विदित्वा च प्रीतिमान् भुवनेश्वरः॥ ६६<br>तं चादाय हरो नन्दिमुवाच भगनेत्रहा।<br>रुद्रः स्नात्वार्च्य देवादीन् वाग्भिरद्भिः पितॄनपि॥ ६७ | स्नान करनेके बाद भक्तिसे शङ्करकी अर्चना कर देवी घरकी ओर चलीं। उसके बाद महादेवने भी आकर उसी पवित्र आसनपर स्नान किया। उसी आसनके नीचे वह मैलसे बनाया पुरुष पड़ा था। उमाके स्वेद एवं जल तथा भस्मसे युक्त शङ्करके स्वेदका सम्मिश्रण होनेसे वह उत्तम शुण्डसे फूत्कार करते हुए उठा। उसे अपना पुत्र जानकर भुवनेश्वर प्रसन्न हो गये। भगनेत्रको नष्ट करनेवाले महादेवने उसे लेकर नन्दीसे कहा—(यह मेरा पुत्र है)। स्नान करनेके बाद शिवने स्तुतियोंसे देवताओंकी तथा जलसे (नित्य) पितरोंकी भी अर्चना की॥ ६४-६७॥ | | जप्त्वा सहस्रनामानमुमापार्श्वमुपागतः।<br>समेत्य देवीं विहसन् शङ्करः शूलधृग् वचः॥ ६८<br>प्राह त्वं पश्य शैलेयि स्वसुतं गुणसंयुतम्।<br>इत्युक्ता पर्वतसुता समेत्यापश्यदद्भुतम्॥ ६९<br>यत्तदङ्गमलाद्दिव्यं कृतं गजमुखं नरम्।<br>ततः प्रीता गिरिसुता तं पुत्रं परिषष्वजे॥ ७०<br>मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय ततः शर्वोऽब्रवीदुमाम्।<br>नायकेन विना देवि तव भूतोऽपि पुत्रकः॥ ७१<br>यस्माज्जातस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः।<br>एष विघ्नसहस्राणि सुरादीनां हरिष्यति॥ ७२ | वे सहस्रनामका जप कर उमाके निकट गये। देवीके निकट जाकर शूल धारण करनेवाले शङ्करने हँसते हुए यह वचन कहा—शैलजे! तुम अपने गुणवान् पुत्रको देखो। इस प्रकार कहे जानेपर पार्वती ने जाकर यह आश्चर्य देखा कि उनके शरीरके मलसे अलौकिक सुन्दर हाथीके मुखवाला पुरुष हो गया है। उसके बाद गिरिजाने प्रसन्नतापूर्वक उस पुत्रको आलिङ्गित किया। उसके सिरको सूँघकर शम्भुने उमासे कहा—देवि! तुम्हारा यह पुत्र बिना नायकके उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'विनायक' होगा। यह देवादिकोंके सहस्रों विघ्नोंका हरण करेगा॥ ६८-७२॥ |